अन्नदाता पर कहर

दो दशक से आंदोलनरत हैं उन्नाव के किसान

टिप्पणी
महेंद्र प्रताप सिंह
किसानों के कल्याण और भलाई की बातें अक्सर होती हैं। राज्य और केंद्र सरकार की प्राथमिकता में भी किसान हैं। लेकिन, जब हकीकत में किसानों के हित की बात आती है तब उसकी तस्वीर उलट ही दिखती है। उन्नाव में ट्रांस गंगा सिटी के मुआवजे को लेकर किसानों पर दो दिन हुआ बर्बर लाठीचार्ज इसका उदाहरण है। जमीन अधिग्रहण की शर्तें पूरी न किये जाने को लेकर यहां के किसान दो दशक से आंदोलनरत हैं। लेकिन, सरकारों ने कोई ध्यान नहीं दिया। अब जब स्थिति विस्फोटक हो गयी तब पुलिस और प्रशासन बैकफुट पर हैं। मान-मनौवल जारी है। किसानों को समझाया जा रहा है। सवाल है, जब किसानों को विकसित इलाके में 6 प्रतिशत जमीन देने का वादा किया गया था तब उन्हें शर्तो का पालन करने में आनाकानी क्यों? किसानों ने चेतावनी दी। आंदोलन किया। फिर जमकर बवाल हुआ। तब भी कोई अफसर घटनास्थल पर नहीं पहुंचा। मामला देशभर में गूंजा तब अब फाइलें निकाली जा रही हैं। समझौते की बात की जा रही है।

दो दशक पहले 2045 किसानों की जमीनें तब अधिग्रहीत की गयीं थीं। तब उनसे लंबे चौड़े वादे किए गए। जैसे ही किसानों ने कागजातों पर दस्तखत किए। तत्कालीन सरकार ने मनमाने तरीके से मुआवजा तय कर दिया। 2001 में तब 1.5 लाख प्रति बीघे मुआवजा बांटा गया। किसानों ने विरोध जताया, आंदोलन किया। तब 2007 में पांच लाख रुपए बढ़ा हुआ मुआवजा मिला। बात तब भी नहीं बनी। इसके बाद साल 2012 में एक्सग्रेसिया के तौर पर सात लाख रुपए प्रति बीघा और दिया गया। लेकिन अधिग्रहण की शर्तें फिर भी पूरी नहीं हुईं। किसानों ने इसी शर्त पर अपनी जमीनें दी थीं कि उन्हें अपनी जमीन के एवज में 6 प्रतिशत जमीन विकसित इलाके में दी जाएगी। ताकि वे शहरी क्षेत्र में अपना आशियाना बना सकें या फिर रोजी रोजगार के लिए दुकानें खोल सकें। लेकिन, 20 साल बाद भी उनके सपने अधूरे हैं। उन्नाव का यह उपनगर काफी विकसित हो चुका है। किसानों की उम्मीदें और लालसाएं बढ़ गयी हैं। उन्हें लगता है कि सरकार ने उनके साथ धोखा किया। अब तक 134 किसानों को मुआवजा भी नहीं मिला है। जमीनों के मालिकाना हक को सरकार नहीं निपटा पायी है।

इन तमाम वजहों से किसान आंदोलित हैं। ताजा मामले में किसानों पर दो मुकदमें दर्ज हुए हैं। तहरीर कहती है, यूपीएसआईडीसी और पुलिस दोनों पर किसानों ने हमला किया। तोडफ़ोड़ की। लेकिन, हैरानी की बात है कि किसानों की पिटाई के मामले में अब तक कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। तो क्या किसानों ने खुद ही अपना सिर फोड़ लिया? किसानों का मुकदमा आंतरिक जांच के बाद लिखा जाएगा। और सरकारी कर्मचारियों का मुकदमा बिना जांच के लिख लिया गया। आखिर यह दोहरा मापदंड क्यों?

अखिलेश सरकार में आगरा एक्सप्रेस वे और अब योगी सरकार में बलिया एक्सप्रेस वे और बुंदेलखंड एक्सप्रेस वे के लिए किसानों की जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है। हजारों एकड़ जमीन इन प्रोजेक्ट के लिए ली गयीं। लेकिन, आश्चर्य है कहीं भी मुआवजे को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ। आखिर क्यों? जाहिर है राज्य सरकार ने भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के नियमों से परे जाकर किसानों से भूमि ली। उन्हें पर्याप्त मुआवजा मिला। लोगों का पुनर्वास और पुनस्र्थापन नहीं हुआ। इसलिए लोगों ने खुशी-खुशी जमीन दे दी। एक्सप्रेस वे की नीति ट्रांस गंगा सिटी के प्रभावित किसानों के मामले में क्यों नहीं अपनायी जा सकती? एक ही प्रदेश में दोहरी नीति क्यों? योगी सरकार को किसानों को खुश करना है तो दोहरी नीति से तौबा करना होगा। तभी सुलगती आग ठंडी होगी। वरना इस आग को सुलगाने में और किसान भी आगे आ सकते हैं।

यह भी पढ़ें : मुआवजे की मांग को लेकर उन्नाव में किसानों का बवाल, पुलिस का लाठीचार्ज, प्रियंका ने योगी सरकार को लेकर दे दिया बड़ा बयान

देखें वीडियो...

Hariom Dwivedi
और पढ़े
खबरें और लेख पढ़ने का आपका अनुभव बेहतर हो और आप तक आपकी पसंद का कंटेंट पहुंचे , यह सुनिश्चित करने के लिए हम अपनी वेबसाइट में कूकीज (Cookies) का इस्तेमाल करते हैं। हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति (Privacy Policy ) और कूकीज नीति (Cookies Policy ) से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned