नहीं थम रही बाल मजदूरी, बाल श्रम के नाम अफसरों को हो रहा मोतियाबिंद,पुलिस ने चश्मा हटाया तो मिल गए 540 श्रमिक बच्चे

कानून-कायदे ताक पर, कारगर कानून के बाद भी नहीं थम रही बाल मजदूरी

कोटा. @सुरक्षा राजौरा

केस एक
तेरह वर्षीय गजेन्द्र [परिवर्तित नाम] कोटा में नयापुरा इलाके में चार कचौरी के रेस्टोरेंट पर काम करता है। सुल्तानपुर के पास एक गांव के रहने वाले इस बालक के पिता नहीं हैं। वह सुबह से कचौरी की भट्टी के सामने हलवाई की मदद में जुटा रहता है। भट्टी के सामने तेज आंच में बस खुद सिक जाता है। यह खतरा मोल लेते उसे दिन भर पुलिस और प्रशासन के अफसर देखते रहते हैं।


केस दो
धाविका दीपा यादव ने हाल ही कोटा में आयोजित चंबल चैलेंज मैराथन में पहला स्थान हासिल किया। दीपा कुछ साल पहले कोटा जिले में ही अपने माता-पिता के साथ खान में पत्थर तोडऩे का काम करतीं थीं। यह खतरनाक श्रेणी का बालश्रम है। बाद में उसने अपनी ही नानी के साथ कुछ समय तक घरों में झाडू-पोंछे का काम भी किया।


शहर में छोटी-छोटी गलियों ही नहीं मुख्य बाजारों और जिला स्तर के अधिकारियों के दफ्तर के आस-पास भी बाल मजदूर धड़ल्ले से काम कर रहे हैं। हालात इतने खराब हैं कि कलक्ट्रेट के आस-पास की दुकानों के पास ही बच्चे काम करते नजर आते हैं।


फेरी लगाकर बेचते बच्चे तो कलक्ट्रेट के अंदर तक अपना सामान बेचने जाते हैं, मजेदार बात यह कि इस परिसर में ही जिला कलक्टर से लेकर श्रम विभाग के वे सारे अधिकारी बैठते हैं, जिन पर इन बालश्रमिकों को मुक्त कराने की जिम्मेदारी है।

कोटा में पिछले दस महीनों के 300 दिनों में पुलिस ने 540 बच्चों को मुक्त करा दिया। सवाल यही है कि जब सिर्फ एक विभाग की कार्रवाई में ही औसतन हर दिन दो बच्चे मुक्त हुए तो बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के लिए अगर श्रम विभाग समेत अन्य विभाग भी जुटे तो संख्या काफी अधिक हो सकती है।


शहर में साइकिल स्टैण्ड्स पर, चाय-नाश्ते की दुकानों पर बड़ी संख्या में बाल श्रमिक नजर आते हैं। इनमें अधिकतर बच्चे अपनी मजबूरी के कारण यह काम कर रहे हैं। यह सब शहर के जिम्मेदार अफसरों को नजर नहीं आते।


परिवार के काम में खतरे में बच्चे
जानकारों का कहना है कि जब भी बाल श्रमिकों के खिलाफ कार्रवाई करने जाते हैं। अधिकांश मामलों में बच्चों को समझाकर रखा जाता है कि वे इसे अपने परिवार का काम बता दें। इसकी आड़ में बच्चों को रेस्क्यू करने से बचाने का प्रयास किया जाता है। कुछ मामलों में देखा गया है कि बच्चों को खतरनाक कामों में भी लगाया गया है। ऐसे मामले परिवार के कामों में भी सामने आए हैं। ऐसा नहीं है कि जिम्मेदार अफसर भी इन हालातों से वाकिफ नहीं हैं, लेकिन पहल नहीं करते।


पहले पांच में प्रदेश
राजस्थान देश के उन पांच राज्यों में शामिल हैं, जिनमें सर्वाधिक बालश्रमिक हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में हैं। यहां बाल मजदूरों की कुल लगभग 55 प्रतिशत है। सबसे ज्यादा बाल मजदूर उत्तर प्रदेश और बिहार से हैं। उत्तर प्रदेश में 21.80 लाख और बिहार में 10.9 लाख बाल मजदूर हैं। राजस्थान में 8.5 लाख बाल मजदूर हैं।


बाल तस्करी में अव्वल राजस्थान
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के बीते अक्टूबर में जारी आंकड़ों के अनुसार बाल तस्करी के 886 मामलों के साथ राजस्थान पहले स्थान पर है, जबकि पश्चिम बंगाल 450 ऐसे मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है। बिहार पुलिस ने 2017 में बच्चों की तस्करी करने वालों के खिलाफ 121 प्राथमिकी दर्ज की।

बच्चों से घरों में काम कराना अपराध

14 वर्ष से कम आयु के बच्चे पारिवारिक व्यवसाय में छोटा मोटा काम कर सकते हैं, ऐसे व्यापार जिनका संचालन किसी करीबी रिश्तेदार माता-पिता, भाई या बहन या दूर के रिश्तेदार इस परिभाषा में शामिल हैं। इसमें महत्वपूर्ण बात यह है कि पारिवारिक काम में भी किशोर से खतरनाक काम नहीं कराया जा सकता। मसलन, ऊर्जा, बिजली, विस्फोटकों, खान संबंधी काम नहीं कराए जा सकते हैं। ऐसे व्यवसायों की सूची बनाई गई है। बच्चे पारिवारिक व्यवसाय में सहयोग दे सकते हैं।

यह सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि इससे उनकी पढ़ाई पर कोई असर न पड़े। इस के लिए उन्हें स्कूल से आने के बाद या छुट्टियों में ही काम करना चाहिए। 10 अक्टूबर 2006 से घरों और ढाबों में बच्चों से मजदूरी कराना दण्डनीय अपराध है। ऐसा काम कराने वाले अभिभावक पर पहली बार में समझौते का प्रावधान है और दूसरी बार कानून तोडऩे पर दस हजार रुपए तक का जुर्माना है।

एडवोकेट विवेक नंदवाना



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Suraksha Rajora Desk
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