पाकिस्तान में 5 मतलब 25 साल, तब उम्र 40 बरस थी और अब पूरा 65 का हो चुका हूं , पता नहीं अपना कोई जिंदा भी है या नहीं...

पाकिस्तान में 5 मतलब 25 साल, तब उम्र 40 बरस थी और अब पूरा 65 का हो चुका हूं , पता नहीं अपना कोई जिंदा भी है या नहीं...

Rajesh Tripathi | Publish: May, 03 2019 07:30:00 AM (IST) Kota, Kota, Rajasthan, India

लाख कोशिशों के बावजूद पाकिस्तानी पुलिस और रेंजर उन्हें जासूस साबित नहीं कर पाए, लेकिन

कोटा.बूंदी . बूंदी के जुगरात पर पाकिस्तान में हुए सितम की कहानी जितनी खौफनाक है उतनी ही दर्दनाक दास्तां पाक से लौटे अन्य भारतीयों की भी है।

पश्चिम बंगाल का हुगली जिला... यहां के बाशिंदे मुशर्रफ अली अटारी सीमा पर घूमते हुए एक रोज पाकिस्तानी सीमा में दाखिल होने की गलती कर बैठे। जिसका खामियाजा उन्हें जिंदगी के बेशकीमती 25 साल पाकिस्तानी जेलों में बिता कर चुकाना पड़ा। मुशर्रफ बताते हैं कि पाकिस्तानी रेंजर ने जब उन्हें दबोचा तब जाकर अहसास हुआ कि वह अब हिंदुस्तान में नहीं, बल्कि सरहद लांघकर पड़ौसी मुल्क में दाखिल हो चुके हैं। रेंजर ने उन्हें हिंदुस्तानी जासूस करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कई रोज तक खौफनाक यातनाओं का दौर चला। ऐसी प्रताडऩाएं मिलीं कि जिसका जिक्र करने तक से रूह फना हो उठती है। लाख कोशिशों के बावजूद पाकिस्तानी पुलिस और रेंजर उन्हें जासूस साबित नहीं कर पाए, लेकिन अवैध तरीके से मुल्क में दाखिल होने के आरोप में उन्हें अदालत ने पांच साल की बामशक्कत कैद सुना डाली।


पांच साल की सजा, 25 साल बाद रिहाई
40 साल थी तब उम्र... सोचा कि पांच साल ही तो हैं कट जाएंगे... जितना भी जुल्म हो रहा है होने दो... अपनों से मिलकर सारे जख्म भर जाएंगे... लेकिन, किसे खबर थी कि पाकिस्तान में पांच साल का मतलब 25 बरस होता है। उम्र के 65 बसंत देख चुके मुशर्रफ अब घर लौटने को बेताब हैं। उन्हें खबर नहीं कि कौन बाकी बचा है और कौन उनसे मिले बिना ही दुनिया से रुखसत हो चुका है। वह बताते हैं कि 25 साल पाकिस्तान के हैदराबाद और कराची की लांधी जेलों में काटे। जब अटारी घूमने आए थे तब उम्र 40 बरस थी और अब पूरा 65 का हो चुका हूं। गनीमत रही कि शादी नहीं की। मुशर्रफ कहते हैं कि, हालांकि जो सवाल ढ़ाई दशक तक पाकिस्तान में पूछा जा रहा था वह अब हिंदुस्तानी मीडिया पूछ रहा है। कैसे चले गए पाकिस्तान? क्या किसी सरकारी एजेंसी ने भेजा था? पश्चिम बंगाल से यहां तक कैसे आए? क्या करते थे? मुशर्रफ, गहरी सांस खींचते हुए कहते हैं कि कोई ये क्यों नहीं पूछता कि उनके वो 25 साल अब कैसे लौटेंगे और जिंदगी के आखिरी दौर में लौट भी आए तो जीओगे कैसे... किसके सहारे।

रोटी का सफर, यातनाओं का बारिश
छह साल पहले रोजी-रोटी की तलाश मुझे कोलकाता से दुबई ले गई... लेकिन, इसे बदकिस्मती ही कहेंगे कि दुबई की जिस कंपनी ने मुझे मजदूरी करने का काम दिया वह महज डेढ़ साल में ही बंद हो गई... दुबई में रहकर ही दूसरी जगह काम तलाशने की बजाय पुरानी कंपनी के साथी रह चुके बांग्लादेशी और पाकिस्तानियों के बहकावे में आ गया... और, उनके साथ मौटा माल कमाने के लालच में ईरान जा पहुंचा। ... इसके बाद मोहम्मद कौसर गहरी खामोशी में खो जाते हैं। मानो आगे के सफर का हर नामो निशां दिलो दिमांग से मिटा देना चाहते हैं।
यादों के स्याह भंवर से बाहर निकलने में उन्हें खासा वक्त लगा और जब लौटे तो दर्द और यातनाओं के सिवाय बयां करने को कुछ बाकी न बचा था।


बकौल कौसर 'हम लोग अवैध रूप से ईरान गए थे। जहां कुछ रोज में ही पुलिस ने हमें धर दबोचा। ईरानी अदालत ने जेल भेज दिया और सजा पूरी होने के बाद ईरानी पुलिस ने उठाकर बलूचिस्तान की सीमा पर फैंक दिया।Ó पाकिस्तानी रेंजर मानो हमें लपकने के लिए मानो पहले से ही तैयार बैठे थे। ईरान के बाद पाकिस्तान की पुलिस, सरकार और अदालत ने घुसपैठ के आरोप में लांधी जेल भेज दिया। चार साल की सजा कैसे काटी... या तो मेरी रूह जानती है या फिर वो खुदा ही समझ सकता है। यातनाओं का दौर ऐसा था, मानो मौत से पहले खत्म ही नहीं होगा। गनीमत है, विदेश मंत्रालय के लोगों ने हमारे घरवालों को तलाश लिया और उससे भी बड़ी नेमत है कि उनके पास हमारे हिंदुस्तानी होने के सबूत बाकी थे। नहीं तो शायद वतन वापस लौटना किसी ख्वाब जैसा ही होता।

चार साल निगल गई 'एक तारीख'
करांची की लांधी जेल से वतन वापस लौटने वालों में उत्तर प्रदेश के बागपत निवासी वाहिद खान भी शामिल हैं। २७ साल के वाहिद बताते हैं कि करीब तीन साल पहले अपने एक रिश्तेदार से मिलने वह कराची पहुंचे थे। जिस रोज वापस लौटना था उससे ठीक दो दिन पहले सख्त बीमार पड़ गए। वीजा की तारीख बढ़वाने के लिए गुहार लगाई, लेकिन इतने कम वक्त में मुमकिन नहीं हो सका। बीमार हाल ही कराची से बॉर्डर की ओर चल पड़े, लेकिन महज एक दिन की तारीख ने गुनेहगार बना डाला। वीजा का वक्त खत्म हो चुका था। पाकिस्तानी सिपाही मानो मेरे ही इंतजार में बैठे थे और उन्होंने मुझे धर दबोचा। अदालत ने भी कोई नरमी नहीं बरती। बतौर सजा एक हजार रुपये जुर्माना और डेढ़ साल की कैद का फैसला सुना दिया। अदालत की दी हुई सजा में एक साल का न जाने कब इजाफा हो गया, खबर ही नहीं लगी। लांधी जेल की दमघोंटू यातनाओं के बीच ढ़ाई साल कैसे गुजारे ये मैं ही जानता हूं। कोट लखपत और पाकिस्तानी बाकी बेरहम जेलों के बीच इस जेल में बरसने वाले कहर का कभी जिक्र नहीं होता, लेकिन आप शायद ही यकीन करें कि इस जेल में अकेला जुगराज ही नहीं था जो पाकिस्तानियों की खौफनाक यातनाओं के आगे मानसिक संतुलन खो बैठा। मैने जुगराज जैसे ५४ हिंदुस्तानी देखे हैं, लांधी की सलाखों के पीछे सुध बुध ख्रोए हुए।

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