Jyeshth Bada Mangal 2019 :435 साल पुराना मंदिर यहाँ से नहीं कोई नहीं जाता खाली हाथ

Jyeshth Bada Mangal 2019 :435 साल पुराना मंदिर यहाँ से नहीं कोई नहीं जाता खाली हाथ

Hariom Dwivedi | Publish: May, 20 2019 07:18:04 PM (IST) | Updated: May, 20 2019 07:18:05 PM (IST) Lucknow, Lucknow, Uttar Pradesh, India

लखनऊ का यह हैं वो हनुमान मंदिर जहा रुक जाते थे नवाबों के हाथी

Ritesh Singh

लखनऊ. ज्येष्ठ महीने में पड़ने वाले मंगल को बड़ा मंगल कहा जाता है। नवाबों के शहर लखनऊ में बड़े मंगल पर जगह-जगह भंडारे लगते हैं और हनुमान जी की पूजा-अर्चना होती है। यहां हिंदू-मुस्लिम मिलकर बड़े मंगल की तैयारियां करते हैं। इस दिन शहर में कोई भूखा नहीं रहता। पुराने लखनऊ में हनुमान जी का बहुत पुराना मंदिर है, जो कभी बंजारा कुआं के नाम से जाना जाता था बाद में वह छाछी कुआं के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंदिर के महंत अंजनदास ने बताया कि वर्ष 1584 में इस मंदिर में मौजूद कुएं से लगातार तीन दिन तक छाछ निकलती रही, जिस कारण इस स्थान को छाछी हनुमान मंदिर कहा जाता है। मान्यता है कि बड़े मंगल पर यहां आने वाले भक्तों की सारी कामनाएं पूरी होती हैं।

 

 

 

 

Jyeshth Bada Mangal

ज्येष्ठ मास में बड़े मंगल पर खास योग

इसबार 4 मंगल पड़ेगे जोकि शुभ योग में हैं। जेठ का पहला बड़ा मंगल 21 मई को पड़ेगा । 19 मई से जेष्ठ का महीना शुरू हो चुका हैं । 21 मई को जेष्ठ मास की कृष्ण तृतीया से बड़े मंगल की शुरुआत हो रही है। इस दिन चंद्रमा धनु राशि में रहेगा जो मंगल की मित्र राशि है और फलदायक है।

दुसरा बड़ा मंगल 28 मई को पूर्वाभाद्रपद नक्षेत्र में पड़ेगा। पूर्वाभाद्रपद का स्वामी गुरु है जिसका ख़ास प्रभाव रहेगा। तीसरा बड़ा मंगल 4 जून को शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के साथ मृगशिरा नक्षत्र है। इसका स्वामी मंगल हैं जोकि शुभ है। चौथा और आख़िरी मंगल 11 जून को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के साथ कर्क राशि रहेगी। इस दिन सिद्ध योग रहेगा। कहा जा सकता हैंकि इस बार के चारो बड़े मंगल महाशुभ योग में हैं।

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छाछी कुआं हनुमान मंदिर जहा से कोई भी खाली हाथ नहीं जाता

पुराने लखनऊ में लक्षणपुरी क्षेत्र में हनुमान जी का बहुत पुराना मंदिर हैं जो कभी बंजारा कुआं के नाम से जाना जाता था बाद में वह छाछी कुआं के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस मंदिर के महंत अंजनदास ने बतायाकि हनुमान का मंदिर बहुत प्रसिद्ध है यह मंदिर लखनऊ का एक प्राचीन महावीर मंदिर है उन्होंने बतायाकि विक्रमी की 16वीं शताब्दी में यहां एक घना जंगल हुआ करता था और इस घने जंगल के बीच में एक कुआं था जोकि बनजारो के नाम से जाना जाता था। कुए के पास कुछ खंडहर थे जिसे देखकर यहाँ पर मंदिर होने के आसार लगाए जाते थे।

मंदिर के मंहत की माता अंजनी ने कहाकि सन् 1584 में अयोध्या से बाबा परमेश्वर दास जी लखनऊ आए और उन्होंने इस कुएं के पास एक वृक्ष के नीचे अपना डेरा डाल दिया। एक दिन महात्मा जी का कमंडल इस कुएं में गिर गया बाबा परेशान हो गए उस कमंडल के बीना उनके बहुत से काम रुक जायेगे। अब वो क्या करें। दिन भर बाद शाम को इधर से दूध वाले अपनी गाय भैंस लेकर निकले और उन लोगों ने बाबा से परेशानी का कारण पूछा बाबा के सब बता दिया उसके बाद दूध वालो ने कमंडल को निकालने का प्रयास किया कुछ लोग बस्ती में जाकर वहां से रस्सी ले लाएं जिसे कुँए में डालकर कमंडल ढूंढा जाने लगा।

बहुत देर तक खोजने के बाद भी कमंडल ना मिला तो बाबा ने स्वयं उठकर रस्सी और कांटे की सहायता से कमंडल निकाला तभी अचानक से चमत्कार हुआ बाबा के कमंडल के साथ अटकी हुई बजरंगबली की यह दुर्लभ मूर्ति चली आई। सब चकित थे। जब बाबा ने दूसरी बार पानी निकालने के लिए कमंडल कुए में डाला तो उसमे छाछ से भरा हुआ कमंडल ऊपर आया जिसे बाबा ने पुनः कुएं में ही पलट दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि 3 दिन तक उस कुए से छाछ की तरह का जल निकलता रहा जिसे तमाम लोगों ने दूर दूर से आकर चरणामृत के रूप में ग्रहण किया इसके बाद से यह स्थान छाछ कुआं कहलाने लगा।

 

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मंदिर के पीछे कब्रिस्तान में धार्मिक संघर्षों का ऐतिहासिक संदेश

माता अंजना ने बतायाकि चौथे दिन कुए का जल बदल गया तब उसका पानी इतना खारा हो गया कि मुंह में लगाना मुश्किल हो गया। यह जल मंदिर के भोग और पीने के लायक नहीं था जो बर्तन इसमें डाले जाते है वह काले हो जाते थे। कुएं से निकली हनुमान जी की तांब्र की मूर्ति मंदिर में ही हैं। यह मूर्ति कितने प्राचीन समय से यहां पर भी थी और इसको कब से विरोधियो के हाथों से बचाने के लिए नीर में छुपाया गया कुछ कहा नहीं जा सकता। मंदिर के पीछे आज भी जो कब्रिस्तान है वह यहां हुए धार्मिक संघर्षों का ऐतिहासिक संदेश है उन्होंने बतायाकि प्रमुख मूर्ति के साथ की बड़ी प्रतिमा भी प्राचीन है और उसे भी स्वयंभू विग्रह माना जाता है।

 

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इसकी स्थापना भी उसी रात की गई थी इन मूर्तियों की बनावट में भी अलग सी विशेषता हैं जो कही नहीं मिलता। गोस्वामी तुलसीदास भी इस स्थान पर आये थे। बाबा परमेश्वर दास उनके समकालीन थे यह पहले महंत 1684 में 120 वर्ष की अवस्था में मारुति पदलीन हुए। इस मंदिर के बारे में अनेक बाते प्रचलित हैं इस मंदिर के महंत परंपरा में अब तक 12 - 13 गद्दिया हो चुकी है।

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