कोटा के श्रीकिशन का कमाल, खोजी आम की ऐसी पौध की वैज्ञानिक भी रह गए दंग

कोटा के श्रीकिशन का कमाल, खोजी आम की ऐसी पौध की वैज्ञानिक भी रह गए दंग

Rajesh Tripathi | Publish: Jul, 20 2019 06:53:57 PM (IST) Kota, Kota, Rajasthan, India

invention: श्रीकिशन की क्रांति : आम नहीं रहा मौसम का मोहताज

कोटा. आमों की मलिका नूरजहां और शहंशाह अल्फांसो के खिताब अब खतरे में पड़ चुके हैं। श्रीकिशन की आम क्रांति ने कोटा के सदाबहार को अब आमों का नया बादशाह बना दिया है। दुनिया की यह ऐसी इकलौती किस्म है, जिसके पेड़ पर बारहमासी आम लगते हैं। वह भी 250 से 350 ग्राम के खासे वजनदार। ऊपर से महज दो साल में ही फलों की ऐसी बहार आती है कि पूरे साल में एक ही पेड़ 250 किलो से ज्यादा आमों की बरसात कर देता है। बड़े-बड़े कृषि वैज्ञानिकों के कान काट चुके 11वीं जमात पढ़े किसान को इस खोज के लिए अब पेटेंट भी मिल गया है।

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चार भाई और चार बीघा जमीन... कभी गेहूं बोते तो कभी चावल और सोयाबीन... कभी प्राकृतिक आपदाएं तो कभी बीमारियों की मार से फसल बेजार हो जाती... बची फसल के दाम आढ़तिए औने-पौने लगाते... तंगी का आलम ऐसा कि दो वक्त की रोटी जुटाना तक दुश्वार हो चुका था... लेकिन, गिरधरपुरा के श्रीकिशन सुमन ने हौसला नहीं हारा...पढ़ाई छूटी तो बैल की बजाय खुद को हल में जोत दिया... काश्तकारी की ऐसी धुन सवार हुई कि खेतों को ही बिछौना बना उन्हें ही ओढ़ लिया... रोजमार्रा की जरूरतें हावी हुईं तो उन्होंने किसानी की तरीका बदला और सब्जियां उगाने लगे...लेकिन, उनके भी ऊपर-नीचे होते भाव उन्हें रास नहीं आए तो मन में फूलों की खेती का ख्याल महक उठा... मोगरे से लेकर गेंदा तक की पैदावार की, लेकिन बाजार में अलग-अलग रंग के फूलों की मांग ने गरीब किसान के अंदर छिपे वैज्ञानिक को जिंदा कर दिया। पहले हाइब्रीड गुलाबों की कलम गाड़ी फिर कई किस्मों की ग्राफ्टिंग कर ऐसे पौधे तैयार किए जिन पर पांच-पांच रंग के फूल खिलने लगे।

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रंग लाई मेहनत
इसी दौरान बच्चे की तबीयत खराब हुई तो डॉक्टर ने उन्हें तीन चार फल रोज खिलाने की हिदायत दे डाली, लेकिन बच्चा आम खाने की जिद पर अड़ गया। इसी जिद ने उनके दिमाग में खलल डाला कि आखिर हर सीजन में आम की पैदवार क्यों नहीं हो सकती? जिसका जवाब तलाशने के लिए श्रीकिशन जहां जाते आम खरीदते और उनकी गुठलियां ला कर अपने खेतों में बो देते। साल 1990 से उन्होंने तीन चार नस्लों की ग्राफ्टिंग कर नया पौधा तैयार करने का ऐसा सिलसिला शुरू किया कि पांच साल बाद एक पेड़ पर ऑफ सीजन बौर आ गया। पूरे बीस साल तक एक के बाद एक नई कलमें तैयार कर वर्ष 2010 में उन्होंने आम की ऐसी किस्म खोज डाली जिस पर बारहमासी फल आने लगे।


भौचक रह गए वैज्ञानिक
सफलता का आम चख चुके श्रीकिशन अब इसकी किस्म पता करने में जुट गए। लखनऊ के केंद्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान से लेकर आईसीएआर के चक्कर काटने लगे तो वर्ष 2012 में प्रदेश के डिपार्टमेंट ऑफ हॉर्टीकल्चर ने उनके खोजे आम की जांच करने के लिए वैज्ञानिक की तीन सदस्यीय समिति गठित कर दी। जिसने पत्तों से लेकर, टहनियों, जड़ों, फूल और फलों तक के सेंपलों की जांच कराई तो वैज्ञानिक यह जानकर भौचक रह गए कि सुमन ने आम की जो नस्ल खोजी थी, वह दुनिया से एक दम अलहदा और नई है। पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण ने आम की इस नई किस्म को अब सदाबहार नाम से पेटेंट देकर उसकी खोज का श्रेय और बागवानी का एकाधिकार भी सुमन को दे दिया है।


बेहद खास है यह आम
सदाबहार आम सालभर फल देने वाली दुनिया की इकलौती प्रजाति है। महज दो साल में ही पौधे पर फल आना शुरू हो जाता है। फल गुच्छों में लगते हैं। पकने पर फल का रंग नारंगी रंग हो जाता है और काटने पर केसरिया रंग का गूदा निकलता है। फल में रेशे बिल्कुल भी नहीं होते और औसत वजन 250 से 350 ग्राम का होता है। महज स्वाद के मामले में सदाबहार आमों के शहंशाह अल्फांसो से मिलता जुलता है। सुमन के खोजे खास आम की मांग का आलम यह है कि अमरीका, इटली, कनाडा, जर्मनी, ईरान, ईराक और साउदी अरब तक के लोग इसकी पौध लेने कोटा दौड़े चले आ रहे हैं। खरीदार तो पाकिस्तान से भी आए थे, लेकिन सुमन ने उन्हें यह कहकर बैरंग लौटा दिया कि पहले रिश्तों में मिठास लाओ, उसके बाद ही बारहमासी आम खाने को मिलेगा। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी राष्ट्रपति भवन में सदाबहार के चार पौधे मंगवाकर लगवा चुके हैं।

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