क्या सुलझ पाएगी भारत की सबसे बड़ी मिस्ट्री

वर्ष 1995 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में विमान से ड्राप किए गए हथियारों के जखीरे के मामले के मुख्य आरोपी निएल्स हॉल्क उर्फ किम डेवी के भारत प्रत्यर्पण की तैयारी तेज हो गई है। मान में हथियार डाल कर भारत लाने, उन्हें पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में ड्राप करने के साजिशकर्ता बेनकाब होंगे। खबर में पढि़ए पुरुलिया आम्र्स ड्राप केस की बड़ी बातें...।


कोलकाता.
देश की स्वतंत्रता के बाद घटी घटनाओं में सबसे रहस्यजनक माने जाने वाला पुरुलिया हथियार कांड आज भी पेचीदगी के जाल में फंसा हुआ है। विमान से पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में गिराए गए हथियारों की घटना के 2४ साल बीतने के बाद भी इसकी जांच में लगी एजेंसियां यह तय नहीं कर पाई हैं कि घटना की सच्चाई क्या है। इसके पीछे कौन था। इसका मकसद क्या था।

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में 18 दिसम्बर 1995 को अपने काम पर जा रहे लोगों को खुली जगहों पर बक्से दिखाई दिए। जिनमें बुल्गारिया में बनी 300 एके 47 और एके 56 राइफलें, लगभग 15,000 राउंड गोलियां, 6 रॉकेट लांचर, बड़ी संख्या में हथगोले, पिस्तौलें और अंधेरे में देखने वाले उपकरण मौजूद थे। शुरुआत में तो ग्रामीणों ने हथियार अपने घर में छिपा दिए लेकिन पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक लगने के बाद बड़े पैमाने पर हथियारों को बरामद करने का अभियान चलाया गया।
इस बीच विमान की खोज लेनी शुरू की गई।
अगले पांच दिनों के भीतर ही 2२ दिसंबर को थाईलैंड से कराची जा रहे एन्तोनोव-26 नाम के रूसी विमान को मुंबई के ऊपर से गुजरते समय नीचे उतारा गया। विमान में सवार लोगों के तार कांड से जुड़े निकले। विमान से ब्रिटिश हथियार एजेंट पीटर ब्लीच और चालक दल के छह सदस्यों को तो गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन इस कांड का मास्टर माइंड किम डेवी संदिग्ध घटनाक्रम के तहत हवाई अड्डे से बच निकला और अपने मूल देश डेनमार्क पहुंच गया।

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हाथ नहीं आया किम डेवी
कांड का मास्टर माइंड किम डेवी अभी भी भारत की गिरफ्त में नहीं आ पाया। उसके सहयोगी पीटर ब्लीच और चालक दल के सभी सदस्यों को भी भारत सरकार ने माफी देकर रिहा कर दिया है। डेवी के प्रत्यर्पण से जुड़े प्रयासों में तेजी भी आई है। भारत के दौरे पर आए डेनमार्क के प्रधानमंत्री लार्श रासमुशेन ने 17 जनवरी 2019 को कहा कि किम डेवी को भारत प्रत्यर्पित करने के मुद्दे का राजनीतिक रूप से समाधान हो चुका है। अब डेनमार्क के स्वतंत्र अधिकारी मामले को देख रहे हैं। उनके इस बयान से भारत की सबसे बड़ी मिस्ट्री सॉल्व होने की उम्मीद तो है। लेकिन प्रत्यर्पण की राह में कोपनहेगन की एक अदालत का आदेश आड़े आ रहा है। कोर्ट ने प्रत्यर्पण खारिज कर दिया है। जबकि डेनमार्क ने उसके प्रत्यर्पण पर इन शर्तों के साथ मुहर लगाई थी कि डेवी को फांसी नहीं होगी, दूसरी उसे मिलने वाली सजा वह डेनमार्क में ही काटेगा।

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1995 से चल रही डेवी की खोज
17 दिसंबर 1995 को हथियारों के बक् शों से भरा विमान कराची से उड़ा और बंबई पहुंचा। वहां से ईंधन लेकर विमान बनारस आया, पुरुलिया में हथियार गिराये और 18 दिसंबर को कलकत्ता चला गया। वहां से ईंधन लेकर थाईलैंड की राह पकड़ी। विमान 21 दिसंबर को चेन्नई पहुंचा, उसी रात फिर कराची जाने लगा, तब इसे बंबई में उतार लिया गया एयरपोर्ट से डेवी निकल भागा। जहाज का क्रू गिरफ्तार किया गया। उसके बाद से अब तक भारत डेवी की तलाश कर रहा है।

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आनंद मार्गियों से लेकर लिट्टे तक का नाम आया
पुरुलिया में हथियारों का जखीरा किसके लिए पैराशूट से ड्राप कराया गया था। इसके जवाब में कई उत्तर मिले, लेकिन उनकी पुष्टी न तो अदालत ने की और न ही जांच एजेंसियों ने। सीबीआई की जार्जशीट में आनंदमार्गियों को आरोपी बनाया गया था जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। वहीं कांड से अमेरिका, म्यांमार, रूस, बुल्गालिया, डेनमार्क, बांग्लादेश तक का कनेक्शन जोड़ा गया। आनंद मार्गी, लिट्टे जैसे संगठनों की भूमिका भी बताई गई। बांग्लादेश के उग्रवादी गुटों के लिए हथियार गिराए जाने की बात कही गई। यह तर्क दिया गया कि हथियार गिराने वालों से भूल हो गई। वहीं कुछ लोगों ने म्यांमार के काचेन विद्रोहियों की मदद के लिए हथियार भेजे जाने की बात कही।
डेवी की ओर से अपने बचाव में पेश किए दलीलों में बांग्लादेश के सैन्य अधिकारी कीभूमिका भी बताई गई जिसे बांग्लादेश ने खारिज कर दिया। वहीं डेवी के सहयोगी पीटर ब्लीच के खुफिया एजेंसियों के एजेंट होने की बात भी सामने आई। कुल मिलाकर घटना के ढाई दशक बाद भी अब तक इस रहस्य से पर्दा नहीं उठ पाया है कि इतनी बड़ी संख्या में हथियार क्यों, किसके लिए, किसके इशारे पर गिराए गए थे।

Paritosh Dube Desk
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