Holi 2019 Special Story: इतिहास के झरोखे से हाड़ोती की होली ! जानिए कैसे मनाई जाती थी रियासत कालीन होली..

Suraksha Rajora

Publish: Mar, 17 2019 06:47:09 PM (IST)

Kota, Kota, Rajasthan, India

कोटा. रियासत काल में पूरे 9 दिन तक होली की धमाल रहता था। दरबार और प्रजा एक साथ मिलकर होली के रंग में रंगते। होली के दिन प्रजा को पूरी छूट हुआ करती थी दरबार पर गुलाल, रंग फैकने की। दरबार स्वयं इस दिन को लेकर हौंद भरवाते। पानी में घुलते रंग प्रजा पर फैकतें। घोडो पर सवार होकर गली मौहल्लों में होली खेलते हुए शामिल होते थे। हर दिन महाराव व जनता अलग-अलग रंग, कलेवर, परम्परा से साथ होली पर्व मनाते थे।

 

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किसी दिन धूल की होली, तो किसी दिन गुलाल, रंग की होली, किसी दिन प्रजा की होली तो किसी दिन राणी, महाराणी, बड़ारण की होली होती थी। रियासतकाल के होली उत्सव को लोग साल भर याद रखते थे। होली के इस उत्सव के कारण ही महाराव उम्मेद सिंह की ख्याति उस जमाने में अन्य रियासतों तक फैली। इतिहासकार बताते हैं कि फागुन पूर्णिमा से होली पर्व शुरू होता था।

 

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जो नौ दिन तक चलता था। शाम 4 बजे उम्मेद भवन से जनानी सवारी शुरू होती थी। जिसमें राणीजी, महाराज कुमार बग्गी में सवार होकर रवाना होते थे। रास्ता में लाल कोठी से महाराणी जाड़ेची जी सवारी में शामिल होती थी। शाम 7 बजे गढ़ के चौक में होलिका दहन होता था। इस दौरान विधुरों द्वारा मनोरंजन के लिए हाड़ौती के लोकगीत गाए जाते थे।

 

होलिका दहन की राख से खेलते थे धुलंडी

 

होलिका दहन के बाद दूसरे दिन लोग राख से होली खेलते थे। जो होलिका दहन स्थल से राख लाते थे। अधिकांश लोग धूल से होली खेलते थे। इससे ही धुलंडी नाम पड़ा है। उस जमाने में गांवों में कीचड़, धूल, गोबर आदि से भी धुलंडी खेली जाती थी। धुलंडी के दिन रंग का कहीं भी उपयोग नहीं होता था। तीसरे दिन महाराव किराना भंडार में दवात पूजन करते थे। चौथे दिन नावड़ा की होली, पांचवे दिन हाथियों की होली खेली जाती थी। जिसमें महाराव हाथियों पर सवार होकर लोगों से होली खेलने निकलते थे। जिसमें प्राकृतिक रंगों को उपयोग होता था।

 

सातवें दिन न्हाण खेला जाता था। जिसमें सुबह शाम दरीखाना होता था। सुबह के दरीखाने में महाराव नई पोशाक पहन कर सिंहासन पर बैठते थे। नर्तकियां नृत्य करती थी। महाराव दरीखाने में गुलाल, अबीर का गोटा फेंकते थे। इसके बाद दरीखाने में उपस्थित सभी लोग आपस में रंग, गुलाल लगाकर होली खेलते थे। दरीखाने की होली के बाद महाराव राजमहल में पहुंच कर राणीजी, महाराणी जी, बड़ारण के साथ पचरंगी गुलाल से होली खेलते थे। इसी दिन गढ़ पैलेस में हाथियों की पोल के चबूतरे पर शाम का दरी खाना लगता था, जिसमें महाराव के सामने अखाड़े में जेठियों के पहलवानों की कुश्ती होती थी। पहलवानों द्वारा करतब दिखाए जाते थे।

 

 

नगाड़खाना के दरवाजे के बाहर झंडा गाड़ा जाता था। जिसे उखाडऩे के लिए अनुसूचित जाति वर्ग के युवाओं द्वारा प्रयास किया जाता था। इसी वर्ग की महिलाएं कोडे़ मारकर युवकों भगाने का प्रयास करती थी।युवक कोड़े खाकर भी झंडे को उखाड़ लाते थे। जिन्हें महाराव द्वारा गुड़ की भेली, नकदी टका, लाल-सफेद कपड़े के थान का पुरस्कार दिया जाता था। आठवें दिन को पड़त रहता था। नवें दिन दरीखाने में कचहरी व फौज के हलकारों के बीच अखाड़ा होता था। इसके साथ ही होली पर्व का समापन होता था।

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