अवैध खनन की सीबीआई जांच में रसूखदारों के नाम के कारण हो रही देरी !

अवैध खनन की सीबीआई जांच में रसूखदारों के नाम के कारण हो रही देरी !
Illegal Mining

उत्तर प्रदेश में अवैध बालू खनन के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश पर शुरू हुई जांच का अब तक कोई नतीजा नहीं निकल सका है। 

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में अवैध बालू खनन के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेश पर शुरू हुई जांच का अब तक कोई नतीजा नहीं निकल सका है। अवैध खनन को लेकर दाखिल एक याचिका पर कोर्ट ने शुरुआती दौर में कुछ जनपदों में हुए खनन के मामलों की जांच के आदेश दिए थे। बाद में अवैध खनन से जुड़े प्रदेश के सभी मामलों को इस जांच में शामिल करते हुए विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा था। सीबीआई जांच को शुरू हुए लगभग एक साल हो चुके हैं। इस बीच न तो किसी अधिकारी की गिरफ़्तारी हुई न ही कोर्ट में खनन के दोषियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई। खनन माफियाओं का कारनामा बुंदेलखंड से लेकर सोनभद्र तक नदियों के तटों और पहाड़ों के आसपास बिखरे दिखाई दे जाता हैं। यह हैरत की बात है कि वैध और अवैध खनन की सारी जानकारी होने के बावजूद जांच की गति बेहद धीमी हो गई है। 

सीबीआई ने सभी जगहों से जुटाई है जानकारी 

हाईकोर्ट ने जुलाई 2016 में अवैध खनन के खिलाफ जांच के सीबीआई को आदेश दिए थे। इसके बाद सीबीआई ने सोनभद्र, मिर्जापुर, झाँसी, महोबा, बांदा, हमीरपुर सहित पूरे प्रदेश के खनन प्रभावित जनपदों में छापेमारी और पूछताछ की थी। तब सीबीआई की कार्रवाई की आशंका के चलते खनन विभाग के कई अफसरों को जिलों से हटाकर मुख्यालय शिफ्ट किया गया था। इन सबके बीच धीरे-धीरे जांच की रफ़्तार सुस्त हो गई और खनन का खेल फिर से शुरू हो गया। जानकार मानते हैं कि अवैध खनन के खेल में बड़ी संख्या में गैर कानूनी रूप से पहाड़ों को काट डाला गया और नदियों को खोदकर बेतरतीब बालू निकाला गया। अवैध बालू खनन का खेल बसपा सरकार में जहाँ एक सिंडिकेट के रूप में संचालित हो रहा था वहीँ सपा सरकार में यह काम प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग नेताओं के माध्यम से अंजाम दिया जाने लगा। अवैध खनन के इस खेल में सिर्फ तत्कालीन सत्ताधारी दलों से जुड़े लोग शामिल रहें हो, ऐसा भी नहीं है। कई जनपदों में तो भाजपा नेताओं के रिश्तेदारों ने भी बड़े पैमाने पर नेटवर्क विकसित कर अवैध खनन के काम को अंजाम दिया।

ऊपर तक है अवैध खनन कारोबारियों की पहुंच 

अवैध खनन के कारोबार में सीबीआई ने प्रारम्भिक रूप से पर्याप्त साक्ष्य जुटा लिए हैं लेकिन कार्रवाई इतनी आसान नहीं है। अवैध खनन के सिंडिकेट में सिर्फ नेता और बालू माफिया ही शामिल रहे हों, ऐसा नहीं है। इस सिंडिकेट में खनन विभाग के अफसरों से लेकर मंत्रालय तक की भूमिका रही है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने कई बार सम्बंधित जिलों के डीएम और एसएसपी को सीधे पत्र लिखकर अवैध खनन के मामलों पर रोक लगाने को कहा था। इन सारे घटनाक्रमों के बावजूद कहीं भी अवैध खनन नहीं रुका। कुछ जिलों में डीएम और एसएसपी ने इसे अपनी नाक का सवाल मानते हुए अवैध खनन पर रोक लगाने के लिए अभियान चलाये तो कई जिलों में बड़े अफसरों का तबादला सिर्फ इसलिए कर दिया गया क्योकिं उन्होंने अवैध खनन के कारोबार पर हाथ डालने की कोशिश की। आईएएस अफसर दुर्गा शक्ति नागपाल का मसला इस पूरे मामले की एक बानगी भर है। 

जांच रिपोर्ट पर है नजर 

ऐसे में यह अंदाजा लगाना आसान है कि सीबीआई ने यदि निष्पक्ष जांच रिपोर्ट तैयार की तो किन-किन लोगों की गर्दन फंस सकती है। सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी कार्रवाई के लिए फिलहाल प्रदेश सरकार या फिर खुद सीबीआई तैयार है। अफसरों या नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कौन-कौन से राज खुलेंगे और कौन-कौन सी नई कहानियां सामने आएंगी, यह भी बहुत सारे लोगों के दिलों की धड़कने बनाने वाली हैं। जानकार मानते हैं कि सीबीआई की जांच रिपोर्ट और पूछताछ के बाद चार्जशीट में ऐसे नाम भी आ सकते हैं जो अब तक बेहद सफेदपोश रहें हों और जिनके खिलाफ कार्रवाई का किसी ने अनुमान भी न लगाया हो। 

जारी है अवैध खनन 

इन सारी प्रक्रियाओं के बीच अवैध खनन धड़ल्ले से जारी है। बुंदेलखंड के लेकर सोनभद्र तक अवैध खनन के खेल पर रोक नहीं लग सकी है। आगरा से लेकर हमीरपुर तक अवैध बालू खनन और इनके परिवहन को अलग-अलग तरीकों से अंजाम दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेश में भले ही अवैध खनन को रोकने के लिए नई नीति का ऐलान कर दिया हो लेकिन जानकार इस नई नीति पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं। माना जा रहा है कि जब एक वर्ष के लिए पट्टे दिए जाते थे और मांत्र 149 वैध पट्टे थे, तब बालू माफियाओं ने नदियों को खोदकर उनके अस्तित्व को चुनौती दे डाली। अब जब नए टेंडर में लीज की अवधि को और अधिक बढ़ाने की बात कही गई है तो निश्चित तौर पर खनन के साथ ही अवैध खनन के कारोबार का भी विस्तार होगा। 
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