scriptStanding on feet after struggling for 14 years | हिम्मत नही हारी, जिंदगी संवारी | Patrika News

हिम्मत नही हारी, जिंदगी संवारी

एक आम इंसान की तरह अचिंत्य कुमार पाल की आंखों में भी जिंदगी को लेकर तमाम सपने थे, लेकिन आर्थिक हालात तथा हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी ही बदल दी। करीब 14 साल के लम्बे संघर्ष के बाद आज वे न केवल अपने पैरों पर खड़े है, बल्कि अपने जैसे हजारों लोगों को कभी हौसले नहीं खोने तथा संघर्ष का रास्ता नहीं छोडऩे की प्रेरणा दे रहे हैं।

कोलकाता

Published: December 03, 2021 12:41:29 am

विश्व दिव्यांग दिवस पर विशेष: 14 साल संघर्ष कर पैरों पर हुआ खड़ा
ट्रेन हादसे और गिरने के बाद दो बार पैर में फ्रैक्चर, फिर भी नहीं टूटा हौसला
रवींद्र राय
कोलकाता. एक आम इंसान की तरह अचिंत्य कुमार पाल की आंखों में भी जिंदगी को लेकर तमाम सपने थे, लेकिन आर्थिक हालात तथा हादसे ने उनकी पूरी जिंदगी ही बदल दी। करीब 14 साल के लम्बे संघर्ष के बाद आज वे न केवल अपने पैरों पर खड़े है, बल्कि अपने जैसे हजारों लोगों को कभी हौसले नहीं खोने तथा संघर्ष का रास्ता नहीं छोडऩे की प्रेरणा दे रहे हैं। ट्रेन हादसे तथा घर के बाथरूम में दो बार बाएं पैर में फ्रैक्चर होने के बाद भी वे उठ खड़े हुए। आज वे कोलकाता नगर निगम में परिवेश बंधु के रूप में नौकरी कर रहे हैं। समय मिलने पर बिजली मिस्त्री का भी काम करते हैं।
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2007 से संघर्ष की शुरूआत
2007 से पाल के संघर्ष की कहानी शुरू होती है। 10वीं कक्षा पास करने के बाद पिता ने साफ शब्दों में कह दिया, अब नौकरी करो, आगे पढ़ाने की क्षमता नहीं है। पहली बार जब पाल एक राइस फैक्ट्री में काम मांगने गए तो मालिक ने कहा कि मेरे पास नए लोगों के लिए कोई काम नहीं है। वे अपने कुछ साथियों के साथ चेन्नई गए, वहां कुछ दिनों तक दलाल के माध्यम से काम किया। फिर वे पूर्व बर्दवान के मंगलकोट थाना इलाके के अपने गांव बोनपाड़ा लौट आए।
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ट्रेन हादसे के शिकार
कुछ दिनों तक राजमिस्त्री के रूप में काम करने के बाद पाल ने तकनीकी शिक्षा हासिल करनी शुरू की। आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण पिता मदद से कतराते रहे। फिर पाल एक निजी कंपनी में काम करने लगे। इसी दौरान 1 जनवरी, 2016 में ट्रेन हादसे में उनके बाएं पैर में काफी चोट लगी। बर्दवान मेडिकल कॉलेज में शुरुआती इलाज के बाद उन्हें महानगर के बन हुगली स्थित राष्ट्रीय गतिशील दिव्यांगजन संस्थान में रैफर किया गया। यहां उपचार किया गया, काउंसिलिंग की गई। उन्हें दो बार कृत्रिम अंग प्रदान किया गया।
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जारी रही चुनौतियां
पाल के जीवन की चुनौतियां यहीं खत्म नहीं हुई। इलाज के कुछ दिनों बाद वे फिर अपने घर के बाथरूम में गिरे गए। बाएं पैर में दोबारा फ्रैक्चर हो गया। वे इलाज के लिए जयपुर तक गए। करीब ढाई-तीन साल तक इलाज के बाद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। आईटीआई में पढ़ाई की।
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निगम में मिली नौकरी
पाल नौकरी के लिए राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी के कई नेताओं के पास गए। हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन मिलता रहा। आखिरकार वे कोलकाता नगर निगम की ग्रुप डी परीक्षा में शामिल हुए और पास हो गए। करीब एक माह बाद उन्हें नियुक्ति पत्र मिला तथा परिवेश बंधु के रूप में काम करने लगे।
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जीने की चाह जरूरी
पाल ने पत्रिका को बताया कि मैंने जीवन में बहुत संघर्ष किया। जिंदगी ने पल पल उनकी परीक्षा ली। मां की मदद तथा कभी हिम्मत नहीं हारने की इच्छाशक्ति के सहारे वे उठ खड़े हुए। मैं यहां कहूंगा कि जीने की चाह कभी खत्म नहीं करनी चाहिए।
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