रफ कोटा स्टोन का उठाव प्रभावित, तेजी मंदी में तब्दील

कोरोना महामारी में घर लौटे श्रमिक वापस नही लौटे

By: Abhishek ojha

Updated: 12 Jan 2021, 11:57 PM IST

रामगंजमंडी. कोरोना महामारी का फैलाव रोकने के लिए राज्य व केन्द्र सरकार द्वारा किए लॉकडाउन में अपने घर लौटे पत्थर प्रोसेसिंग यूनिटों में कार्यरत श्रमिकों के वापसी में रोजगार के लिए अपने गांवों से पलायन नहीं होने से प्रोसेसिंग यूनिटों में उत्पादन प्रक्रिया पर आया ब्रेक सीधे तौर पर खदानों से निकलने वाले रफ पत्थर को अब तेजी के स्थान पर मंदी के दौर पर ले आया है। गत वर्ष के मुकाबले इसी कारण 72 थरडिय़ों के होने वाले सौदे में एक रुपए फुट तो खुले में बिकने वाले मोटे व पतले पत्थरों में दो से तीन रुपए फुट तक की मंदी आ चुकी है।
रामगंजमंडी क्षेत्र में कोटा स्टोन की करीब एक हजार से ज्यादा प्रोसेसिंग यूनिट है। जिसमें खदानों से दोहन करके निकाले जाने वाले रफ पत्थरों को पॉलिश करके विभिन्न साइजों में तराशने का कार्य श्रमिकों द्वारा मशीनों के माध्यम से किया जाता है। पत्थर प्रोसेसिंग की इन यूनिटों में करीब दस से पंद्रह हजार श्रमिकों का समूह कार्य करता था। जिसमे सबसे ज्यादा श्रमिक मध्यप्रदेश के आगर, जीरापुर, राजगढ़ के साथ आलोट क्षेत्र से मजदूरी करने के लिए आते थे। ऐसे श्रमिकों का कोरोना काल के समय में औद्योगिक इकाइयों में उत्पादन प्रक्रिया बन्द करने के बाद पलायन चालू हुआ था। पैदल, मोटरसाइकिल सहित अन्य साधनों से अपने घर लौटे ऐसे श्रमिक वापस नहीं लौटे। श्रमिकों की वापसी नहीं होने का सीधा असर पत्थर प्रोसेसिंग यूनिटों पर पड़ा तो उत्पादन प्रकिया में शिथिलता आ गई। अब रात के समय में औद्योगिक इकाइयों में नाम मात्र की मशीनें श्रमिकों के अभाव में चल रही है।
श्रमिक इसलिए नहीं लौटे
कोरोनाकाल में श्रमिकों को स्थानीय स्तर पर रोजगार से जोडऩे के लिए नरेगा योजना से जोड़ा गया। ऐसे में रोजगार छोड़कर घर लौटने वाले श्रमिकों को घर बैठे रोजगार मिलना प्रारम्भ हो गया तो उन्होंने रोजगार के लिए प्रतिवर्ष चलने वाले पलायन से मुंह मोड़ लिया। गौरतलब है कि औद्योगिक इकाइयों में आने वाले मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों के गांवों में रहने वाले श्रमिकों में ऐसे श्रमिकों की बहुतायत जिनके परिवार में दो से तीन भाई है, लेकिन उनके बीच स्वयं की पांच से छ: बीघा पुश्तैनी जमीन है। कम भूमि बड़े परिवार के कारण इन परिवारों में एक से दो परिवार का एक सदस्य को खेती बाड़ी की जिम्मेदारी सौंपकर रोजगार की तलाश में पलायन होता था। औद्योगिक इकाइयों में सुलभता से कामकाज के साथ रहने का घर,पीने का पानी व बिजली की मुफ्त सुविधा श्रमिकों को मिल जाती थी।
श्रमिकों के लौटने में असमंजस्य
कोरोना के समय घर लौटे श्रमिकों की फिलहाल वापसी की कोई उम्मीद नहीं है। रबी फसल के समय फसल कटाई कार्य से ऐसे श्रमिकों को गांव में रोजगार मिला हुआ है। इस कारण वह वापस पत्थर इकाइयों की तरफ से बेरुखी बनाये है।
इकाइयों में उत्पादन गिरा तो भाव टूटे
कोटा स्टोन पत्थर के भावों में कोरोनाकाल में खदानों में उत्पादन प्रारम्भ होने के साथ रफ पत्थर लेने के लिए खदानों में नम्बर लगाने, पहले आओ पहले पाओ, मालभाड़े की एडवांस राशि जैसे पैदा होने वाले हालात बदल चुके है। खदान में कार्यरत मुंशियों द्वारा अब फेक्ट्री संचालकों को फोन करके बुलाया जा रहा है। गत वर्ष जो मूंदड़ा का मोटा थर महंगा मिला था उसमे फिलहाल दो रुपए फुट से तीन रुपए तक की मंदी है।
क्या कहते है फैक्ट्री संचालक
औद्योगिक इकाइयों में प्रोसेसिंग यूनिट संचालकों का कहना है कि दिसावर में अभी कोरोनाकाल के बाद माल का उठाव पूरी तरह से यौवन पर नहीं आया है। ऐसे में फैक्ट्रियों में जितने श्रमिक है उससे काम चलाया जा रहा है। कोरोना में घर लौटे श्रमिक भी नहीं आये हैं। ऐसे में रफ पत्थर श्रमिकों का अनुपात देखकर मंगाया जा रहा है।

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