क्यों बदलता है कोरोना वायरस स्ट्रेन- गंभीर म्यूट्रेशन साबित हो सकते है चैलेंज

कोरोना वायरस अपनी संख्या बढ़ाने के लिए अपने जैसी कॉपी पैदा करता है। जिसे रिप्लीकेशन कहा जाता है। वायरस की सरंचना व कार्यप्रणाली की सूचना उसके आनुवांशिक पदार्थ (आरएनए) में होती है।

 

 

 

By: Abhishek Gupta

Updated: 03 Jan 2021, 06:51 PM IST

कोटा. कोरोना वायरस अपनी संख्या बढ़ाने के लिए अपने जैसी कॉपी पैदा करता है। जिसे रिप्लीकेशन कहा जाता है। वायरस की सरंचना व कार्यप्रणाली की सूचना उसके आनुवांशिक पदार्थ (आरएनए) में होती है। आरएनए की कॉपी के समय यदि वायरस प्रुफ रिडिंग करता है, परन्तु नई कॉपी में कुछ भिन्नता आती है। यदि एक निश्चित संख्या से अनेक जीन बदल जाते है तो ऐसे में वायरस का नया स्ट्रेन बदल जाता है। जिसकी सरंचना व लक्षण पूर्ववर्ती वायरस से अलग होता है।

ऐसे होता है उत्परिवर्तन
कॉपी करते समय जीन में परिवर्तन आ जाना। जिसे उत्परिवर्तन कहा जाता है। प्रत्येक वायस की प्रकृति है। इंफ्लुएंजा वायरस में यह तेजी से होता है। कोरोना वायरस में इसकी रफ्तार धीमी होती है, परन्तु दो परिस्थितियों में कोरोना वायरस में गंभीर उत्परिवर्तन म्यूट्रेशन देखे गए है।

पहली स्थिति
जब वायरस मनुष्य से किसी अन्य जीव में जाता है। जैसा की नींदरलैण्ड मींक नामक प्राणी की जनसंख्या में देखा गया। उनमें कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए। वह वायरस का स्ट्रेन भिन्न था। उसका स्पाइक प्रोटीन भिन्न था। जिसके चलते वहां की सरकार ने लाखों की संख्या में मींक को मार दिया गया। यदि यह स्ट्रेन मनुष्यों में लौटता तो नए सिरे से महामारी पैदा हो जाती। नींदरलैण्ड में मींक नामक प्राणी को उच्चकोटी की फर के लिए पाला जाता है।

द्वितीय स्थिति
जब कोरोना वायरस को मनुष्य में लम्बे रहने का अवसर मिल जाता है। ऐसा उन लोगों में होता है, जिनमें प्रतिरोधक क्षमता कम होती है। जैसे कैंसर, अंग प्रत्यारोपण, एड्स, वृद्ध लोग। लम्बे समय तक मनुष्य के शरीर में रिपलीकेशन होने पर नया स्ट्रेन विकसित हो सकता है, जैसा ब्रिटेन के स्ट्रेन में देखने को मिला।

स्ट्रेन बदलने की यह प्रक्रिया सतत
जब भी वायरस मनुष्य से अन्य जीव में जाकर लौटेगा। यह खतरा मंडराएगा। नया स्ट्रेन निधान, उपचार व रोकथाम में चैलेंज साबित हो सकता है।

कैसे पहचाना जा सकता है स्ट्रेन का बदलाव
जीनोमिक सर्विलियंस के जरिए स्ट्रेन में बदलाव को शीघ्र पहचाना जा सकता है। ब्रिट्रेन में जीनोमिक सर्विलियंस की संख्या पूरे विश्व की कुल संख्या का 50 प्रतिशत से अधिक है। जिसके चलते वहां नए स्ट्रेन का तेजी से पता चल पाया। ऐसे में यूके में दिसम्बर तक लगभग 1 लाख 36 हजार कोरोना पॉजिटिव सेम्पलों का जीन विश्लेषण किया गया। जबकि अमेरिका में मात्र 52 हजार सेम्पलों का विश्लेषण किया गया। भारत के लिए यह संख्या 4 हजार ही थी। जीनोमिक विश्लेषण की संख्या बढ़ाकर कोरोना वायरस के नए स्ट्रेन की पहचान संभव हो सकती है। भारत सरकार ने जीनोमिक सर्विलियंस की दर बढ़ाने का निर्णय लिया है।

बंद करना अहम रोल
पॉजिटिव सेम्पल के जींन विश्लेषण का नीति निर्धारण में जैसे स्कू  ल, ऑफिस, रेस्टोरेंट, होटल बंद करना, किसी एरिया को सील करना आदि निर्णय में अहम रोल है। उदाहरण के लिए यदि किसी संस्था के सभी पॉजिटिव सेम्पल की जीन संरचना समान है तो वह संस्था कोरोना के फैलने का हॉट स्पॉट हो सकती है। उसे बंद करना उचित होगा। परंतु यदि किसी संस्था में आए पॉजिटिव सेम्पलों का जींन सरंचना भिन्न है तो इसका अर्थ उन रोगियों का स्त्रोत भिन्न है। संस्था हॉट स्पॉट का काम नहीं कर रही है। ऐसे में उसे बंद किया जाना जरुरी नहीं है।

इनका यह कहना
कोरोना वायरस में स्ट्रेन परिवर्तन अपेक्षाकृत धीमा होता है, परन्तु बीमारी की रोकथाम व कंट्रोल के लिए सजगता आवश्यक है। जीन विश्लेषण एक अनिवार्य प्रक्रिया होनी चाहिए, तभी हम आने वाले स्ट्रेन को पहचान पाएंगे।
- डॉ. मनोज सालूजा, आचार्य, मेडिसिन विभाग, मेडिकल कॉलेज कोटा

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