जानिए कैसे....लाइसेंस नहीं मिलने से विकराल हुआ डेंगू!

जानिए कैसे....लाइसेंस नहीं मिलने से विकराल हुआ डेंगू!
Know how .... Dengue deteriorated due to not getting a license

Mukesh Gaur | Publish: Oct, 09 2019 06:11:44 PM (IST) | Updated: Oct, 09 2019 06:11:45 PM (IST) Kota, Kota, Rajasthan, India

नया अस्पताल : छह माह पहले खरीदी थी एक करोड़ की मशीन

कोटा. नए अस्पताल के ब्लड बैंक में छह माह पहले एक करोड़ की लागत से खरीदी गई 8 उच्च स्तरीय ब्लड कम्पोनेंट सेपरेटर मशीन लाइसेंस प्रक्रिया में उलझ कर रह गई। ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया से लाइसेंस नहीं मिलने के कारण यह मशीन अब तक चालू नहीं हो सकी है। मशीन अगर शुरू हो जाती तो इसका लाभ डेंगू, किडनी, लीवर, थैलीसीमिया से पीडि़त मरीजों को मिलता। उन्हें इलाज के 15 किलोमीटर दूर एमबीएस अस्पताल नहीं जाना पड़ता। अब उम्म्मीद तो यही है कि जल्द ही इस मशीन के चालू होने से मेडिकल कॉलेज की सुपरस्पेशयलिटी सेवाओं में इजाफा होगा।

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ट्रांसफ्यूजन से रीएक्शन की आशंका कम
ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विशेषज्ञों के अनुसार, थैलेसीमिया के मरीजों को आरबीसी, डेंगू के मरीजों को प्लेटलेट्स, बर्न के मरीजों को प्लाजमा व एफ एफ पी व एड्स के मरीजों को डब्ल्यूबीसी की जरूरत पड़ती है। यह मशीन लाल रक्त कणिकाएं (आरबीसी) श्वेत रक्त कणिकाएं (डब्ल्यूबीसी) प्लेटलेट्स, प्लाजमा फ्रे श फ्र ोजन प्लाजमा (एफ एफ पी ) को अलग करती है। ऐसे में मरीज को खून चढ़ाने के बजाए आवश्यक तत्व ही चढ़ाए जाते हैं। सेपरेटर मशीन के लगने से ब्लड ट्रांसफ्यूजन के क्रम में होने वाली रीएक्शन की आशंका कम हो जाती है।

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कुल 33 हजार यूनिट होता रक्त संग्रहण
नए अस्पताल के ब्लड बैंक में सालाना करीब 8 हजार यूनिट रक्त संग्रहित होता है। जबकि एमबीएस स्थित ब्लड बैंक में सालाना करीब 25 हजार यूनिट रक्त संग्रहित होता है।

ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन के लाइसेंस प्रक्रिया को लेकर विभाग की तरफ से पूरी तैयारी करके फ ाइल जयपुर भेजी है, जो वहां से दिल्ली गई है। ड्रग कंट्रोलर ऑफ इंडिया की टीम सर्वे करने आएगी। उसके बाद लाइसेंस मिलने पर नए अस्पताल में ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन को शुरू किया जाएगा।
डॉ. एचएल मीणा, ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन हैड

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