तीन साल से फरार इस नेता ने बदल दिए बंगाल की राजनीति के समीकरण

बंगाल (West Bengal) जब दुर्गापूजा के आनंद में डूबा हुआ था उस समय कोलकाता में हुआ एक घटनाक्रम राज्य के विधानसभा चुनाव में बड़ा फैक्टर बनने वाला है।

By: Paritosh Dube

Published: 28 Oct 2020, 01:25 PM IST

कोलकाता
राजनीति में न तो कोई स्थाई शत्रु होता है और न ही स्थाई मित्र। पात्र, काल, स्थिति के अनुसार शत्रु और मित्र बदल जाते हैं। खेमेबंदी का खाका जुदा हो जाता है और रणनीतियां बदल जाती हैं। बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर बंगाल की एक दर्जन से अधिक सीटों पर सीधा प्रभाव रखने वाले कद्दावर लेकिन कानून की नजर में फरार घोषित किए गोरखा नेता बिमल गुरुंग का तीन साल बाद सक्रिय राजनीति में लौटने की हुंकार भरना और राज्य सरकार का खामोश रहना कई इशारे करता है। गुरुंग का अचानक कोलकाता आना, प्रेस काफं्रेस करना उसके बाद पहाड़ में राजनीतिक आयाम का बदलना, पुराने सहयोगी भाजपा का संतुलन साधना, नए संभावित सहयोगी तृणमूल कांग्रेस की ओर से चुप्पी बनाए रखना साबित करता है गुरुंग फैक्टर पर सभी फूंक फूंक कर कदम उठा रहे हैं। वहीं माकपा का गुरुंग के बहाने राज्य सरकार पर निशाना साधना साबित कर रहा है कि इस पेंच में सभी अपनी अपनी जुगत में है।
यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कभी दार्जिलिंग पहाड़ के एकक्षत्र क्षत्रप रहे बिमल गुरुंग के एक बार फिर राजनीति में सक्रिय होने की कोशिशों से राज्य की राजनीति में समीकरण बदलने शुरू हो गए हैं। तृणमूल कांग्रेस, भाजपा और माकपा अपने अपने पत्तों को फिर से तैयार कर आसन्न विधानसभा चुनाव में गुरुंग फैक्टर का लाभ उठाने की तैयारी में हैं।
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उत्थान, पतन के बाद फिर उत्थान की तैयारी
गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष रहे बिमल गुरुंग का ऐतिहासिक उत्थान व उसके बाद पतन किसी किवंदती से कम नहीं है। राज्य में हुए सत्ता परिवर्तन के बाद भी पहाड़ पर तृणमूल कांग्रेस का कोई व्यापक प्रभाव नहीं रहा। गुरुंग अपने संगठन व कैडर के सहारे वर्ष 2017 तक पहाड़ के सर्वेसर्वा बने रहे। इस बीच वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पहाड़ दौरे के दौरान ही हिंसा शुरू हो गई। जिसके बाद गुरुंग का पतन भी शुरू हो गया। एक एक करके उनके समर्थकों को अलग अलग आपराधिक मामलों में सलाखों के पीछे डाला गया। उनपर भी यूएपीए, हत्या, सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचाने समेत कई गंभीर धाराओं में मामले दर्ज किए गए। वर्ष 2017 के आखिरी महीनों से गुरुंग भूमिगत हो गए। लेकिन राज्य पुलिस प्रशासन के लिए वांछित बने रहे। इस दौरान उनकी पार्टी गोजमुमो के पहाड़ में मौजूद नेताओं ने उन्हें पार्टी से बहिष्कृत कर दिया। वे मौके का इंतजार करते रहे। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भी गुरुंग शांत रहे। अब विधानसभा चुनाव के करीब आते ही गुरुंग एक बार फिर पहाड़ में पैठ जमाने की कोशिश में हैं। इसके लिए उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के कंधे का सहारा लिया है।
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तीन साल से फरार इस नेता ने बदल दिए बंगाल की राजनीति के समीकरण

कम से कम एक दर्जन सीटों पर प्रभाव
पहाड़ की राजनीति से जुड़े लोगों के मुताबिक गुरुंग फैक्टर पहाड़ व तराई की कम से एक दर्जन सीटों पर प्रभाव पैदा करेगा। गोरखा वोट गुरुंग के साथ बने रहेंगे या पहाड़ में मौजूदा गोजमुमो नेतृत्व के साथ जाएंगे यह कहना अभी जल्दी होगी लेकिन इतना तो तय है कि इस दफे गोरखा वोट एक तरफ नहीं गिरने वाले। गुरुंग इस तिलस्म को तोडऩे के लिए तृणमूल कांग्रेस का इक्का बन सकते हैं। हालांकि तृणमूल कांग्रेस के नेता गुरुंग के तृणमूल सुप्रीमो पर आस्था जताए जाने पर अति उत्साहित न होकर सधी हुई टिप्पणी ही देते हैं। वहीं भाजपा अभी पहाड़ की बदल रही राजनीति पर नजरे टिकाए हुए है। उसने पार्टी नेताओं से गुरुंग मामले पर वेट एंड वॉच की रणनीति अपनाने की बात कही है।
इसके उलट माकपा राज्य प्रशासन को निशाने पर ले रही है। वर्ष 2017 में गुरुंग की घेराबंदी के समय गोलीबारी में मारे गए एएसआई अमिताभ मल्लिक का मामला उठाकर वह प्रशासन से सवाल पूछ रही है कि आखिरकार हत्या मामले में वांछित गुरुंग कोलकाता आकर पुलिस की सुरक्षा में कैसे कार्यक्रम कर सकते हैं।

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Paritosh Dube Desk
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