इतिहास के झरोखे से राखी: राज्य में शांति के लिए राजमाता ने सिंधिया को भेजी थी राखी

इतिहास के झरोखे से राखी: राज्य में शांति के लिए राजमाता ने सिंधिया को भेजी थी राखी

Suraksha Rajora | Publish: Aug, 15 2019 08:43:37 AM (IST) | Updated: Aug, 15 2019 09:00:49 AM (IST) Kota, Kota, Rajasthan, India

RakshaBandhan Special कोटा राज्य के इतिहास से जुड़ी है कई यादें,क्या है कहते हैं इतिहास के पन्ने,जानिए

 

 

कोटा. राखी और इतिहास के पन्नों में काफी तालमेल रहा है, खासकर कोटा की रियासत से भी राखी को लेकर रोचक व महत्वपूर्ण प्रसंग जुडे हुए हैं। कोटा की राजमाता ने भी राज्य में शांति की कामना को लेकर परेशानी के दौरान राणोजी सिंधिया को राखी भेज कर अपना धर्म भाई बना लिया जिससे राणोजी सिंधिया ने कोटा को हड़पने और लूट मार करने का विचार तो त्याग दिया। घटना अन्य भी है।

क्या है कहते हैं इतिहास के पन्ने, पढि़ए विस्तार से....

1738 ई0 में पेशवा बाजीराव ने कोटा पर आक्रमण किया था उस समय कोटा के शासक महाराव दुर्जन शाल सिंह हाड़ा ईसवी सन् (1723 से 1756 ) थे । चालीस दिन तक कोटा की घेराबंदीके बाद भी पेशवा को कोई सफलता नहीं मिली थी। तब बालाजी यशवंत कोकणस्थ सारस्वत ब्राह्मण ने महाराव दुर्जनशाल सिंह और पेशवा के बीच संधि करवाई।

इतिहासविद फिरोज अहमद ने बताया कि एवज में महाराव दुर्जन शाल कोटा को 40लाख का नजराना पेशवा को देना पड़ा था। इसके साथा ही कोटा ने पेशवा की अधीनता स्वीकार कर ली थी । महाराव दुर्जनशाल ने खुश होकर बालाजी यशवंत को बरखेड़ी नामक गांव परगना उरमाल में जागीर में दिया था राजपूताना के राज्यों को अपने अधीन करने के बाद बाजीराव पेशवा ने यह राज्य अपने सेनापति सिंधिया और होल्कर को जागीर के रूप में दे दिया।

वह समय शक्तिशाली सेनापति थे। वे राजपूताना में खंडनी की राशि (चौथवसूली ) करते थे। इस खंडनी की रकम के बंटवारे में यशवंत पंवार और तुकोजी पंवार भी जुड़ गए थे । इनको कोटा से रकम मराठों के वकील द्वारा बराबर.बराबर के हिस्से के रूप में पहुंचाई जाती थी । 1756 में कोटा महाराव दुर्जनशाल सिंह का निधन हो गया। उनके कोई पुत्र नहीं था। उन्होंने अंता गांव के जागीरदार अजीत सिंह जो निकट संबंधी थे उनके पुत्र शत्रुशाल को गोद ले लिया था ।

जब उनको गद्दी पर बैठाने की कार्यवाही चल रही थी तो कोटा फौज के सेनापति और राज परिवार में प्रभावी हिम्मत सिंह झाला ने इसका विरोध किया और कहा कि पिता के जीवित होते शत्रु शाल कोटा का शासक नहीं बन सकता । इसी कशमकश में 8 माह बीत गए। इस अवधि में कोटा का राजकाज महाराव दुर्जनशाल सिंह की पत्नी रानी राजमाता ब्रज कुँवर ने चलाया ।फिर सभी हाड़ा राजपूत सरदारों की सहमति पर अजीत सिंह को भी गद्दी पर बैठाया गया।

इस पर राणोजी सिंधिया को पता लगा तो वह आग बबूला हो गया और उसने कोटा पर आक्रमण कर दिया। इससे कोटा मराठााओं से घिर गया। संधिया के साथ होल्कर और पंवार भी थे । कोटा के लिए यह बड़ी विपत्ति का समय था इस समय राजमाता ब्रज कुंवर ने विवेक व चतुराई से काम लिया और राणोजी सिंधिया को राखी भेज कर अपना धर्म भाई बना लिया। जिससे राणोजी सिंधिया ने कोटा को हड़पने और लूटमार करने का विचार त्याग दिया।

लूटरों को भी बना लिया अपना

कोटा में पिंडारियों 1761 के बाद से ही पिंडारियों का आतंक होने लगा था। वे लटमार करते थे। अमीर खां पिंडारी पिंडारियों में सबसे ज्यादा शक्तिशाली लुटेरा था। इसकी सेना में 40हजार घाुड़सवार सैनिक थे। उस समय कोटा राज्य के शासक महाराव उम्मेद सिंह प्रथम थे । इनके शासनकाल में कोटा राज्य का दीवान और फौजदार जालिम सिंह झाला था। जो कि बहुत ही कूटनीतिक और साहसी थे।

जालिम सिंह के कई मराठा सरदारों से काफी अच्छे संबंध थे। एक सेनानायक अंबाजी इंगलिया जालिम सिंह का गहरा मित्र था। उसने जालिम सिंह को लिखा कि अमीर खां जब लूटमार के लिए जाता है तो अपने परिवार की सुरक्षा के लिए विशेष चिंतित रहता है । यदि कोटे में उसके परिवार को बसा दिया जाए तो लूटमार से बच जाएगा । जालिम सिंह ने अंबाजी की बात को मानकर आमिर के परिवार को शेरगढ़ में बसा दिया। यहां उसकी 3 पत्नियां मां तथा अन्य परिवार के सदस्य रहते थे। शेरगढ़ में अमीर ख़ां अपने परिवार को रखकर उनकी ओर से निश्चिंत हो गया। दोनों को एक दूसरे पर विश्वास हो गया। उसकी तीनों बेगमों में एक महाराव, एक जालिम सिंह और तीसरी जालिम सिंह के पुत्र माधव सिंह की राखी बंध बहनें बन गई थीं। बहन भाई के इस रिश्ते ने आमिर खां की लूट से कोटा को बचा लिया था।

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