CHATH-PUJA-छतों पर रहेगी इस बार छठ की छटा

हिन्दू धर्म का एकमात्र पर्व है छठ जिसमें डूबते सूर्य को भी दिया जाता अघ्र्य, कोविड-19 संक्रमण से बचाव को छठी व्रतियों ने बरती सावधानी, पर्व नहीं, यह है महापर्व, सूर्योपासना का महापर्व 18 से 21 तक

By: Shishir Sharan Rahi

Updated: 17 Nov 2020, 06:49 PM IST

BENGAL NEWS-कोलकाता. इस बार वैश्विक महामारी कोरोना वायरस नोवेल कोविड-19 संक्रमण से खुद व परिवार को सुरक्षित बचाने के लिए सूर्योपासना के महापर्व छठ पूजा प्रदेश समेत देशभर में अनेक स्थानों पर घर की छतों पर ही होने जा रही है। वैसे तो उदित होते सूर्य की पूजा सदियों से हर देश व राज्य में होती आ रही है। लेकिन सूर्योपासना का महापर्व ‘छठ’ हिन्दू धर्म का एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसमें अस्तचलगामी सूर्य को भी अघ्र्य दिया जाता है। सूर्यदेव की आराधना तथा संतान के सुखी जीवन की कामना के लिए समर्पित छठ पूजा हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होती है। चार दिवसीय सूर्योपासना का छठ पर्व 18 से 21 नवंबर तक मनाया जाएगा। 18 को नहाय खाय, 19 को खरना, 20 को संध्या और 21 को उगते सूर्य को अघ्र्य के साथ ही यह संपन्न होगा।

बिहार-झारखंड से शुरू होकर आज पूर्वोत्तर भारत तक फैला
बिहार-झारखंड से छठ की शुरूआत हुई और आज ‘छठ’ की महिमा पश्चिम बंगाल, उप्र, दिल्ली, राजस्थान, मप्र के साथ-साथ पूर्वोत्तर भारत के क्षेत्रों तक फैल गई है। अब छठ पूजा में हिन्दीभाषियों के साथ बांग्ला समेत अन्य भाषा-भाषी भी काफी संख्या में शामिल होने लगे हैं। इसे पर्व की बजाए महापर्व कहने के पीछे मुख्य तर्क यह है कि इसमें शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

36 घंटे का व्रत
छठव्रती सुहागिनें 36 घंटे का व्रत रखती हैं। किसी भी धातु के बर्तन के स्थान पर मिट्टी के पात्र में खीर-पुड़ी, सुपाड़ी, लौंग व पान का पत्ता रखकर सूर्यदेव की पूजा की जाती है। व्रतियों के सभी भोजन भी कच्ची मिट्टी के नए चूल्हे पर ही बनते हैं। इस अनुष्ठान में या तो गंगाजल या कुएं के जल और नमक में सेंधा व शक्कर के स्थान पर गुड़ का प्रयोग होता है। भविष्य पुराण में भी इस पर्व का उल्लेख है, जिसके अनुसार धौम्य ऋषि ने द्रौपदी को बताया था कि सुकन्या ने इस महापर्व को किया। बाद में द्रौपदी ने भी इस पर्व का पालन किया, जिसके कारण वह 88 सह ऋषियों का स्वागत कर युधिष्ठिर की मर्यादा रख शत्रुओं के समूल नाश का आसीर्वाद पा सकी। इस महापर्व की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह न तो किसी पंडित या न वैदिक मंत्रों के साथ होता है, बल्कि इसे लोकगीतों और लोकरीति से मनाया जाता है। इसे महिलाएं और पुरुष दोनों मनाते हैं। मध्य बिहार स्थित औरंगाबाद में देश का एकमात्र ऐसा सूर्य मंदिर है, जो पूर्वभिमुख न होकर पश्चिमोभिमुख है। राजधानी पटना में गंगा और अन्य शहरों में नदियों-तालाबों के किनारे छठ करने वालों का सैलाब उमड़ता है। लाउडस्पीकरों से छठ के लोकगीतों को छोड़ अन्य कोई फिल्मी गीत नहीं बजते। भोजपुरी, मैथिली और मगही जैसी लोकभाषाओं के पारंपरिक छठ गीत चारों ओर गूंजते हैं। पटना हो या आरा, छपरा हो या टाटा हर शहर-हर गली-गली मशहूर लोक गायिका शारदा सिन्हा के गाए छठ के इन गीतों से गूंज उठता है.......‘कांचहि के बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए, उग..न सुरूज देव...अरग के बेर...मारबउ रे सुगवा धनुक से, सुग्गा गिरे मुरझाए..’
राष्ट्रीय भोजपुरिया एकता मंच के राष्ट्रीय महासचिव त्रिभुवन मिश्रा का कहना है कि ७३ लाख मरीजों ने कोविड को मात दी है और कोरोना का खौफ अब कम हुआ है। जन-जन की आस्था वाले सूर्योपासना के महापर्व छठ के सामने कोरोना जैसी महामारी बुरी तरह हारेगी। छठ माता सभी व्रतियों के परिवार का कल्याण कर इस महामारी से रक्षा करेंगी। उधर कई साल से छठ करते आ रहीं सरिता, सावित्री सिंह का कहना है कि हर साल घाट पर अघ्र्य देते थे। कोविड के चलते सावधानी बरतते हुए इस बार घर की छत पर ही पूजा करेंगे।

Shishir Sharan Rahi Reporting
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