हिन्दी दिवस विशेष : शृंगार ऐसा हो कि चमके हिंदी की बिंदी

कोटा. आज हिन्दी दिवस है। हिन्दी की वर्तमान दशा और दिशा पर बात करने लगेंगे तो हिन्दी दिवस 2022 आ जाएगा, लेकिन तर्क-वितर्क कम नहीं पड़ेंगे। देश में प्रदूषण और मिलावट की मार से हिन्दी भी अछूती नहीं रही है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में मिलावट की अति हो रही है। सरकारी विद्यालयों, कॉन्वेंट शिक्षा और सरकारों को दोष देने से स्थिति में कुछ विशेष परिवर्तन नहीं पडऩे वाला। पत्रिका ने हिन्दी के साधकों से जाना कि कैसे हिन्दी को शुद्ध रखा जा सकता है।

By: Deepak Sharma

Published: 14 Sep 2021, 12:43 AM IST

कोटा. आज हिन्दी दिवस है। हिन्दी की वर्तमान दशा और दिशा पर बात करने लगेंगे तो हिन्दी दिवस 2022 आ जाएगा, लेकिन तर्क-वितर्क कम नहीं पड़ेंगे। देश में प्रदूषण और मिलावट की मार से हिन्दी भी अछूती नहीं रही है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में मिलावट की अति हो रही है। सरकारी विद्यालयों, कॉन्वेंट शिक्षा और सरकारों को दोष देने से स्थिति में कुछ विशेष परिवर्तन नहीं पडऩे वाला। इन विकट परिस्थितियों के बीच भी हिन्दी के साधक नित नया रच उसके पोषण के भगीरथी प्रयासों में जुटे हैं। पत्रिका ने उन्हीं से जाना कि कैसे भाषा की मिलावट को दूर कर हिन्दी को शुद्ध रखा जा सकता है।

अच्छाई का दुरुपयोग न हो
अतुल कनक, वरिष्ठ साहित्यकार
हिन्दी की ताकत यही है कि वो दूसरी भाषाओं के शब्दों को भी पूरी आत्मीयता के साथ आत्मसात कर लेती है, लेकिन कई बार आपकी अच्छाई का दुरुपयोग कुछ अवसरवादी प्रवृत्तियां कर लेती हैं। हिन्दी के साथ यही हुआ। विदेशी भाषाओं को अपनेपन से आत्मसात करने की इसकी उदारता को इसकी कमजोरी बना दिया गया और अब स्थिति यह है कि भाषा के नाम पर ऐसे विचित्र संस्कार नई पीढ़ी को दिए जा रहे हैं, जो भाषा के व्यवहार की सामाजिक आवश्यकता के साथ भद्दा उपहास प्रतीत होते हैं। अंग्रेजी के घालमेल को रोकने की तुलना में हमें हिन्दी के शब्दानुशासन के संरक्षण पर ध्यान देना होगा। अखबार और ऐसे वक्ता जिन्हें बड़ी संख्या में लोग सुनते हैं, इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

मिलावट नमक जितनी ही ठीक
ओम नागर युवा कवि एवं लेखक
हिन्दी आज देश की सबसे बड़ी संपर्क भाषा है। जिस तरह से हिन्दी ने भारतीय भाषाओं एवं बोलियों की शब्दावली को अपनाया है, उससे हिन्दी अधिक समृद्ध ही हुई है। जहां तक अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग का प्रश्न है, नमक की तरह अतिआवश्यक है तो ठीक है, लेकिन प्रयोग की यह अति कंकड़ की तरह चुभने लगे तो सावधान एवं सतर्क होने की आवश्यकता है। आज अपनी ही भाषा में विकल्प तलाशने के बजाय हम सहज राह चुनने लगे हैं। जिस कारण से भाषा में यह भाषायी मिलावट बढ़ रही है। हिन्दी एवं मातृ भाषा बोलना और बरतना हमारे लिए हीनता का नहीं, सदा आत्मगौरव का विषय हो।

भाषा के मामले में भी राष्ट्रभक्ति दिखाएं
शरद तैलंग, वरिष्ठ साहित्यकार
हिन्दी का हृदय विशाल है, इसलिए ये दूसरी भाषाओं को भी अपने में समाहित होने से नहीं रोकती है। अब हिन्दी हिन्दी न होकर उर्दू और इंग्लिश की मिलीजुली भाषा हो गई है, जो इतने चलन में आ गई है कि देसी लोग भी ऐसी भाषा का प्रयोग करने लगे हैं। यदि हम चाहें कि केवल शुद्ध हिन्दी ही बोलें तो वह बड़ी अटपटी और हास्यास्पद प्रतीत होगी। कुछ समय पहले तक पार्लियामेंट, सैक्रेटरीएट आदि शब्द प्रचलन में थे, लेकिन निरंतर हिन्दी शब्दों के प्रयोग से संसद भवन, सचिवालय शब्द प्रयोग में लेने लगे हैं। जरूरत है कि अंग्रेजी शब्दों की जगह, उनके हिन्दी शब्द प्रचलन में लाए जाएं तो यह समस्या हल हो सकती है। भाषा के मामले में भी लोग राष्ट्रभक्ति दिखाएं।

हिंग्लिश होने से बचाएं
डॉ. अतुल चतुर्वेदी, कवि एवं व्यंग्यकार
हिन्दी ही नहीं, आज विश्व की कई भाषाओं जैसे फें्रच, स्पेनिश आदि को भी अंग्रेजी के वर्चस्व ने प्रभावित किया। इससे न केवल भाषाओं की मौलिक पहचान समाप्त हो रही है, बल्कि उनका वजूद भी संकट में पड़ गया है। कुछ लोग यह कह कर फौरी तौर पर खुश हो सकते हैं कि हिन्दी बाजार की भाषा हो गई है। अंग्रेजी शब्दों का जबरिया प्रयोग ठीक नहीं। चैनलों के समाचार और हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं, ओटीटी सीरीज इस घातक प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रहे हैं। हिन्दी में हस्ताक्षर करें। हिन्दी और उसकी बोलियों को बढ़ावा दें। उसे हिंग्लिश होने से बचाएं, वरना हिन्दी अनुवाद की भाषा बनकर रह जाएगी, उसका वाक्य विन्यास, शब्द क्षमता प्रभावित हो जाएंगे।

अंग्रेजी का मोह छोडऩा होगा
कृष्णा कुमारी, शिक्षिका व साहित्यकार
वर्तमान में हिन्दी भाषा में अंग्रेजी के कुछ शब्द तो स्वाभाविक रूप से दूध में शक्कर की भांति घुलमिल चुके हैं। कुछ शान दिखाने के लिए बरबस मिलावट की जा रही है। इसको दूर करने के लिए वक्ता को स्वयं प्रयास करने होंगे। बच्चा सुनकर सीखता है। ऐसे में माता-पिता, परिजनों को अपने व्यवहार में भी इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा। फिल्मों और सीरियल की भाषा से भी शालीनता गायब हो रही है। समाज के विशिष्ट व्यक्तित्व भी उद्बोधन में हिन्दी के साथ अंग्रेजी का बेजा प्रयोग करते हैं। जिसका समाज अनुकरण करता है। ये बड़ी विडंबना है। सबसे अहम कि हिन्दी बोलने में शर्म नहीं, अंतस से गर्व महसूस होना चाहिए।

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