माह-ए-रमज़ान: ईमान के साथ खुदा को सजदा करते है, ये मेहनतकश... असर लाएंगी इनकी दुआएं

Suraksha Rajora

Publish: May, 09 2019 06:30:00 AM (IST)

Kota, Kota, Rajasthan, India

कोटा. यूं तो शायर खाम ख्याली होते हैं, इसलिए वह कहने से नहीं चूकते कि शेख करता है मस्जिद में खुदा के सजदे, उसके सजदों में असर हो कि नहीं...मगर कभी उनकी नजर इन मेहनतकशों पर पड़ी होती तो शायद कह उठते कि वो करता है मशक्कत के साथ खुदा को सजदा...इसलिए उसके सजदे में दुआओं के असर जरूर नजर आएंगे।

 

ऐसे में जबकि पारा 42के पार पहुंच चुका है, घर की देहलीज पार करने तक में हलक सूख जाता है, लेकिन मेहनतकशों का तबका ऐसा भी है कि चिलचिलाती धूप और हाड़तोड़ मजदूरी के बावजूद खुदा की इबादत का रास्ता नहीं भूलता। खुदा की नेहमत हासिल करने के लिए पूरी शिद्दत से रोजे रखता है। आइए जानते है शहर के कुछ ऐसे ही मेहनतकश रोजेदारों की जुबानी...जो झुलसाने वाली इस गर्मी में भी दिनभर काम कर रहें है .......


रोजा तो पता ही नही चलता-
रमजान की शुरुआत चिलचिलाती धूप और तेज गर्मी के साथ हुई है। इसके बावजूद रोजेदारों के हौसले में कोई कमी नहीं । इबादत और रोजमर्रा के काम के साथ 15 घंटे से अधिक के रोजे कर पहला इम्तिहान आसानी से पास कर लिया और इबादत ऐसी कि रोजा तो पता ही नहीं चला। पुताई का काम करने वाले इरशाद अंसारी बताते है कि परिवार का पेट पालना है, और खुदा की बताई राह पर भी चलना है इसलिए काम को इबादत समझकर करते है।

 

उम्र नहीं बनती बाधा

रमजान में रोजे रखना एक फज़ऱ् होता है, इसी फज़ऱ् को 65वर्षीय अज्जन बड़ी शिद्धत से कर रही है। जिदंगी के कठिन दौर से गुजर रही अज्जन सलीम अंसारी के सब्र की इम्तिहान का आलम यह है कि 23बरस पहले किस्मत ने जीवन साथी छीन लिया। अपने बच्चों का पेट पालने के लिए उसे मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है

ऐसे में बीड़ी बनाने और सिलाई का काम शुरू कर दिया जो कमाई होती है उससे बच्चो की परवरिश करती रही। बच्चे तो अब अपने पैरो पर भले खड़े हो गए लेकिन अज्जान को आज भी खुद का पेट पालना पड़ता है। उम्र के इस पड़ाव में भी बीड़ी बनाने और सिलाई का काम बदस्तूर जारी है। उसकी एक ही त मन्ना है बस उसका खुदा खुश रहें इसलिए पूरे 30 दिन रोजे रखती है।

अल्लाह की ताकत पर पूरा भरोसा है-
34 वर्षीय मुन्ना भाई मोटर मार्केट में मेकेनिक का काम करता है। तपती गर्मी में लोहे और गाडियो के काम में शरीर तक जल जाता है। बावजुद इसके उसकी इबादत पर कोई फर्क नही पड़ता। पूरे 30 दिन तक रोजे के साथ अपने काम को करते है।

 

जिंदगी के कठिन परीक्षा से गुजर रहे अब्दुल सलीम


बेशक गर्मी बहुत है मगर ये अल्लाह की इबादत है और वहीं हौसला देने वाला है। हाजी अब्दुल सलीम की उम्र भी रमजान में बाधा नही बनती। उम्र के इस पड़ाव में बेटो के साथ कंधे से कंधा मिलाकर वेल्डिंग का काम करते है। ताकि किसी पर बोझ न बन सके। वे बताते है कि युवा आज कल हिम्मत हार जाते हैं लेकिन उन्हें रमजान के पाक महीने और अल्लाह की ताकत पर भरोसा रखना चाहिए। रोजा तो सवाब के साथ ही सभी बीमारियों की दवा भी है। सुबह सहरी और नमाज फिर दिनभर काम के साथ ही कब रोजा हो जाता है पता ही नही चलता।

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