कोरोना और पैदल यात्री : योगी जैसा मानवीय दिल हर सीएम को रखना होगा

विस्थापित मजदूरों के लिए अलग से हो पैकेज की घोषणा

महेंद्र प्रताप सिंह

वे निकल रहे हैं सैकड़ों। पैदल ही चले जा रहे हैं। लगातार। कहीं झुंड में, कहीं अकेले। बच्चे हैं, नौजवान लडक़े हैं। दुधमुंहे बच्चों को गोद में लिए औरतें हैं। पीठ पर सामान लादे अधेड़ हैं। पीने का पानी तक नहीं है इनके पास। डरे-सहमे ये लोग पुलिस वालों को नजरों को बचते-बचाते भागे जा रहे हैं। यह मानव पंक्ति टूटती ही नहीं। यह समूह कोई पदयात्रियों का दल नहीं। यह तीर्थयात्री भी नहीं। ये लोग उन शहरों से निराश होकर निकले हैं, जिसकी गाड़ी के ये ईंधन हैं। पीठ पर सवार शहरी अर्थव्यवस्था को इन सबने उतार फेंका है। इनकी पीठ पर लदी है सपनों की गठरी। कोरोना से निपटने के लिए सरकार ने अपना खजाना खोल दिया है। 1.70 लाख करोड़ के राहत पैकेज का एलान किया है। लेकिन, यह खबर भी इन्हें तसल्ली नहीं दे पायी।

हर क्षणांस व्हाट्स का ज्ञान जो हर किसी के दिमाग को कोरोना से भी ज्यादा संक्रमित कर रहा है, वह भी इन्हें नहीं रोक पाया। इन सबने खामोशी से मान लिया, यही इनका नसीब है! ख़ुद को सबने इस राष्ट्र का अतिरिक्त इंसान मान लिया। इसलिए बस चुपचाप चल पड़े। सरकार से सवाल करने की भी नहीं सोची। जिन फैक्ट्रियों ने बाहर किया। उनसे भी कुछ नहीं पूछा। गांवों से यह भूख मिटाने शहरों को आए थे। भूखे पेट गांव जा रहे हैं। आखिरी उम्मीद गांव है, वह बखरी है। जिसमें अनाज भरा है। पता है भूख वहीं मिटेगी। घर में ही प्यार से पीठ पर कोई हाथ फेरेगा। परदेशियों ने दुत्कार दिया, इसलिए ये भागे जा रहे हैं...अनवरत।

अगर, इनमें से किसी को भी कोरोना संक्रमण हुआ तो? ये सब जिन गांवों में पहुंचेंगे सब असुरक्षित हो जाएंगे। लेकिन, इन्हें कौन रोकेगा? वे जो इन्हें उकडूं करके मेंढक की तरह सडक़ पर दौडऩे को मजबूर कर रहे हैं? वह लाठीवीर पुलिस, जिसकी सामाजिक हैसियत में इनसे एक-दो दर्जा ही ऊपर है, वह। उफ्फ। कोरोना का ऐसा खौफ। पुलिसवाला इन्हें इंसान की तरह चलने लायक भी नहीं माना। डरे हुए दिल आखिर किससे मदद की फरियाद करें। गांव के लोग बाहर से आने वालों को शक की निगाह से देख रहे हैं। भला हो यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का। उन्होंने दरियादिली दिखाई है। पैदलयात्रियों को यूपी की सीमा तक वाहनों से भेजवाने की व्यवस्था करवाई है। लेकिन, इन पैदल यात्रियों का घर पहुंचने पर भी संकट टला नहीं है। यह मुसीबत कैसे दूर होगी?

हजारों ग्रामीण जो बड़े शहरों से अपने घर लौटे हैं। उनके चेहरे पर भले ही संतोष का भाव है। पर पूरे गांव की हवाइयां उड़ी हैं। कोरोना को लेकर सभी सशंकित हैं। एक व्यक्ति की छींक... पूरे गांव में खलबली मचा रही है। कंट्रोल रूम, डीएम, सीडीओ, सीएमओ के फोन घनघना रहे हैं। वह अछूत हो गया। ... तो आखिर उपाय क्या है। सरकार को चाहिए ग्रामीण इलाकों के परिषदीय विद्यालयों, पंचायत भवनों आदि को जल्द से जल्द साधारण आइसुलेशन वार्ड और ओपीडी में तब्दील करे। जिले के सभी निजी चिकित्सकों की स्वास्थ्य सेवाएं ली जाएं। शहरों से लौटे ग्रामीणों का स्वास्थ्य परीक्षण हो। तभी गांव का खोया सुकून और बेफिक्री लौटेगी। लॉकडाउन के बाद सब कुछ गंवा बैठे विस्थापित ग्रामीणों के लिए अलग से राहत के इंतजाम हों।

बहरहाल, कोरोना से लड़ाई के लिए लॉकडाउन ज़रूरी था। लेकिन, बड़े शहरों में काम करने वाले लोगों के लिए सरकार को बस आदि बंद करने के पहले इन्हें अपने घर जाने का अवसर देना ज़रूरी था। यह एक भयानक और डरावनी त्रासदी है। थोड़ी सी एडवांस प्लानिंग करके इससे बचा जा सकता था। काश। सरकार ऐसा कर पाती तो इंसानी बेबसी के इतने तकलीफ भरे चेहरेे, बेचारगी का इतना डरावना रूप देखने को न मिलता।

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सरकार को अब पैदल यात्रियों के दर्द से एक सबक लेने की भी जरूरत है। नीति-निर्माता अब जब भी कोई फैसला लें तो उनके सामने सिर्फ शहरी, उच्च और मध्यम वर्ग ही न हो। पैदल यात्री... भी दिमाग में होने चाहिए। उन्हें नहीं भूलना चाहिए, यह देश आंतरिक विस्थापितों का है। लाखों लोग रोजी-रोटी और शिक्षा के लिए अपना घर-बार छोड़ कहीं और रहते हैं। एक अजनबी शहर में अचानक रोजी-रोटी की आस खत्म हो जाए और उनकी मौजूदगी को शक की नजर से देखा जाए तो उनके पास अपने घर लौटने के सिवा कोई चारा नहीं रह जाता।

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