ममता बनर्जी के राज में बंगाल में तीन गुना बढ़ गया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

ममता बनर्जी के राज में बंगाल में तीन गुना बढ़ गया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ
ममता बनर्जी के राज में बंगाल में तीन गुना बढ़ गया राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

Paritosh Dubey | Updated: 12 Oct 2019, 07:24:38 PM (IST) Kolkata, Kolkata, West Bengal, India

राजनीतिक तौर पर अति संवदेनशील माने जाने वाले पश्चिम बंगाल ( West Bengal ) में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ( RSS ) के प्रभाव का विस्तार तेजी से हो रहा है। तृणमूल कांग्रेस ( Trinmool Congress )पर तुष्टीकरण की राजनीति का आरोप लगाकर संघ राज्य में चौतरफा बढ़ रहा है। उसे वाममोर्चा ( Left Front ) के पराभाव के बाद पैदा हुई रिक्तता का लाभ भी मिल रहा है।

कोलकाता. बंगाल में वाममोर्चे के पराभाव से शुरु हुआ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रभाव विस्तार का दौर अब गति पकड़ चुका है। प्रत्यक्ष राजनीति से दूर रहने का दावा करने वाले संघ की राज्य में अभी लगभग दो हजार शाखाएं शुरू हो चुकी हैं। जिन्हें अगले डेढ़ साल में पांच हजार करने का लक्ष्य रखा गया है। जिस गति से बंगाल में संघ का विस्तार हुआ है ठीक उसी गति से राज्य में भाजपा भी मजबूत हुई है। वर्ष 2014 में लोकसभा के लिए दो सांसद भेजने वाले बंगाल ने इस बार राज्य से 18 सांसद दिए हैं। भाजपा का लोकसभा चुनाव में मत प्रतिशत बढक़र 40 फीसदी पहुंच गया है। तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में संघ के विस्तार के आंकड़ों की बात करें तो संघ बंगाल में वर्ष 2010 के मुकाबले तीन गुना बढ़ चुका है। वर्ष 2010 में संघ की शाखाओं की संख्या लगभग 7 सौ थी जो अभी लगभग 2 हजार तक पहुंच गई है। संघ के अनुशांगिक संगठन भी तेजी से प्रसार कर रहे हैं। धार्मिक आयोजनों से लेकर आपदा और सामाजिक कार्यों में संघ कार्यकर्ताओं की सक्रियता बढ़ी है।
आरएसएस की ऑनलाइन सदस्यता लेने के आंकड़ों पर गौर करें तो समझ में आता है कि उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज्यादा आवेदन पश्चिम बंगाल से आए हैं। वर्ष 2019 में 15 जून तक जहां उत्तर प्रदेश में 9392 आवेदन आए वहीं बंगाल से 7700 आवेदन आए। संघ पदाधिकारियों को बंगाल के आवेदनों से इस लिए खुशी है क्योंकि उत्तरप्रदेश में जहां संघ के छह अंचल है वहीं बंगाल में दो ही अंचल हैं।

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संघ को लिया निशाने पर तो और तेजी आई
र्ष 2018 में जब राज्य सरकार ने संघ के अनुशांगिक संगठन की ओर से संचालित 125 शिक्षण संस्थानों को बंद करने का नोटिस जारी किया। जिसके बाद संघ ने पूरी ताकत से राज्य सरकार के फैसले का विरोध करना शुरू किया। राज्य के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने तो यहां तक कह दिया कि सरकार स्कूलों में हिंसा, धार्मिक असहिष्णुता का पाठ पढ़ाने वाले स्कूलों को संचालित करने नहीं दे सकती। इसके बाद संघ ने अदालती लड़ाई शुरू की। जो अब तक जारी है। इसका असर यह हुआ कि जिस उत्तर दिनाजपुर में स्कूलों के संचालन को लेकर विवाद था वहां संघ की शाखाओं में तेजी से बढ़ोतरी हुई और अल्पसंख्यक बहुल जिले में लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार ने जीत हासिल कर ली।


सोशल मीडिया का उठाया फायदा
संघ परिवार ने युवाओं और नई पीढ़ी के लोगों को अपनी विचारधारा से जोडऩे के लिए नए क्रांतिकारी सोशल मीडिया का जमकर उपयोग जारी रखा है। स्वामी विवेकानंद, सिस्टर निवेदिता जैसे आध्यात्मिक गुरुओं को नए सिरे से प्रासंगिक बताकर परिभाषित किया जा रहा है वहीं स्वतंत्रता के समय के हिंदू नायकों के विवरण सोशल मीडिया पर छाए रहते हैं। वहीं मुख्यधारा के मीडिया में संघ विचारकों का पैनलिस्टों के तौर पर शामिल होना व अपनी विचारधारा के प्रसार करने की रणनीति भी सफल होते दिख रही है।

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प्रणव के बाद अब मिथुन गए संघ मुख्यालय
नसंघ की स्थापना करने वाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी के गृह राज्य में स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरंत बाद से ही संघ सक्रिय रहा। विभाजन की त्रासदी झेलने वाले हिंदुओं के पुर्नवास से जुड़ा रहा। इस बीच वामपंथी आंदोलन के मजबूत होने से संघ की तकलीफें बढ़ीं। साढ़े तीन दशकों के वामपंथी शासनकाल के वर्ष 2011 में समाप्त होने के बाद संघ ने विचारधारा के स्तर पर पैदा हुई रिक्तता को भरने का कार्य हाथ में लिया। इसके बावजूद बांग्ला भद्रलोक संघ से जुड़ाव को लेकर सहज नहीं रहा। इस बीच दशकों के कांग्रेसी, बांग्ला भद्रलोक के मौजूदा पितृ पुरुष पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के गत वर्ष संघ मुख्यालय जाने और उनके लंबे भाषण के बाद राज्य में संघ की स्वीकार्यता बढ़ी। बंगाल से बॉलीवुड पहुंचे मिथुन चक्रवर्ती के हाल ही में संघ मुख्यालय जाने को इसी कड़ी का हिस्सा माना जा रहा है।

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साफ्ट हिंदुत्व का दांव पड़ रहा उल्टा
संघ के हिंदुत्व के जवाब में तृणमूल कांग्रेस का सॉफ्ट हिंदुत्व का दांव उसे उल्टा परिणाम दे चुका है। रामनवमी, हनुमान जयंती जैसे कार्यक्रमों पर रोक लगाने में प्रशासन की भूमिका से संघ को विस्तार का और आधार मिला। जंगलमहल के बड़े इलाके, उत्तर बंगाल के अधिकांश इलाकों में, सीमायी बंगाल के क्षेत्रों में बैरकपुर व अन्य उपनगरीय इलाकों में संघ ने बीते कुछ सालों में न सिर्फ समर्पित कार्यकर्ता तैयार कर लिए बल्कि अपनी विचारधारा का तेजी से प्रसार कर लिया। तृणमूल भाजपा और संघ की चाल में फंसती चली गई।

संघ से निपटने बनाए दो संगठन
लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा के बढ़ते प्रभाव के कारण के तौर पर संघ की भूमिका रेखांकित होने के बाद तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ने आननफानन में दो नए संगठनों के निर्माण की घोषणा की। संघ की विचारधारा से निपटने के लिए उन्होंने अपने भाई कार्तिक बनर्जी व राज्य सरकार के मंत्री ब्रात्य बसु को नवनिर्मित संगठन जयहिंद वाहिनी का अध्यक्ष बनाया वहीं महिलाओं के संगठन बंग जननी वाहिनी का जिम्मा सांसद काकोली घोष दास्तीदार को सौंपा।

हमले भी बढ़े
ंसंघ का विस्तार हो रहा है तो उसे उसकी कीमत भी चुकानी पड़ रही है। राजनीतिक रूप से अतिसंवेदनशील पश्चिम बंगाल में संघ कार्यकर्ताओं पर हमले भी बढ़े हैं और संघ कार्यकर्ता विरोधी राजनीतिक विचाारधारा के समर्थकों के निशाने पर हैं। संघ का दावा है कि उसके कई समर्थक बंगाल में हुई राजनीतिक हिंसा में मारे गए हैं। ताजा भूचाल मुर्शिदाबाद में कथित संघ कार्यकर्ता व उनके परिवार की नृशंष हत्या के बाद खड़ा हुआ है। जहां संघ समर्थक शिक्षक उनकी गर्भवती पत्नी और मासूम बच्चे की बर्बर तरीके से हत्या की गई है। भाजपा और संघ परिवार का दावा है कि लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक उसके 81 समर्थक, नेता, कार्यकर्ता राजनीतिक हिंसा के शिकार होकर मारे जा चुके हैं।

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