एनकाउंटर के बारे में वे जानकारियां जो आपको जानना बेहद जरूरी है..

भारतीय कानून में 'एनकाउंटर'

 

Rajesh Tripathi

December, 0811:59 AM

कोटा. हैदराबाद में बलात्कार और हत्या के अपराधियों के एनकाउंटर के बाद देशभर में इसे लेकर बहस छिड़ गई है। एक ओर जनता ने पुलिस की तारीफ की है तो कुछ कानून के जानकार इस पर दूसरी राय रखते है। आइए जानते हैं भारतीय कानून में 'एनकाउंटरÓकी क्या भूमिका हैं।

भारतीय संविधान के अंतर्गत 'एनकाउंटर' शब्द का कहीं जिक्र नहीं है। पुलिसिया भाषा में इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब सुरक्षाबल/पुलिस और चरमपंथी/अपराधियों के बीच हुई भिड़ंत में चरमपंथियों या अपराधियों की मौत हो जाती है।

भारतीय क़ानून में वैसे कहीं भी एनकाउंटर को वैध ठहराने का प्रावधान नहीं है, लेकिन कुछ ऐसे नियम-क़ानून ज़रूर हैं जो पुलिस को यह ताक़त देते हैं कि वो अपराधियों पर हमला कर सकती है और उस दौरान अपराधियों की मौत को सही ठहराया जा सकता है।

आम तौर पर लगभग सभी तरह के एनकाउंटर में पुलिस आत्मरक्षा के दौरान हुई कार्रवाई का जिक्र ही करती है। आपराधिक संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 46 कहती है कि अगर कोई अपराधी ख़ुद को गिरफ़्तार होने से बचाने की कोशिश करता है या पुलिस की गिरफ़्त से भागने की कोशिश करता है या पुलिस पर हमला करता है तो इन हालात में पुलिस उस अपराधी पर जवाबी हमला कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले पर अपने नियम-क़ानून बनाए हुए हैं।

एनकाउंटर पर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश

एनकाउंटर के दौरान हुई हत्याओं को एकस्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग भी कहा जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इसके लिए पुलिस तय किए गए नियमों का ही पालन करे।

23 सितंबर 2014 को भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश आर एम लोढा और जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन की बेंच ने एक फ़ैसले के दौरान एनकाउंटर का जिक्र किया।

इस बेंच ने अपने फैसले में लिखा था कि पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए इन नियमों का पालन किया जाना चाहिए, उस फैसले की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं।

1. जब कभी भी पुलिस को किसी तरह की आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है, तो वह या तो लिखित में हो (विशेषकर केस डायरी की शक्ल में) या फिर किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम के ज़रिए हो।

2. अगर कोई भी आपराधिक गतिविधि की सूचना मिलती है, या फिर पुलिस की तरफ़ से किसी तरह की गोलीबारी की जानकारी मिलती है और उसमें किसी की मृत्यु की सूचना आए। तो इस पर तुरंत प्रभाव से धारा 157 के तहत कोर्ट में एफ़आईआर दर्ज करनी चाहिए. इसमें किसी भी तरह की देरी नहीं होनी चाहिए।

3. इस पूरे घटनाक्रम की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी से या दूसरे पुलिस स्टेशन के टीम से करवानी ज़रूरी है, जिसकी निगरानी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी करेंगे। यह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी उस एनकाउंटर में शामिल सबसे उच्च अधिकारी से एक रैंक ऊपर होना चाहिए।

4. धारा 176 के अंतर्गत पुलिस फ़ायरिंग में हुई हर एक मौत की मजिस्ट्रियल जांच होनी चाहिए. इसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजना भी ज़रूरी है।

5. जब तक स्वतंत्र जांच में किसी तरह का शक़ पैदा नहीं हो जाता, तब तक एनएचआरसी को जांच में शामिल करना ज़रूरी नहीं है. हालांकि घटनाक्रम की पूरी जानकारी बिना देरी किए एनएचआरसी या राज्य के मानवाधिकार आयोग के पास भेजना आवश्यक है।

कोर्ट का निर्देश है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत किसी भी तरह के एनकाउंटर में इन तमाम नियमों का पालन होना ज़रूरी है. अनुच्छेद 141 भारत के सुप्रीम कोर्ट को कोई नियम या क़ानून बनाने की ताकत देता है।

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