बड़ी खबर: घूसखोर अफसरों ने नेताओं को भी नहीं बख्शा, नाली बनाने से हैण्डपंप लगाने तक हर काम के वसूले पैसे

जिला परिषद में गांवों का विकास 'चढ़ावे' पर टिका है। नाली, खरंजे से लेकर हैंडपंप लगाने तक के काम बिना चढ़ावा चढ़ाए शुरू नहीं होते।

Zuber Khan

December, 1506:30 PM

कोटा. जिला परिषद में गांवों का विकास 'चढ़ावे' पर टिका है। ( corruption ) नाली, खरंजे से लेकर हैंडपंप लगाने तक के काम बिना चढ़ावा चढ़ाए शुरू नहीं होते। आलम यह है कि परिषद की बैठकों में विकास कार्यों के प्रस्तावों को मंजूर करने के बाद बाकायदा प्रशासनिक स्वीकृति दे दी जाती है, लेकिन जब तक हिस्सेदारी तय नहीं होती, तब तक उनकी वित्तीय स्वीकृति जारी नहीं की जाती। बताया गया कि भ्रष्टाचार के आरोप में फरार लिपिक कमलकांत वैष्णव ऐसे ही 151 काम दबाए बैठे थे।

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गर्मी की भयावहता को देखते हुए जिला परिषद की साधारण सभा और आयोजना समिति की बैठक में ग्रामीण इलाकों में पर्याप्त जलापूर्ति करने के लिए हैंडपंप लगाने सहित करीब 50 लाख के 25 कार्यों स्वीकृत किए गए। जिला परिषद की तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने फरवरी 2019 में काम कराने के लिए प्रशासनिक स्वीकृति भी जारी कर दी, लेकिन छह महीने बीत जाने के बाद भी वित्तीय स्वीकृति जारी नहीं हो सकी। नतीजतन, गर्मियां तो गुजर गईं, लेकिन गांवों में न तो नाली खरंजे हुए और न ही हैंडपंप लग सके।

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वित्तीय मंजूरी का इंतजार
जिला परिषद की साधारण सभा की तीन अक्टूबर को बैठक बुलाई गई। बैठक में गांवों के विकास के लिए स्कूल की छतों की मरम्मत, खरंजे, नाली, शौचालय और हैंडपंप लगाने जैसे 125 विकास कार्य स्वीकृति किए गए। करीब 1.85 करोड़ के इन कामों को जिला परिषद की कार्यकारी सीईओ प्रतिभा देवठिया ने 10 अक्टूबर को प्रशासनिक स्वीकृति जारी कर दी, लेकिन मामला वित्तीय स्वीकृति पर जाकर टिक गया।


काम के बदले चढ़ावा
पंचायत चुनाव सिर पर देख सरपंच, जिला परिषद सदस्य और प्रधान अपने अपने क्षेत्रों में प्रस्तावित विकास कार्यों को जल्द से जल्द पूरा कराने की कोशिश में जुटे थे। कुछ जनप्रतिनिधियों ने तो अफसरों पर दबाव बना अपने काम करा लिए, लेकिन अधिकांश को सिर्फ वित्तीय स्वीकृति और कार्यादेश जारी कराने के लिए ही 10 फीसदी रिश्वत देनी पड़ रही थी। चौंकाने वाली बात यह है कि इसके बाद विकास कार्यों की गुणवत्ता का इम्तिहान पास कराने से लेकर बिल का भुगतान हासिल करने तक अलग से चढ़ावा चढ़ाना पड़ रहा था।

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हर कदम पर बंटवारा
एसीबी सूत्रों के मुताबिक काल्याखेड़ी के सरपंच से 25 हजार रुपए की रिश्वत लेने वाला चंद्रप्रकाश गुप्ता तो महज उस रकम को ठिकाने तक पहुंचाने का जरिया भर था।


कमलकांत के साथ जिला प्रमुख भी फरार!
एसीबी के सीआई रमेश आर्य की अगुवाई में कॉन्स्टेबल पवन कुमार और शक्ति सिंह आदि की टीम कनिष्ठ सहायक कमलकांत वैष्णव की तलाश में जुटे हैं। जबकि दूसरी टीम विकास कार्यों के लिए रिश्वत लिए जाने के मामले में जिला प्रमुख सुरेंद्र गुर्जर को तलाश उनका पक्ष और भूमिका जानने की कोशिश में जुटी है, लेकिन दोनों ट्रेप की भनक लगने के बाद से सामने नहीं आ रहे हैं। दोनों के मोबाइल तक बंद आ रहे हैं।


पत्रिका ने किया था खुलासा
राजस्थान पत्रिका ने 17 अक्टूबर को 'प्रशासनिक स्वीकृति मिलने के बाद भी शुरू नहीं हो सके 50 लाख के विकास कार्यÓ खबर प्रकाशित कर ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में चल रहे भ्रष्टाचार का खुलासा किया था, लेकिन जिला प्रमुख सुरेंद्र गुर्जर और जिला परिषद के अधिकारी इसके लिए एक दूसरे को जिम्मेदार बता मामले से पल्ला झाड़ते रहे।

ट्रेप की भनक लगते ही इटावा के रास्ते से फरार हुए कमलकांत की तलाश में दीगोद थाने और एसीबी की टीम जुटी हुई है। वहीं जिला प्रमुख सुरेंद्र गुर्जर की भूमिका भी इस मामले में काफी संदिग्ध है। एसीबी उन्हें क्लीन चिट नहीं दे रही। पहले रिपोर्ट दर्ज हो जाए फिर उनसे भी पूछताछ की जाएगी।
ठाकुर चंद्रशील, एएसपी, एसीबी कोटा

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