अतीत के पन्नों से....पानी की धार से बता देते समय

अतीत के पन्नों से....पानी की धार से बता देते समय

Anil Sharma | Publish: May, 18 2019 07:30:00 AM (IST) Kota, Kota, Rajasthan, India

पुराने जमाने में 21वीं सदी जैसी तकनीक भले ही ना हो, पर उनकी अपनी गणित थी....खेल में बता देते थे भविष्य।

कोटा. 21वीं सदी के इस दौर में भले ही नई-नई तकनीक की घडि़यां घर की दीवारों व हाथों में सजी हो सकती है, लेकिन पुराने जमाने में पानी की धार से समय का अंदाजा लगा लिया जाता था। उदाहरण है गढ़ पैलेस स्थित राव माधोसिंह म्यूजियम में संग्रहित जल घड़ी। खास बात यह भी देखिए वर्षों पुरानी यह जल घड़ी अब तक समय का सटीक अनुमान दे रही है। सिर्फ घड़ी ही क्यों, अच्छे कार्यों की ओर प्रेरित करने वाली ज्योतिष पच्चीसी व अन्य कई अनूठी वस्तुएं भी पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही है।

एेसी है जल घड़ी
राव माधोसिंह ट्रस्ट में एक्सीकेटिव ऑफिसर गणपत सिंह बताते हैं कि यह घड़ी करीब ३०० वर्ष पुरानी है। घड़ी हमारी विस्तृत सोच को दर्शाती है। इस घड़ी में दो कटोरानुमा पात्र है। इसके नीचे की ओर एक विशेष धातू से निर्मित पात्र है। जिसमें से एक में जल भर दिया जाता है, पूर्व में इसमें गंगाजल भरा जाता था। इसी में एक अन्य छोटा पात्र है, इसमें निश्चित आकार का छिद्र है। बड़े पात्र से पानी रिसकर इसमें आता है। इस पात्र को भरने में करीब २० मिनट का समय लगता है। इसे एक पैमाना मानते हुए इस तरह से तीन बार भरने पर एक घंटे का अनुमान हो जाता है। क्यूरेटर आशुतोष आचार्य बताते हैं कि सूर्यास्त के बाद सौर घड़ी उपयोगी नहीं होने पर जलघड़ी उपयोगी रहती थी।

ज्योतिष पच्चीसी यूं दिखाती है कल्याण की राह
आशुतोष के मुताबिक ज्योतिष पच्चीसी जैन ग्रन्थ व दर्शन पर आधारित एक चित्र है। यह इंसान की आंखों पर छाए अज्ञान को मिटा सकती है। उसे सही मार्ग पर ले जाकर मोक्ष की राह को तैयार कर सकती है। सर्प व सीढ़ी के माध्यम से अच्छे बुरे कार्यों के प्रभावों को दर्शाया गया है। इससे समझाया गया है कि मोह, माया, अहंकार व अन्य बुराइयों में पड़कर इंसान ईश्वर से दूर हो जाता है, इनसे दूर रहे तो कल्याण का मार्ग सहजता से मिल जाता है। भोजपत्र पर उकेरी गई यह चित्रकारी करीब १०० वर्ष पुरानी है। इसमें चमक अब भी वैसी ही है।

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गंजफा एक विशेष खेल

रियासतकाल में गंजफा खेल काफी लोकप्रिय रहा। शायद ही प्रदेश के अन्य म्यूजियम में इसे देखा जाए। यह ताश की तरह खेला जाता था। मुगल बादशाहों को यह काफी प्रिय था। हार जीत के दौरान सिर को खुजाने के कारण इस खेल को गंजफा नाम दिया गया। इसके बारे जानने की पर्यटकों में खासी उत्सुकता रहती है। इसे संग्रहालय में संग्रहित किया गया है।
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खासा हाथी इतना खास
इंडोर में विशालकाय हाथी शायद अन्यत्र ही देखने को मिले। शाही सवारी के लिए उपयोगी अन्य हाथियों से कद काठी में मजबूत हाथी खासा हाथी होता था, संग्रहालय में इसी की प्रतिकृति संग्रहित है। यह करीब 10 से 12 फीट ऊंचा व 12 से 14 फीट लंबा है। बताया जाता है कि इसे स्थानीय कलाकार ने गढ़ा। जर्मनी के डॉ. मेट्चगर ने इसे संग्रहालय को भेंट किया।

 

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