UP Politics : यूपी में बड़े-बड़े दलों का सियासी समीकरण बिगाड़ेगी आम आदमी पार्टी

उत्तर प्रदेश में मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी सपा-बसपा को तवज्जो न देना भले ही बीजेपी की रणनीति का हिस्सा हो लेकिन, यूपी में संजय सिंह का सुर्खियों में रहना बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है

By: Hariom Dwivedi

Updated: 07 Sep 2020, 08:21 PM IST

पॉलिटिकल स्टोरी
पत्रिका न्यूज नेटवर्क
लखनऊ. यूपी में आगामी विधानसभा चुनाव में अभी दो वर्ष का वक्त है। इस बीच प्रदेश की आठ विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं। इसके बाद त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव। यही कारण है कि प्रमुख राजनीतिक दल चुनावी मूड में आ गये हैं। बूथ स्तर पर संगठन का कील-कांटा दुरुस्त किया जा रहा है। साथ ही क्षेत्रीय, सामाजिक और राष्ट्रीय मुद्दों पर विरोधी दलों को घेरने की रणनीति बनाई जा रही है। खास रणनीति के तहत सत्तारूढ़ दल बीजेपी समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मुकाबले कांग्रेस को ज्यादा महत्व दे रही है। वहीं, लेकिन इस बीच एकाएक उत्तर प्रदेश में आम आदमी पार्टी की सक्रियता बहुत ज्यादा बढ़ गयी है। इससे भाजपा भौचक्क है।

राज्यसभा सांसद व यूपी प्रभारी संजय सिंह के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी प्रदेश में जोरदार तरीके से सक्रिय है। संजय सिंह बिजली, पानी, किसान, बेरोजगारी, कोरोना और कानून-व्यवस्था जैसे जनता से जुड़े मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठा रहे हैं। इससे नाराज मुख्यमंत्री ने सदन में संजय सिंह का नाम लिये बिना न केवल उन्हें 'नमूना' करार दिया बल्कि कोरोना से जंग में सरकार के तुलनात्मक आंकड़े भी पेश किए। मुख्यमंत्री की टिप्पणी के बाद संजय सिंह और सक्रिय हो गये हैं। कभी प्रेसवार्ता तो कभी ट्वीट कर नये-नये मुद्दों पर सरकार को घेर रहे हैं। हाल ही में उन्होंने फोन कॉल के जरिए सर्वे कराया, जिसमें बताया कि 63 फीसदी लोगों ने योगी सरकार को जातिवादी करार दिया है। इस मामले में लखनऊ के हजरतगंज थाना क्षेत्र में एफआईआर भी दर्ज कराई गई है।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो उत्तर प्रदेश में मुख्य प्रतिद्वंदी पार्टी सपा-बसपा को तवज्जो न देना बीजेपी की रणनीति का अहम हिस्सा है। लेकिन, यूपी में संजय सिंह का सुर्खियों में रहना बीजेपी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। गुंडाराज और भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रवाद व सुशासन का एजेंडा भाजपा का भी है और 'आप' का भी। इसकी संभावना ज्यादा है कि यूपी में अगर भाजपा से लोगों की अपेक्षाएं पूरी नहीं हुईं तो संभव है कि शहरी वोटरों का बड़ा तबका 'आप' की ओर रुख कर सकता है। भले ही इसका असर इस बार न दिखे, लेकिन भविष्य में आप की उपस्थिति बीजेपी के लिए चिंता का सबब बन सकती है।

शहरी मतदाताओं पर नजर
उत्तर प्रदेश में हांफती कांग्रेस को राजनीतिक फायदे के तहत बीजेपी महत्व दे रही है। बीजेपी का सपा को नजर अंदाज करने का मतलब कांग्रेस को मुख्य प्रतिद्वंदी के तौर पर लाना है। पार्टी रणनीतिकारों का मानना है कि यूपी में कांग्रेस के जनाधार सपा-बसपा के नुकसान के मूल्य पर ही बढ़ेगा। आगामी विधानसभा चुनाव में अगर मुस्लिमों ने बीजेपी से दूरी बनाई तो उनके सामने सपा-बसपा और कांग्रेस समान रूप से होंगे। सपा-बसपा की निष्क्रियता का लाभ उठाते हुए आप सांसद संजय सिंह भाजपा के नाराज शहरी मतदाताओं को रिझाने में लगातार प्रयासरत हैं। ऐसे में अगर सरकार लोगों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी तो यूपी का शहरी मतदाता तुष्टिकरण से दूर और राष्ट्रवाद से ओतप्रोत विकल्प की तलाश करेगा, संभव है उनके आम आदमी पार्टी उनके खांचे में फिट बैठे।

पांचवें दल की आहट
उत्तर प्रदेश में भले ही तमाम छोटे-बड़े दल हैं, लेकिन चुनावों में बीजेपी, सपा, बसपा और कांग्रेस सहित चार दल ही सुर्खियों में रहते हैं। इस बार पांचवें दल (आप) की आहट से शेष चार चौकन्ने हो गये हैं और नये सिरे से अपनी रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जिस तरह से संजय सिंह प्रमुख मुद्दों के साथ यूपी में सक्रिय हैं, सपा-बसपा और कांग्रेस सहित अन्य दलों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है, खासकर बीजेपी की।

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