10 मांगे, 5 मिले अब 50 देने पड़ गए..मुआवजे के बदले भी मांग ली थी घूस, नप गए...

पटवारी को तीन साल का कारावास

 

By: Rajesh Tripathi

Published: 04 Apr 2019, 09:11 PM IST

 

 

कोटा. एसीबी न्यायालय ने रिश्वत लेने के करीब 10 साल पुराने मामले में पटवारी को तीन साल के कठोर कारावास व 50 हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया।
परिवादी मोरपाल ने वर्ष 2009 में एसीबी चौकी बारां में दर्ज करवाई शिकायत में बताया था कि राज्य सरकार की ओर से उसके पिता भैरुलाल के नाम की जमीन अधिग्रहीत की गई थी। इसका मुआवजा बारां कलक्टे्रट से दिया गया। इस राशि को देने के बदले अतिरिक्त जिला कलेक्टर बारां कार्यालय के पटवारी निरंजन कुमार पंचोली ने मुआवजे के 80,000 रुपए देने की एवज में 10 हजार रुपए रिश्वत की मांग की। इस मामले का एसीबी ने सत्यापन करवाया तो यह सही पाया गया। इस पर एसीबी ने योजनाबद्ध तरीके से 2 मार्च 2009 को पटवारी को 5 हजार रुपए की रिश्वत लेते गिरफ्तार किया। एसीबी ने आरोपी के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश किया। न्यायालय ने गुरुवार को आरोपी को तीन वर्ष के कारावास व 50 हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया।

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घोटाले को दबाने के लिए घोटाला....

कोटा. कोटा जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (कोटा डेयरी) से सम्बद्ध दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों की ऑडिट में फर्जीवाड़े की जांच कोटा डेयरी के उप प्रबंधक (पीएण्डआई) को सौंपी गई है। वे जांच कर रिपोर्ट अग्रिम कार्रवाई के लिए सहकारी समितियों के अतिरिक्त रजिस्ट्रार को भेजेंगे।
सहकारिता विभाग के अंकेक्षण अनुभाग ने पिछले दिनों जिले की 17 दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों की ऑडिट को फर्जी माना था और इसके लिए दोषी कर्मचारियों, अधिकारियों तथा समितियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कोटा डेयरी के प्रबंध निदेशक को पत्र भेजा था।

डेयरी के प्रबंध निदेशक श्यामबाबू शर्मा ने अतिरिक्त रजिस्ट्रार को पत्र भेजकर बताया कि इस प्रकरण की अपने स्तर पर भी जांच करवा रहे हैं। इसके लिए प्रबंधक को जांच पूरी कर तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करने के आदेश दिए जा चुके हैं। जांच रिपोर्ट प्राप्त होने पर अतिरिक्त रजिस्ट्रार कार्यालय को अवगत करा दिया जाएगा।


डेयरी प्रशासन का किया बचाव
डेयरी एमडी ने फर्जी ऑडिट मामले में अपने कर्मचारियों और अधिकारियों का बचाव कर दिया है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों की ऑडिट में डेयरी प्रशासन की कोई भूमिका नहीं होती है। समिति संचालक मण्डल के निर्णय पर ऑडिटर नियुक्त करती है, वही फीस का भुगतान करती है। समितियों की ऑडिट केवल प्राप्ति रसीद लेकर लेखा परीक्षक कार्यालय को भेज दिया जाता है। जबकि समितियों की ऑडिट एमडी के हस्ताक्षर के बाद ही लेखा परीक्षक कार्यालय भेजी जाती है।

यह था मामला

अंकेक्षण विभाग ने पिछले दिनों दुग्ध उत्पादक सहकारी समितियों की अंकेक्षण रिपोर्ट का परीक्षण किया तो पाया कि जिस सीए के नाम पर ऑडिट के दस्तावेज दिए गए थे, वह ऑडिट सीए ने नहीं की थी। सीए के कूटरचित हस्ताक्षर कर फर्जी ऑडिट तैयार की गई थी। इस ऑडिट में किसी तरह के कोई आक्षेप अंकित नहीं किए गए, केवल उजला पक्ष ही रखा गया। अंकेक्षण विभाग ने दोषी कर्मचारियों और अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज करवाने के लिए पत्र लिखा था।

Rajesh Tripathi
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