गणेश चतुर्थी 2018: जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि, कब कब न करें चंद्र दर्शन

गणेश चतुर्थी 2018: जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि, कब कब न करें चंद्र दर्शन

Akanksha Singh | Publish: Sep, 03 2018 09:14:15 AM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

गणेश चतुर्थी इस बार 13 सितम्बर को मनाई जा जाएगी।

लखनऊ. गणेश चतुर्थी इस बार 13 सितम्बर को मनाई जा जाएगी। यह पर्व 13 सिंतबर से शुरू होकर 23 सितंबर तक चलेगा। यह माना जाता है कि भगवान गणेश का जन्म मध्यकाल में हुआ था इसलिए उनकी स्थापना भी इसी काल में होनी चाहिए।

गणेश चतुर्थी की पूजा का शुभ मुहूर्त

लखनऊ के इंदिरा नगर में रहने वाले आचार्य अशोक कुमार त्रिपाठी ने बताया कि गणेश चतुर्थी 13 सितंबर 2018 गुरुवार को मनाई जाएगी। 23 सितंबर 2018, रविवार को अनंत चतुर्दशी के दिन दिन गणेश विसर्जन होगा। मध्याह्न काल में गणेश पूजा का शुभ समय 11:03 से 13:30 तक है।

गणेश चतुर्थी चंद्र दर्शन का शुभ मुहूर्त

- 12 सितंबर 2018 दिन बुधवार को चांद नहीं देखने का समय - 16:07 से 20:33 बजे तक
- 13 सितंबर 2018 दिन गुरुवार को चांद नहीं देखने का समय - 09:31 से 21:12 बजे तक - - चतुर्थी तिथि आरंभ - 12 सितंबर 2018, बुधवार 16:07 बजे
- चतुर्थी तिथि समाप्त - 13 सितंबर 2018, गुरुवार 14:51 बजे

पूजा विधि

- गणेश चतुर्थी की पूजा से पहले प्रातः उठ कर नित्यादि क्रियाओं से निवृत्त होकर शुद्ध आसन में बैठकर सभी पूजन सामग्री को एकत्रित कर लें।
- पुष्प, धूप, दीप, कपूर, रोली, मौली लाल, चंदन, मोदक आदि एकत्रित कर क्रमश: पूजा करें।
- भगवान गणेश को तुलसी दल व तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए। उन्हें दुर्वा चढ़ाना चाहिए।
- भगवान गणेश भगवान को मोदक (लड्डू) बहुत पसंद हैं। उन्हें देशी घी से बने मोदक का प्रसाद के रूप में चढ़ाने चाहिए।
- श्रीगणेश के दिव्य मंत्र ॐ श्री गं गणपतये नम: का 108 बार जप करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
- श्रीगणेश सहित प्रभु शिव व गौरी, नन्दी, कार्तिकेय सहित सम्पूर्ण शिव परिवार की पूजा षोड़षोपचार विधि से करना चाहिए।
- शास्त्रानुसार श्रीगणेश की पार्थिव प्रतिमा बनाकर उसे प्राणप्रति‍ष्ठित कर पूजन-अर्चन के बाद विसर्जित कर देने का आख्यान मिलता है। किन्तु भजन-कीर्तन आदि आयोजनों और सांस्कृतिक आयोजनों के कारण भक्त 1, 2, 3, 5, 7, 10 आदि दिनों तक पूजन अर्चन करते हुए प्रतिमा का विसर्जन करते हैं। किसी भी पूजा के उपरांत सभी आवाहित देवताओं की शास्त्रीय विधि से पूजा-अर्चना करने के बाद उनका विसर्जन किया जाता है, किन्तु श्री लक्ष्मी और श्रीगणेश का विसर्जन नहीं किया जाता है। इसलिए श्रीगणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन करें, किन्तु उन्हें अपने निवास स्थान में श्री लक्ष्मी जी सहित रहने के लिए निमंत्रित करें।

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