सरकारी चिकित्सालय की जांच रिपोर्ट के भरोसे बिगड़ सकती है सेहत

सरकारी चिकित्सालय की जांच रिपोर्ट के भरोसे बिगड़ सकती है सेहत

Kamlesh Meena | Publish: Jul, 07 2018 10:26:47 AM (IST) Kuchaman City, Rajasthan, India

सरकारी चिकित्सालय व प्राइवेट लैब की जांच में बड़ा अन्तर

कुचामनसिटी. नागौर जिले में अतिसुविधायुक्त कहे जाने वाले राजकीय चिकित्सालय में होने वाली नि:शुल्क जांचों पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकारी अस्पताल एवं प्राइवेट लैब में होने वाली जांचों में बड़ा अन्तर आ रहा है। राजकीय चिकित्सालय में होने वाली जांचों पर अब मरीजों का भरोसा उठने लगा है। जांच रिपोर्ट में अन्तर भी इस तरह का आ रहा है कि सामान्य मरीज को भी राजकीय चिकित्सालय में भयंकर बीमारी से ग्रसित बता दिया जाता है। ऐसी रिपोर्ट आने से मरीजों के भी होश उड़ रहे हैं। ऐसी एक नहीं, कई प्रकार की रिपोर्टें सामने आ चुकी हैं। राजस्थान पत्रिका ने कुछ जांचों की रिपोर्टों की पड़ताल की तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। मरीज भी इस तरह से हैरान है कि किसी रिपोर्ट को सही मानकर उपचार कराए। पत्रिका की जांच पड़ताल में यह भी खुलासा हुआ कि राजकीय चिकित्सालय में जांच करने वाले कई युवक बिना प्रशिक्षण प्राप्त किए ही जांचें कर रहे हैं, जिनको प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। एक वजह यह भी बताई जा रही है कि शुगर की जांच करने वाली ग्लोकोमीटर मशीन भी खासा पुरानी हो गई है।

इस तरह आ रहा है बड़ा अन्तर: सरकारी अस्पताल में बताई 477 एमजी प्रतिशत, प्राइवेट में 170 एमजी प्रतिशत
भावंता रोड स्थित मोहनलाल कुमावत ने स्वास्थ्य खराब रहने पर राजकीय चिकित्सालय में दिखाया गया, जिनको शुगर की जांच करवाने को कहा गया। मोहनलाल ने शुगर की जांच करवाई। जांच में 477 एमजी प्रतिशत शुगर बताई गई, जिसे देखकर मरीज के परिजनों के होश उड़ गए। यही जांच प्राइवेट लैब पर कराई गई, जहां 170 एमजी प्रतिशत शुगर बताई गई। यहां तक कि सरकारी चिकित्सालय के चिकित्सकों ने 477 एमजी प्रतिशत शुगर के आधार पर उपचार भी शुरू कर दिया।

ब्लड ग्रुप ही बदल दिया
उगरपुरा निवासी सीताराम कुमावत ने अपनी पत्नी पूजा कुमावत के पेट दर्द होने पर चिकित्सक को दिखाया। चिकित्सक ने ब्लड ग्रुप की जांच करवाने को कहा। मरीज ने ब्लड ग्रुप की जांच करवाई, जिसमें ए पॉजीटिव बताया। फिर दुबारा दिखाने पर भी ब्लड ग्रुप की जांच करवाने को कहा, जिसमें ए नेगेटिव बता दिया गया। यह तो गनीमत रही कि चिकित्सक ने खून की कमी नहीं बताई अन्यथा मरीज के सामने समस्या खड़ी हो जाती कि वह ए पॉजीटिव की व्यवस्था करें या नेगेटिव की।

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