WEST BENGAL COVID EFFECTS--घरों में कैद हो गई जिंदगी, बढ़ी घरेलू जिम्मेदारियां

कोविड ने पुरुषों की तुलना में महिलाओं पर बरपाया अधिक कहर,आर्थिक रूप से गरीबी में धकेला,कोरोना काल में 5राज्यों में 30 फीसदी से ज्यादा महिलाएं हुई घरेलू हिंसा की शिकार

By: Shishir Sharan Rahi

Published: 12 Jul 2021, 08:44 PM IST

BENGAL COVID EFFECTS ON WOMEN--कोलकाता (शिशिर शरण राही)। कोविड-19संक्रमण काल में पुरुषों की तुलना में महिलाओं को ज्यादा नुकसान हुआ। आधी आबादी की जिंदगी कोरोना काल की लॉकडाउन अवधि के दौरान घरों में कैद हो गई। उनपर घरेलू जिम्मेदारियां बढ़ी व आर्थिक रूप से अधिक हानि हुई। एक रिसर्च से खुलासा हुआ कि भारत में महिलाओं को महामारी के दौरान पुरुषों की तुलना में बहुत अधिक नुकसान हुआ है। पहले से ही ***** आधारित असमानताओं का सामना कर रही महिलाओं को कोरोना ने आर्थिक रूप से गरीबी में धकेल दिया। सबसे ज्यादा दुखद पहलू यह है कि कोरोना काल में 5 राज्यों में 30 फीसदी से ज्यादा महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हुई। 22 राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के मुताबिक 5 राज्यों की 30 फीसदी से अधिक महिलाएं पति के शारीरिक-यौन हिंसा की शिकार हुई। यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर के ग्लोबल डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट की प्रोफेसर बीना अग्रवाल की रिसर्च के मुताबिक महिलाओं को कोविड-लॉकडाउन के दौरान पुरुषों की तुलना में नौकरियों का अधिक नुकसान हुआ जबकि उनकी लॉकडाउन के बाद रिकवरी बहुत कम रही।पिछले साल लॉकडाउन-अनलॉक के बीच महिलाओं की कार्यशैली में बदलाव आया। इस दौरान महिलाओं ने कुछ खट्टे-मीठे अनुभव किए। पूर्वांचल विद्यामंदिर, कोलकाता की हिंदी शिक्षिका अनिता उपाध्याय के शब्दों में कोविड काल में नियमों, बंदिशों की जंजीरों में जकड़ा मनुष्य खुली सांस को भी तरस रहा। इंसान, इंसान की परछाई से भाग रहा। सकारात्मक ऊर्जा लुप्त होती जा रही है और निजी संबंध कटु हो रहे हैं। कवयित्री, लेखिका, अनुवादक श्यामा सिंह कहती हैं कि कोविड ने पूरे विश्व के मानव समाज को प्रभावित किया कोई भी अछूता नहीं बचा। दूसरी लहर में मेरा परिवार भी प्रभावित हुआ। दिल्ली पब्लिक स्कूल मेगासिटी की शिक्षिका रेखा सिंह ने कहा कि महिलाओं की जिम्मेदारियां ज्यादा बढ़ गई। लॉकडाउन के दौरान घर और बाहर दोनों तरफ के कार्य कई गुना बढ़ गए। हिंदी सावित्री महाविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. नीलिमा सिन्हा के मुताबिक महामारी ने सामाजिक, मानसिक और बौद्धिक परिस्थिति को तोड़-निचोड़ कर रख दिया। न बाहर निकल सकते न बच्चों से मिल सकते न रिश्तेदारों के यहां जा सकते और न पड़ोसियों के साथ चाय की चुस्की और पकोड़े का आनंद ले सकते हैं। गृहिणी मनीषा मूंधड़ा ने बताया कि पिछले साल मार्च से बहुत कुछ बदल गया। कोरोना काल में रिश्तेदारों से मिलना हो किसी समारोह या शॉपिंग के लिए मॉल में जाना सभी पर विराम सा लग गया। घूमने-फिरने की आजादी पर पहरा बैठ गया।

Shishir Sharan Rahi Reporting
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