मायावती के चलते शुरू हुआ एक महिला का राजनीतिक सफर, वर्त्तमान में हैं मंत्री

गेस्ट हाउस कांड, अग्नि कांड और गाली कांड को कभी नहीं भुला पाएंगी मायावती

By: Dikshant Sharma

Published: 15 Jan 2018, 12:52 PM IST

लखनऊ. बसपा सुप्रीमो मायावती का सोमवार को 62 वां जन्मदिन है। उनके लिए ये जन्मदिन फिलहाल पहले की तरह यादगार नहीं रहा। इस बार न उन्हें करोडों रुपये की माला पहनी और न ही उनकी उम्र के हिसाब से केक का वजन हुआ। अपनी बुक लांच के साथ उन्होंने भाजपा और सपा पर भी जम के निशाना साधा। समय के साथ कई और किस्से भी सुर्खियां बने। इनमें से एक दौरान शुरू हुआ एक भाजपा नेत्री का सफर जो वर्त्तमान में मंत्री भी हैं। चलिए हम आपको बताने जा रहें मायावती से जुड़े वो किस्से जो राजनीति में हमेशा उनके नाम के साथ जुड़े रहेंगे।

मायावती के जीवन का सबसे 'काला अध्याय' गेस्ट हाउस कांड

2 जून 1995 की वो शाम सूबे की राजनीति में किसी काले अध्याय से कम नही। एक उन्मादी भीड़ सबक सिखाने के नाम पर दलित नेता की आबरू पर हमला करने पर आमादा थी। उस दिन को लेकर तमाम बातें होती रहती हैं लेकिन, यह आज भी एक कौतुहल का ही विषय है कि शाम राजधानी के राज्य अतिथि गृह में आखिर हुआ क्या था? मायावती के जीवन पर आधारित अजय बोस की किताब 'बहनजी' में गेस्टहाउस में उस दिन घटी घटना की जानकारी आपको तसल्ली से मिल सकती है।

दरअसल, 1993 में हुए चुनाव में एक ऐसा गठबंधन हुआ जो अब शायद ही कभी हो। 2017 विधानसभा में इस गठबंधन की हवा चली लेकिन नौबत नहीं आ सकी। ये गठबंधन था सपा और बसपा के बीच। 1993 के चुनाव में इस गठबंधन की जीत हुई और मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुखिया बने। लेकिन, आपसी मनमुटाव के चलते 2 जून, 1995 को बसपा ने सरकार से किनारा कस लिया और समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। इस वजह से मुलायम सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई।

सभी जोड़-घटाव के बाद जब बात नहीं बनी तो नाराज कथित सपा कार्यकर्ता और विधायक लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस पहुंच गए। मायावती कमरा नंबर-1 में ठहरी हुई थी। इसी दिन को गेस्टहाउस कांड कहा जाता है। कहा जाता है कि कुछ गुंडों ने बसपा सुप्रीमो को कमरे में बंद करके मारा और उनके कपड़े फाड़ दिए। जाने वो क्या करने वाले थे कि तभी अपनी जान पर खेलकर उन गुंडों से अकेले भिड़ने वाले बीजेपी विधायक ब्रम्हदत्त द्विवेदी ने गेस्टहाउस का दरवाजा तोड़कर मायावती को बाहर निकाल लाये थे।

ये नाही सिर्फ प्रदेश बल्कि भारत की राजनीती के माथे पर भी कलंक से कम नहीं। खुद मायावती ने कई बार कहा है कि जब मैं मुसीबत में थी तब मेरी ही पार्टी के लोग उन गुंडों से डरकर भाग गये थे लेकिन ब्रम्हदत्त द्विवेदी ने अपनी जान की परवाह किये बिना मेरी जान बचाई थी। वे ब्रम्हदत्त को भाई कह कर सम्बोधित करने लगीं।

जब धू-धू कर जला उठा था रीता बहुगुणा जोशी का घर

15 जुलाई 2009, रात 9 बजे के आसपास, लाल बहादुर शास्त्री भवन यानी सचिवालय से कुछ ही कदम दूर स्थित तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी का घर स्वाहा हो गया। रीता बहुगुणा जोशी के घर पर कथित बसपा कार्यकर्ताओं ने हमला किया।

दरअसल सत्ताधारी सुप्रीमो पर रीता बहुगुणा ने टिप्पणी की थी। उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि ये उन्हें इतनी भारी पड़ेगी। रीता बहुगुणा ने एक रैली में कथित रूप से मायावती के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। इसका खामियाज़ा भी रीता को उठाना पड़ा। रीता के घर से हजरतगंज फायर स्टेशन का रास्ता महज 5 मिनट का था, लेकिन फायर सर्विस की गाड़ी लगभग 45 मीनट बाद मौके पर पहुंची। हुसैनगंज पुलिस ने मामले में लीपापोती करते हुए किसी दूसरे मामले में थाने लाए गए शिव कुमार सिंह, इंदर सिंह, गुडडू यादव, सुशक्ति कुमार तिवारी और जमीर खान को अग्निकांड का आरोपी बताते हुए जेल भी भेज दिया था। हालाँकि सीबीसीआईडी जांच में क्लीनचिट दिए जाने के बाद रिहा कर दिया गया।

रीता बहुगुणा जोशी के मकान को जलाने के आरोपी बहुजन समाज पार्टी नेता इंतज़ार अहमद आब्दी को मुख्यमंत्री मायावती ने उपहार स्वरुप लाल बत्ती भी दी थी। उन्होंने राज्य गन्ना संस्थान का चेयरमैन बनाया गया था।

कांग्रेस ने इस घटना की निंदा करते हुए आरोप लगाया था कि जिन लोगों ने घर में आग लगाई थी वह बसपा के गुंडे थे। साथ ही पुलिस कर्मियों की भी इस घटना में मिली भगत होने के आरोप लगाए थे। सीबीसीआईडी की जांच में पुलिस की भूमिका संदिग्ध भी पाई गयी।

दयाशंकर की टिप्पणी, सार्वजनिक मंच पर किया मया ने गाली कांड को याद

जुलाई 2016 में भाजपा के तत्कालीन प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने बसपा सुप्रीमो पर अभद्र टिप्पणी की। माहौल एका एक ऐसा गरमाया कि बसपा सुप्रीमो मायावती पर आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद से कड़वे बोलों की राजनीती शुरू हो गयी। बसपा कार्यकर्ता प्रदेश भर में सड़कों पर उतर आए। लखनऊ में प्रदर्शन कर रहे बसपा कार्यकर्ताओं ने दयाशंकर को तो बुरा भला कहा ही साथ ही उनकी 'माँ-बहन' पर भी टिप्पणी करने से पीछे नहीं हटे। मानो इस दौर की राजनीति जैसे कड़वे बोलों के इर्द गिर्द ठहर गई हो। इसका फर्क सियासी समीकरणों पर भी पड़ा। भाजपा को जहां दयाशंकर को निष्कासित करना पड़ा वही दयाशंकर की पत्नी स्वाति सिंह का राजनीतिक सफर शुरू हुआ।

शुरू हुआ स्वाति सिंह का राजनीतिक सफर
भाजपा ने स्वाति सिंह को दयाशंकर सिंह की गलती छुपाने के लिए ट्रम्प कार्ड की तरह इस्तेमाल किया। उन्हें महिला मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। उन्होंने उस दौरान मायावती को सामान्य सीट से चुनाव लड़ने की चुनौती भी दे डाली। 2017 चुनाव में वे सरोजनी नगर से चुनाव जीती और योगी के मंत्री मंडल में अपनी जगह पक्की की। यूं कहे जाने अनजाने में ही सही मायावती के चलते ही स्वाति सिंह का राजनीतिक सफर शुरू हुआ।

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