मुश्किल होता है पीपीई पहनकर कोरोना मरीजों का इलाज करना, पीजीआई के डॉक्टर ने साझा किया अनुभव

उत्तर प्रदेश में कोरोना मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कोरोना मरीजों का इलाज डॉक्टरों के लिए कितना मुश्किल होता है।

By: Neeraj Patel

Published: 01 Apr 2020, 06:58 PM IST

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में कोरोना मरीजों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। कोरोना मरीजों का इलाज डॉक्टरों के लिए कितना मुश्किल होता है, इस बारे में लखनऊ पीजीआई के डॉक्टर अजय शुक्ला ने अपना अनुभव साझा किया है। डॉक्टर अजय शुक्ला बताते हैं कि कोरोना मरीजों के इलाज में पहने जाने वाला पीपीई पीड़ादायक है साथ ही जोखिमभरा भी है।

डॉक्टर अजय शुक्ला ने बताते हैं कि इन दिनों अस्पतालों में कोरोना संक्रमित मरीज देखे जा रहे हैं। कोरोना के लेकर हर मोड़ पर लोगों को खतरे का अहसास हो रहा है। डॉक्टर साहब बताते हैं कि पर्सनल प्रोटेक्टिव एक्विमेंट (पीपीई) ड्रेस पहनकर काम करना आसान नहीं होता है। इसके साथ ही मास्क व चश्मे का दबाव नाक व चेहरे को पर जख्म दे देता है। जब आप गाउन पहने रहते हैं तो शरीर कम हिल डुल पता है। जिससे काफी परेशानी होती है। कई बार तो ऐसा होता है कि जब सांस छोड़ते है तो मंह से निकलने वाली गर्म हवा से चश्मे के कांच भी धुंधले हो जाते हैं। जिससे देखने में भी समस्या आती है।

डॉक्टर अजय शुक्ला बताते हैं कि जब कोविड वार्ड में कोरोना से संक्रमित मरीजों का इलाज करते हैं तो अपनी सुरक्षा के लिए सिर से लेकर पैर तक शरीर को खास उपकरणों से ढकना होता है, जिससे हम लोग संक्रमित होने से बच सकें। कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज करने वाले सभी डॉक्टरों को लगभग हर स्टेप के बाद साबुन से हाथ धोने पड़ते हैं। हम डॉक्टरों को ग्लव्ज, गाउन, मास्क, गॉगल और शू कवर को एक निर्धारित क्रम में पहनना होता है। इस प्रक्रिया में कम से कम आधा घंटा लग जाता है। इसके अलावा कोई सामान वार्ड में नहीं ले जा सकते हैं।

पीपीई पर सबसे ज्यादा वायरस

जब डॉक्टर पीपीई उतारते हैं तो ध्यान देने की खास जरुरत होती है, क्योंकि उसकी बाहरी सतह सबसे अधिक संक्रमित हो जाती है। इसलिए पीपीई उतारते समय बहुत ही सावधानी बरतनी पड़ती है। वहीं जब पीपीई उतारते हैं तो 45 मिनट लग जाते हैं। उसके बाद इस वस्त्र को नष्ट कर दिया जाता है। फिर खुद को सेनेटाइज कर बाहर निकलना होता है। सभी डॉक्टरों को ड्यूटी के दौरान परिवार से अलग रहना पड़ता है।

बंद क्षेत्र में सबसे ज्यादा रहता है संक्रमण

पीजीआई के डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना वायरस का खतरा हर दीवार और हर कोने में हो सकता है। इसलिए उन्हें कोरोना संक्रमित मरीजों के साथ एक बंद क्षेत्रों में रहना पड़ता है। इस बंद क्षेत्र में कोरोना वायरस के संक्रमण सबसे ज्यादा मात्रा में रहते हैं। जिससे हम लोगों को को भी कोरोना से संक्रमित होने का जोखिम उठाना पड़ता है। इस बंद क्षेत्र में कोई भी वस्तु हो चाहे वो टेबल, चाकू, ग्लव्ज, डॉक्टरों के औजार और कोई अन्य सामान भी क्यों न हो सभी में कोरोना वायरस के संक्रमण रहते हैं। जिससे बचने के लिए हम डॉक्टरों के बहुत सावधानी वरतनी पड़ती है। क्योंकि इन सभी वस्तुओं से चिकित्सा कर्मियों को संक्रमण का खतरा रहता है।

पीपीई के अन्दर होती है घबराहट

कोरोना वार्ड में मरीजों के इलाज के दौरान कुछ लोगों को तो घबराहट, सिरदर्द, पेट में जलन आदि सब कुछ सहना पड़ता है। जब लोग पीपीई पहने हुए होते है तो वह पीपीई पहनने के दौरान खाना तो क्या शौचालय के लिए भी नहीं जा सकते हैं। जब लोग पीपीई उतारते हैं तो उसके बाद भी लोगों को पूरी तरह से वॉश होना पड़ता है।

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