scriptDr. Yogesh Praveen was the Encyclopedia of Lucknow | लखनऊ के इनसाइक्लोपीडिया थे डॉ.योगेश प्रवीन | Patrika News

लखनऊ के इनसाइक्लोपीडिया थे डॉ.योगेश प्रवीन

पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन की 83वीं जयन्ती पर उन्हें याद करते हुए कैलाश चंद पांडे बता रहे हैं लखनऊ को डॉक्टर प्रवीन ने क्या दिया। मुगल काल से लेकर अंग्रेजी जमाने तक लखनऊ की गलियों में बसने वाली तहजीब की तलाश और उस पर शोध करने में योगेश प्रवीन ने अपनी उम्र का अच्छा खासा हिस्सा खर्च कर दिया ।

लखनऊ

Published: October 26, 2021 04:51:59 pm

लखनऊ मेरे शहर! मेरे शहर! मेर शहर!

अदब की बन की अंजुमन है जहां आठों पहर
हर एक रंग में तू मीर है ऐ जाने जिगर
तेरे बगैर जिन्दगी मे कुछ नहीं बेहतर...


इन पंक्तियों के लेखक डॉ. योगेश प्रवीन ने लखनऊ का नाम दुनियां में रोशन किया है। योगेश प्रवीन ने लखनऊ की गलियों में बसने वाले अवध और लखनऊ के गौरवशाली इतिहास के जानकारों की तलाश की। टाट के पर्दों वाले घरों में रह रहे उन बुजुर्गों से मिले जिन्हे लखनऊ के अतीत की जानकारी थी और जो नवाबी जमाने से रूबरू हुए थे। उन्होंने इन बुजुर्गों को गलियों के फरिश्ते नाम देते हुए लिखा-
लखनऊ है महज गुम्बजो-मीनार नहीं
यह सिर्फ शहर नहीं कूंचा औ बाजार नहीं
इसके दामन में मुहब्बत के फूल खिलते हैं
इसकी गलियों में फरिश्तों के पते मिलते हैं
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yogesh praveen
पद्मश्री डॉ. योगेश प्रवीन की 83वीं जयन्ती पर उन्हें याद करते हुए कैलाश चंद पांडे बता रहे हैं लखनऊ को डॉक्टर प्रवीन ने क्या दिया। मुगल काल से लेकर अंग्रेजी जमाने तक लखनऊ की गलियों में बसने वाली तहजीब की तलाश और उस पर शोध करने में योगेश प्रवीन ने अपनी उम्र का अच्छा खासा हिस्सा खर्च कर दिया । यहां की हर गली कूंचे से जुड़ी हस्तियों के बारे में तहकीकात, लखनवी रवायतों, मेल मिलाप के तौर तरीके, बातचीत में शीरीं जुबान के इस्तेमाल और अंदाजे बयां के साथ पहले आप की नज़ाकत और नफ़ासत भरी तहजीब औ तमद्दुन को अपनी कालजयी कलम से कागज के पन्नों पर समेटा और अपने संकलित अनुभवों से सजाकर इस अवध और लखनऊ की गंगा-जमनी तहजीब को किताबों की शक्ल देकर सुरक्षित कर दिया।
लिखीं दर्जनों पुस्तकें
योगेश प्रवीन की पुस्तकों संख्या दर्जनों में है। दास्तांने अवध, साहबे आलम, कंगन से कटारा, दास्तांने लखनऊ, बहारें अवध, डूबता-अवध, ताजदारे अवध, गुलिस्ताने अवध, अवध के भित्ति चित्रांकन, अवध के धरा अलंकरण, लक्षमणपुर की आत्मकथा, आपका लखनऊ, मुहब्बत नामा, हिस्ट्री ऑफ लखनऊ कैंट, लखनऊ की शायरी जहान की जुबान पर,लखनऊ का इतिहास, लखनऊ के मुहल्ले और उनकी शान आदि। थी गद्य में कंचनमृग (कहानी संग्रह),पत्थर के स्वप्न, अंक विलास, अग्नि वीणा के तार लिखी और पीली कोठी जैसा उपन्यास लिखा वहीं पद्य में मयूरपंख, शबनम, बिरह-बांसुरी, सुमनहार जैसे काव्य संग्रह लिखे। श्रीराम चरित मानस पर आधारित अपराजिता उनका रचित महाकाव्य है

पेशे थे शिक्षक
वह पेशे से शिक्षक थे और विद्यांत कालेज में लेक्चरर थे। लखनऊ से अपनी आशिकी और उसके लिए लिखने को उन्होने अपने शिक्षक के पेशे के आड़े नहीं आने दिया। पेशे के प्रति ईमानदारी के कारण वे राष्ट्रीय स्तर के शिक्षक के रूप में अपनी पहचान बनाने मे सफल हुए । उन्हे 1999 में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार भी मिला।
योगेश श्रीवास्तव से बन गए योगेश प्रवीन
उनका नाम योगेश श्रीवास्तव से योगेश प्रवीन कैसे हुआ? इसके बारे में पूंछने पर उन्होंने बताया कि जब वह प्रवक्ता बने तो योगेश श्रीवास्तव थे फिर जब लिखना शुरू किया तो अपनी मां का रखा घर का नाम प्रवीन भी जोड़ कर अपना नाम योगेश श्रीवास्तव प्रवीन लिखना शुरू कर दिया । इसी नाम से धर्मयुग जैसी राष्ट्रीय पत्रिकाओं में उनके लेख छपने लगे तो रायपुर विश्वविद्यालय की एक साहित्यिक संस्था के कुछ छात्र छात्राओं ने उन्हें पत्र लिखकर उनकी रचनाओं और लेखों की सराहना के साथ, यह सुझाव भी दिया कि आप अपने नाम के साथ कब तक अपने नस्लो-नसब (योगेश जी के शब्दों में)का ऐलान करते रहेंगे? ये जातिगत खत्ती आपको कहीं कैद करती हुई मालूम देती है अब इसे हटा ही दीजिए। योगेश जी के मन को यह सलाह भा गई और वे योगेश श्रीवास्तव से योगेश प्रवीन हो गए ।
फिल्मों में योगदान

साहित्यक ज्ञान के साथ साथ उनके ऐतिहासिक ज्ञान की चर्चा चारो ओर होती रहती थी। लखनऊ ही नहीं मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री तक के लोग उन्हें लखनऊ के इनसाइक्लोपीडिया के नाम से जानते थे। जब भी कोई फिल्म डायरेक्टर अपनी फिल्म की शूटिंग करने लखनऊ आता था तो सबसे पहले लखनऊ आकर योगेश जी से सम्पर्क करता था। यूं तो वह लखनऊ में शूट होने वाली बहुत सी फिल्मों से जुडे थे पर यहां सिफऱ् श्याम बेनेगल और शशी कपूर की फिल्म "जुनून" और मुजफ्फर अली, रेखा की सबसे यादगार फिल्म "उमरावजान ***** में उनकी बड़ी भूमिका थी

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