scriptExemption to officers, preparation to install GPS system on e-rickshaw | अफसरों को छूट, कचरा कलेक्शन करने वाले ई रिक्शा पर जीपीएस सिस्टम लगाने की तैयारी | Patrika News

अफसरों को छूट, कचरा कलेक्शन करने वाले ई रिक्शा पर जीपीएस सिस्टम लगाने की तैयारी

कोरबा. नगर निगम के वाहनों में डीजल की खपत बढ़ गई है। वाहनों पर निगरानी के लिए अब जीपीएस सिस्टम लगाए जाने का निर्णय लिया गया है,लेकिन जीपीएस सिर्फ ई रिक्शा, ट्रेक्टर, जेसीबी समेत अन्य वाहनों पर ही लगाया जाएगा। जबकि एक दर्जन से अधिक चारपहिया वाहन जिसमें अफसर चलते हैं उनके वाहनों को निगरानी के दायरे से बाहर रखा गया है।

कोरबा

Published: April 21, 2022 11:29:26 am

महंगे डीजल की वजह से निगम का बजट भी अब गड़बड़ाने लगा है। तीन साल पहले तक सालाना खर्च करीब तीन करोड़ के आसपास था जो कि अब बढ़कर छह करोड़ से पार हो चुका है। अब निगम के लिए पशोपेश की स्थिति बन गई है कि जरुरी सेवाओं से जुड़े वाहनों को चलने से रोका नहीं जा सकता ऐसे में निगम के खजाने से अधिक राशि खर्च करने की मजबूरी हो गई है। इसी बीच अधिकारियों को लंबे समय से शिकायत मिल रही थी कि चालक फिजूलखर्च कर रहे हैं। इससे भी घाटा हो रहा है।
डीजल प्रति लीटर १०६ रुपए हो चुका है। आम लोगों के साथ ट्रांसपोर्टर भी अब तक परेशान थे। अब निगम भी महंगाई से परेशान होने लगी है। नगर निगम में कार,जीप, ट्रैक्टर, स्काई लिफ्ट, डम्पर टीपर, सीवर क्लीनिंग मशीन, मिनी ट्रक , जेसीबी समेत 80 से अधिक वाहन हैं। हर महीने का औसत निकाला जाए तो करीब 36 हजार लीटर से ज्यादा की खपत हो रही है। कई बार ये 40 हजार लीटर के पार पहुंच जाता है। एक साल में साढ़े चार लाख लीटर डीजल की खपत निगम में हो रही है। पांच साल डीजल के दाम प्रति लीटर 60 से 70 रुपए प्रति लीटर था। तब हर महीने निगम को तीन से चार करोड़ खर्च करना पड़ रहा था। अब जब 96 रुपए तक हो गया है तो निगम को छह से सात करोड़ खर्च करना पड़ रहा है। इन सबका असर कहीं न कहीं शहर के विकास पर पड़ेगा। बजट से अधिक राशि डीजल के लिए खर्च होने की वजह से दूसरे कार्यों पर राशि की कमी जरुर पड़ेगी।
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कोरबा के मुख्य नगर पालिक निगम कार्यालय साकेत भवन
फिजूलखर्च अधिकारी कर रहे ज्यादा
फिजूलखर्च भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है जिसके वजह से खपत में इतना अधिक इजाफा हो रहा है। पूर्व में सभी वाहनों में जीपीएस सिस्टम लगा था जो कि अब बंद हो चुके हंै। इससे वाहनों पर निगरानी ही नहीं हो पा रही है। निचले स्तर के कर्मियों पर निगरानी रखने की वजह से डीजल की खपत में वृद्धि हो रही है। अधिकारी और उनके परिवार भी वाहनों का उपयोग निजी तौर पर कर रहे हैं।

इतने साल में कोई मापदंड तक नहीं बना
इधर किसी भी वाहन के लिए कोई मापदंड ही तय नहीं है। वाहनों के प्रकार के हिसाब से डीजल की मात्रा तय होनी चाहिए। सफाई, पेजयल, जेसीबी समेत अधिकारियों के वाहनों के लिए जब भी मांग की जाती है उतना डीजल दे दिया जाता है। जबकि दूरी के हिसाब और जिम्मेदारों के रुट के हिसाब से डीजल तय होना चाहिए।

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