एक मात्र देवी मंदिर जहां लगता है सफेद रंग का झंडा और चुनरी

पहाड़ पर खुले आसमान मेें लगता है मां कोसगाई का दरबार
नवरात्र में दुर्गम पहाड़ी से होते हुए पहुंच रहे हैं श्रद्धालु

By: Vasudev Yadav

Updated: 10 Apr 2019, 11:31 AM IST

कोरबा. पहला ऐसा देवी मंदिर जहां लाल की जगह सफेद झंडा और चुनरी चढ़ाई जाती है। 500 साल पुराने इस इस मंदिर में भक्ति,शक्ति और और प्राचीनता का अनूठा संगम है। इसकी महत्ता नवरात्रि पर और ज्यादा बढ़ जाती है। 52 शक्ति पीठों में से एक मां कोसगई देवी मंदिर तीन कारणों से अपनी अलग पहचान रखता है। पहला यह कि यहां की देवी शांति का प्रतीक मानी जाती है इसलिए अन्य मंदिरों की तरह लाल झंडे की बजाय यहां सफेद झंडे देवी पर चढ़ाए जाते हैं। दूसरा यह कि इस मंदिर में छत नहीं है,यहां साल भर लोगों का आना जाना होता है। लेकिन नवरात्र के अवसर पर खसतौर पर लोग अपनी मनोकामना लेकर देवी के दरबार में पहुंचते हैं मान्यता है कि यहां मांगी गई मनोकामना पूर्ण होती है। हालांकि दुर्गम रास्तों की वजह से बहुत से लोग इच्छा होने के बाद भी यहां तक नहीं पहुंच सकते लेकिन नवरात्रि में फिर भी भक्तों की भीड़ यहां तक पहुच ही जाती है। यहां की तीसरी विशेषता यहां की प्राकृतिक सुंदरता है। जिसे देखने के बाद लोग इसकी ओर आकृष्ट हुए बिना नहीं रह सकते।
कोसगई स्थित देवी मंदिर में नवरात्रि के अवसर पर देवी के दर्शन करने के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। छत्तीसगढ़ के 36 किलों में से एक गढ़ कोसगई है। जिसका ऐतिहासिक दृष्टि कोण से काफी महत्व है। जिले के कटघोरा विकासखण्ड स्थित ग्राम छुरी के पास हसदेव नदी के समीप कोसगईगढ़ छुरी से उत्तर पूर्व में 6 मील की दूरी बीहड़ जंगलों के बीच पहाड़ी पर 200 फीट की उंचाई पर स्थित है। जहां शक्ति स्वरूपा कोसगई देवी की मूर्ति स्थापित है। यहां टेकरी के उपर पत्थर से बना हुआ एक किला है, जो कोसगईगढ़ के नाम से जाना जाता है। कोसगई का यह दुर्ग कौटिल्य के अर्थशास्त्र में वर्णित चार प्रकार के दुर्गों में से एक पार्वतीगिरी दुर्ग है। यहां पहाड़ी चारों तरफ से सीधी कटी हुई है।लेकिन अब केवल उनके अवशेष ही बाकि रह गए हैं। इसकी विशेषता यह है कि कोई भी शत्रु दुर्ग में प्रवेश करने के लिए इस रास्ते के अलावा किसी अन्य रास्ते से यहां नहीं पहुंच सकता था।इस दुर्ग का निर्माण १२वीं से १६ वीं शताब्दी के बीच की है। जो चेदियों की उन्नतिकाल के दौरान बना था।

यह है कोसगई की कहानी
कोसगई में विराजित देवी को 52 शक्ति पीठों से जोडक़र देखा जाता है, धार्मिक मान्यता के अनुसार राजा दक्ष के द्वारा यज्ञ का आयोजन करने के दौरान जब शिव जी को न्यौता नहीं भेजा गया ते माता सती जिद करके वहां पहुंची। लेकिन पति का अपमान सहन नहीं कर पाने के कारण उन्होने हवन कुंड में कूदकर अपनी जान दे दी । इस बात का पता जब शिव जी को चला तब उन्होने वीर भद्र नामक गण को भेजकर राजा दक्ष के यक्ष का विध्वंश कर दिया।उसके बाद सती के अधजले शरीर को लेकर विचरण करने लगे। देवताओं ने शिव जी के इस वैराग्य को खतम करने के लिए विष्णु जी से आग्रह किया और विष्णु जी ने अपने चक्र के प्रभाव से सती के शरीर के 52 टुकड़े किए जो अलग अलग स्थान पर गिरे। इसमें से एक टुकड़ा कोसगई पहाड़ पर भी गिरा था।

Vasudev Yadav
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