पांडव काल की यह दुर्लभ वस्तु आपको हैरान कर देगी

कई वैज्ञानिक और पुरातत्ववेता इस स्थान में आकर यहां मौजूद रहस्यों को खोजने में लगे हुए है लेकिन उन्हें अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है।

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Published: 16 Jan 2015, 12:12 PM IST

जयपुर। पुरानी वस्तुएं अपने विशेष आकार और प्रकृति की वजह से लोगों को बरबस ही ईश्वर के होने पर विश्वास करने पर मजबूर कर देती है।

प्रकृति के रहस्यों को छू पाना आज भी विज्ञान के लिये चुनौती,गेंहू का 200 ग्राम का दाना आज भी हिमाचल में मौजूद है।

प्रकृति में मौजूद कई रहस्यों से पर्दा उठाने में भले ही विज्ञान ने सफलता हासिल कर ली हो लेकिन कुछ अविश्वसनीय और दुर्लभ रहस्य आज भी विज्ञान के लिये चुनौती बने हुये है जो कि इस धरती पर इंसान को भगवान का अहसास करवाते हैं ।

यूं तो देवभूमि कही जाने वाली हिमाचल प्रदेश के कोने कोने में प्रकृति के ऎसे अनछुये दुर्लभ रहस्‍य मौजूद हैं जिनकी थाह पाना इंसान के बस की बात ही नहीं है !

प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज मंडी जिला के करसोग घाटी में बने प्राचीन ममलेश्वर महादेव मंदिर को कौन नहीं जानता । इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर दूर तक है ।
ममलेश्वर महादेव का मंदिर भोले शिव और पार्वती को समर्पित मंदिर है जहां पांडवो के समय की कई दुर्लभ चीजें आज भी प्रत्यक्ष तौर पर देखी जा सकती हैं जो कि आज के आई टी के जमाने में किसी चमत्कार से कम नहीं।

पांडवो के समय का एक ऎसा गेंहू का दाना इस मंदिर में रखा हुआ है जिसका आकार आज के गेंहू के दाने से लगभग पांच हजार गुणा बड़ा है और इस दाने का वजन भी 200 ग्राम के लगभग है देखने में किसी सेब के जितना बड़ा है ।

यहां आने वाला हर व्यक्ति इस दाने के आकार को देखकर हैरान हो उठता है । इसके अतिरिक्त पांडवो के समय की कई अन्य दुर्लभ वस्तुएं यहां पर मौजूद हैं जो कि रहस्यपूर्ण होने के साथ रोमांचक भी है ।

मंदिर में आज भी पुराने समय का धूना चल रहा है जो कि पुजारियों के अनुसार कभी बुझाया नहीं गया ।

पुजारी ने बताया कि इस मंदिर के परिक्षेत्र में आज भी करीब 80 विशाल शिवलिंग जमीन में दबे हुए हैं जिनमें से कुछ तो निकाले जा चुके हैं और कुछ अभी भी जमीन में ही है ।

मंदिर के साथ एक विशाल प्राचीन मंदिर और भी है जो कि सदियों से बंद पड़ा है ।

इसे प्राचीन समय में भूडां यज्ञ के दौरान खोला जाता था और उस दौरान नरबलि की प्रथा थी तब से लेकर आज तक इस मंदिर में आम आदमी के जाने की मनाही है केवल पुजारी वर्ग को ही इसमें जाने की आज्ञा है ।

माना जाता है कि द्वापर युग में पांडव जब अपने अज्ञातवास पर थे तो उस समय अपना कुछ समय उन्होने करसोग घाटी में भी बिताया था और अपनी पूजा अर्चनाएं इस स्‍थान पर की थी जिसके प्रमाण के तौर पर यह दर्लभ चीजें आज भी यहां पर मौजूद हैं ।

कई वैज्ञानिक और पुरातत्ववेता इस स्थान में आकर यहां मौजूद रहस्यों को खोजने में लगे हुए हंै लेकिन उन्हें अभी तक सफलता नहीं मिल पाई है।
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