जोधाराम का हाई कनेक्शन, घूसखोरी के बाद काटी फरारी, निलंबन के दौरान हुआ प्रमोशन

कोटा. इंस्पेक्टर जोधाराम गुर्जर गैंगस्टर्स के लिए सालों से काम कर रहा था। आलम यह है कि डोडा पोस्त ठेकेदार से 20 लाख रुपए की घूस मांगने के मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद एक साल तक फरारी काटने और उसके बाद निलंबित होने पर भी पुलिस मुख्यालय ने उसे पदोन्नति दे दी थी।

Deepak Sharma

January, 1406:39 PM

कोटा. गिरोहों के साथ खुलेआम रिश्ते रखने वाले राजस्थान पुलिस के इंस्पेक्टर जोधाराम गुर्जर गैंगस्टर्स के लिए सालों से काम कर रहा था। उसके रसूख से पूरा पुलिस महकमा भी हलकान है। आलम यह है कि डोडा पोस्त ठेकेदार से 20 लाख रुपए की घूस मांगने के मामले में एफआईआर दर्ज होने के बाद एक साल तक फरारी काटने और उसके बाद निलंबित होने पर भी पुलिस मुख्यालय ने उसे पदोन्नति दे दी थी।

मांगता था लाखों की रिश्वत
मोड़क थाने का एसएचओ बनाए जाने के बाद जोधाराम गुर्जर पहली बार पूरे प्रदेश भर में सुर्खियों में आया था। डोडा चूरा के सरकारी ठेकेदार का लाइसेंसी ट्रक निकालने के लिए उसने 20 लाख रुपए की रिश्वत मांगी थी। डोडा पोस्त ठेकेदार से घूस की पहली किस्त के तौर पर पांच लाख रुपए लेने के लिए उसने कोटा के प्रॉपर्टी डीलर विनोद पारेता को ठेकेदार के पास भेजा था। पारेता को कोटा एसीबी ने 22 अगस्त, 2014 को जोधाराम के लिए रिश्वत लेते हुए धर दबोचा।

फरारी के दौरान हुआ प्रमोशन
पारेता की गिरफ्तारी की भनक लगते ही जोधाराम भाग निकला और करीब एक साल तक फरार ही रहा। इसी दौरान एसीबी ने घूसखोरी के इस मामले में 20 अक्टूबर 2014 को चालान पेश करते हुए उप निरीक्षक और मोडक थाना प्रभारी जोधाराम को मुख्य आरोपी बनाया, लेकिन उसने जमानत हासिल कर ली। जोधाराम की पुलिस महकमे में हनक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों, साल भर तक फरारी काटने और फिर जमानत पर रहने के बावजूद पुलिस मुख्यालय ने उसे पदोन्नत कर पुलिस निरीक्षक बना दिया। इतना ही नहीं जयपुर मुख्यालय की नाक के नीचे अक्टूबर 2015 में उसने बकायदा अपनी ट्रेनिंग भी पूरी की और उसके बाद उदयपुर में बतौर रिजर्व इंस्पेक्टर अपनी तैनाती भी करवा ली।

आईजी पर पड़ा था भारी
पारेता की गिरफ्तारी के बाद घूसखोरी के मामले में जोधाराम को अभियुक्त बनाने में एसीबी के पसीने छूट गए थे। जोधाराम के पुलिस महकमे में रसूख का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ट्रेप के बाद एसीबी मुख्यालय ने मामले की जांच तत्कालीन बूंदी चौकी के प्रभारी सीआई नीरज गुप्ता को दी थी, लेकिन एसीबी मुख्यालय में बैठे तत्कालीन अफसरों ने जांच के दौरान जोधाराम के घर पर मिले मकान, जमीन, बैंक और एलआईसी से लेकर कई विभागों के अहम दस्तावेजों की पड़ताल के नाम पर गुप्ता से जांच छीनकर जयपुर के डीएसपी शिवराम को दे दी थी। इसके बाद जोधाराम की फाइल को लेकर एसीबी मुख्यालय में भी विवाद की स्थितियां बन गई।

जुर्म प्रमाणित होने में लगे दो साल
तमाम विवादों के बाद आखिरकार एसीबी ने जून 2016 में जोधाराम के खिलाफ घूसखोरी का जुर्म प्रमाणित कर कोर्ट को रिपोर्ट सौंप दी। तब जाकर पूरे 26 महीने बाद 21 अक्टूबर 2016 को डीजीपी ने उसके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति जारी करने के साथ ही निलंबित करने के आदेश भी जारी किए। हालांकि जोधाराम ने इतने पर भी हार नहीं मानी और हाईकोर्ट में एफआईआर खारिज करने की अर्जी तक लगा दी, लेकिन जब कोर्ट ने उसकी अर्जी खारिज करते हुए भ्रष्टाचार के मामले में कड़ी कार्रवाई न करने पर पुलिस की फटकार लगाई तब जाकर बचने का कोई रास्ता न देख 21 नवंबर 2016 को चित्तौडगढ़़ एसीबी कार्यालय में खुद को सरेंडर कर दिया। इसके बाद उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था, जिसके बाद अभी तक वह निलंबित चल रहा है।

गिरोहों से सम्पर्क और उधर अफसर कर रहे सम्मान
पुलिस सूत्रों के मुताबिक जोधाराम और अजीत मोगा की आपस में खासी यारी थी, इसी का फायदा उठा कर जोधाराम ने साइबर एक्सपर्ट को रणवीर की गैंग से जोडऩे का काम किया। मजेदार बात यह कि गिरोहों से सम्पर्क रखने वाले एएसआई अजीत मोगा को उसकी उत्कृष्ठ सेवाओं के लिए वर्ष 2008 एवं 2014 में दो बार विशेष पदोन्नति दी जा चुकी है। वर्ष 2018 में उसे डीजीपी से भी सम्मानित किया गया था। इसके लिए मोगा को वर्ष 2019 में डीजीपी ने प्रशंसा पत्र और 11 हजार रुपए की नगद राशि देकर सम्मानित किया था।

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