
लखनऊ. शनिवार को देशभर में दशहरा धूम-धाम के साथ मनाया जायेगा। इस दिन पाप रूपी रावण का दहन होगा और पुण्य रूपी राम की विजय। प्रदेश में दशहरे के दिन रावण के वध और राम की विजय हर्षोल्लास के साथ मनाई जाएगी। दशहरा से पहले देश के कई हिस्सों में रामलीला का नाट्य रूपांतरण किया जाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, भगवान राम का जन्म चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को हुआ। रामलीला का मंचन कब से शुरू हुआ इसका कोई प्रामाणिक दस्तावेज तो नहीं है, लेकिन देश में पिछले अनेकों वर्षों से इसका मंचन किया जाता है। ऐसी ही सबसे प्रचीन रामलीलाओं में से एक है लखनऊ के ऐशबाग की रामलीला। पिछले साल इस रामलीला में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे और तीर चलाकर रावण का वध किया था।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल
ऐशबाग की रामलीला के बारे में बताया जाता है कि इसकी शुरुआत गोस्वामी तुलसीदास ने ही करवाई थी। इस रामलीला में गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल देखने को मिलती है। रामलीला की तैयारी हिन्दू-मुस्लिम साथ मिलकर करते हैं। हर साल रावण के जिस भव्य पुतले का दहन किया जाता है, उसे मुस्लिम समुदाय के कारीगर मुन्ना बनाते हैं। मुगल काल में ऐशबाग की रामलीला देखने खुद नवाब आसिफ-उद्दौला आया करते थे। एक बार नवाब रामलीला का मंचन देख कर इतने प्रसन्न हुए की रामलीला के लिए साढ़े छह एकड़ जमीन दे दी।
500 साल से भी अधिक पुरानी है ये रामलीला
ऐशबाग की रामलीला का इतिहास 500 साल से भी अधिक पुराना है, लेकिन इसका पंजीकरण 19वीं शताब्दी में श्रीरामलीला समिति ऐशबाग के नाम से कराया गया था। पहली बार इस रामलीला का मंचन साधुओं ने किया था। इसके बाद से निरंतर हर साल रामलीला का मंचन किया जाता है। ऐशबाग रामलीला मैदान के बारे में बताया जाता है कि जब गोस्वामी तुलसीदास पूरे अवध क्षेत्र में घूम-घूमकर रामायण का पाठ करते थे। उस समय लखनऊ में वह छांछी कुंआ मंदिर या फिर ऐशबाग अखाड़े (अब रामलीला मैदान) में ही रुकते थे।
250 से अधिक कलाकार लेते हैं भाग
ऐशबाग की रामलीला का भव्य मंचन कमेटी और कलाकारों की कड़ी मेहनत का नतीजा होता है। 1860 में रामलीला समिति बनी। रामलीला का मंचन करने के लिए कलाकार देश के कई कोनों से आते हैं। 250 से ज्यादा कलाकार रामलीला में अभिनय करते हैं, जिसमें देश के दूसरे शहरों से 60 नामी कलाकार इस रामलीला में अभिनय करने आते हैं।
मंच पर आग लगने से गई कलाकार की जान
ऐशबाग के रामलीला के कलाकारों की तारीफ हर साल होती है। दर्शक कलाकरों के अभिनय में खो जाते हैं और मंचन करने वाले कलाकार भी उसमें खो जाते हैं। इसी कारण रामलीला के दौरान एक दुखद हादसा भी हो गया था। समिति के संयोजक पंडित आदित्य द्विवेदी के मुताबिक करीब 60 साल पहले जटायु का किरदार निभाने वाले सूरजबली अपने किरदार में इतना रम गए कि वह आग लगने पर भी मंच पर डटे रहे और उनकी जान चली गई। आज भी रामलीला शुरू होने से पहले उनको नमन किया जाता है।
Updated on:
27 Sep 2017, 1:52 PM IST
Published on:
27 Sep 2017, 1:50 PM IST
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