सामूहिक विवाह सम्मेलनों का चलन बढ़ने से बच रहे है करोड़ो रूपये

अकेले कोटा शहर में हर साल औसतन 50 से ज्यादा सामूहिक विवाह सम्मेलन-इज्तेमाई निकाह होते हैं जिनमें एक हजार से ज्यादा जोडिय़ां हमसफर बनती हैं।

By: shailendra tiwari

Published: 25 Apr 2018, 04:23 PM IST

कोटा . मैरिज हॉल बुकिंग से लेकर बैंड बाजा, खाना, टेंट, वैवाहिक सामान, व्यवस्थाएं और भी कई टेंशन होती हैं शादियों में। बेटी की शादी हो तो और भी मुश्किल।

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लेकिन, तेजी से बढ़ता जा रहा सामूहिक विवाह सम्मेलनों के ट्रेंड से यह सब टेंशन तो घराती-बराती परिवारों की दूर हो ही रही है, साथ ही इनसे हर साल करीब 30 करोड़ रुपयों की फिजूलखर्ची भी बच रही है। अकेले कोटा शहर में हर साल औसतन 50 से ज्यादा सामूहिक विवाह सम्मेलन-इज्तेमाई निकाह होते हैं जिनमें एक हजार से ज्यादा जोडिय़ां हमसफर बनती हैं। सामाजिक व धार्मिक संस्थाएं इन सम्मेलनों की आयोजक बन रही हैं।

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महिला अधिकारिता विभाग के पास इस वर्ष अक्षय तृतीया से पहले तक अखिल हाड़ौती मेघवाल युवा विकास समिति गणेश नगर, मालियान समाज तीनों पंचायत, देवनारायण सेवा समिति आंवली डबूकड़ा, सेनाचार्य व्यायाम शाला, मेहर नवयुवक मंडल, फूल माली सामाज समेत विभिन्न सामाजिक संस्थाओं व मुस्लिम समाज के इज्तेमाई निकाह के आवेदन आ गए थे।

फिजूल खर्ची गलत
इस्लाम में फिजूलखर्च करने वाले को शैतान का भाई बताया गया है। इज्तेमाई निकाह सम्मेलन समाज व संस्थाओं की अच्छी पहल
है। यह भेदभाव को मिटाने व समाज को संगठित करने में मददगार होते हैं।

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ढाई से तीन हजार को मिल सकता है रोजगार
सामहिक विवाह सम्मेलनों से हर साल होने वाली औसतन बचत 30 करोड़ के कई सामाजिक मायने हैं। खुद आयोजक मानते हैं कि इस रकम का उपयोग रोजगार व शिक्षा पर किया जाना चाहिए। जानकार मानते हैं कि एक से डेढ़ लाख रुपए में छोटा मोटा रोजगार शुरू किया जा सकता है। इस दिशा में सकारात्मक प्रयास हों तो 30 करोड़ रुपयों से हर साल ढाई से तीन हजार लोग रोजगार शुरू कर सकते हैं।


सादगी से ही होने चाहिएं विवाह
संत प्रभाकर ने कहा कि शास्त्रों में सामूहिक विवाह सम्मेलन का उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन महंगाई के इस दौर में आर्थिक व सामाजिक तौर पर सार्थक है। विवाह सादगी से ही होना चाहिए। अर्थ के साथ इससे इससे वायु व ध्वनि प्रदूषण भी रुकता है।

मिलता है अनुदान
सहायक निदेशक महिला एवं अधिकारिता विभाग युगल किशोर मीणा ने बताया कि सामूहिक विवाह सम्मेलन या इज्तेमाई निकाह में विवाह होने पर राज्य सरकार एक जोड़े को 18 हजार रुपए और विवाह कराने वाली संस्था को 3 हजार रुपए अनुदान देती है। नवविवाहित अपनी राशि का सुख-दुख में उपयोग में कर सकते हैं।

बढ़ती है समरसता
राजकीय कला महाविद्यालय एसोसिएट प्रोफेसर सुमन गुप्ता ने बताया कि हर व्यक्ति अपने सामथ्र्य के अनुसार खर्च करता है। फिर भी सामूहिक विवाह सम्मेलनों से सामाजिक जुड़ाव बढ़ता है। यूं तो फिजूल खर्च की कोई सीमा नहीं होती। सामाजिक समरसता के लिए सामूहिक विवाह का चलन और बढ़ाने की जरूरत है।

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