जालियांवाला बाग जैसा ही था रायबरेली का मुंशीगंज गोलीकांड

- रायबरेली के मुंशीगंज में 7 जनवरी 1921 को हुआ था गोलीकांड
- प्रदर्शन कर रहे किसानों पर ब्रिटिश अफसरों ने चलाई थी गोलियां

By: Hariom Dwivedi

Updated: 06 Jan 2021, 05:18 PM IST

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
लखनऊ. दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के बीच उत्तर प्रदेश के रायबरेली में हुए 100 साल पहले हुए किसानों के हित को लेकर हुए आंदोलन में तमाम किसान शहीद हो गए थे। 7 जनवरी 1921 को हुए इस वीभत्स गोलीकांड के 100 साल पूरे हो गये हैं। इसे मुंशीगंज गोलीकांड के नाम से भी जाना जाता है। इस गोलीकांड के चश्मदीद स्वर्गीय जितेंद्रनाथ कर ने इसे कलमबद्ध किया था। पत्रिका के लिए शताब्दी वर्ष पर विशेष सामग्री उपलब्ध करा रहे हैं फिरोज नकवी...

7 जनवरी 1921 को रायबरेली के मुंशीगंज में एक वीभत्स हत्याकांड हुआ था। अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला हत्याकांड की तरह मुंशीगंज गोलीकांड भी इतिहास के काले अध्याय के रूप में शामिल हो गया। ब्रिटिश हुकूमत में जमींदारों और कोटेदारों का खासा वर्चस्व था। शोषण के खिलाफ किसान शांतिपूर्ण तरीके से अपना विरोध दर्ज कर रहे थे, लेकिन उन्हें भी जलियांवाला बाग कांड की तरह गोली का शिकार होना पड़ा था। 5 जनवरी 1921 को तत्कालीन तालुकेदार के अत्याचारों के खिलाफ अमोल शर्मा और बाबा जानकीदास के नेतृत्व में किसान चंदनिहां में एक जनसभा कर रहे थे। प्रशासन फर्जी आरोपों में इन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। डिप्टी कमिश्नर मि. शेरिफ, बाबा जानकी दास, अमोल शर्मा व एक अन्य अभियुक्त को चंदनिहां से गिरफ्तार कर 6 जनवरी की रात को ही लौट चुके थे।

गिरफ्तारी के अगले ही दिन लोगों में अफवाह फैल गई कि प्रशासन द्वारा जेल में ही दोनों नेताओं की हत्या करवा दी गई है। 7 जनवरी 1921 की सुबह होते-होते फुरसतगंज फायरिंग और चंदनिहां घटनाक्रम की सूचनाएं पूरे जिले में बिजली की गति से फैल चुकी थीं। और पूरा शहर यह सब जान चुका था। इसके बाद चंदनिहां में एकत्रित जनसमूह ताल्लुकेदार और ब्रिटिश विरोधी नारेबाज़ी करते हुए बाबा जानकी दास व अन्य के दर्शन के लिए रायबरेली की ओर चल पड़ा था। रास्ते के गांवों के किसानों के समूह में सम्मिलित होने से उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही थी। ये लोग 7 जनवरी को सुबह 10 बजे तक मुंशीगंज पहुंच चुके थे।

इस बीच स्थिति की सूचना जब डिप्टी कमिश्नर मि. शेरिफ को मिली तो उन्होंने 2 या तीन बैलगाड़ियां लगाकर सई नदी पुल के दक्षिणी छोर को बंद करा दिया।... पूर्वान्ह 11 बजे मैं सिविल कोर्ट पहुंचा। वहां स्वर्गीय शीतल प्रसाद, देवी प्रसाद वकील जो कांग्रेसी विचारधारा रखतें हैं तथा पं. मार्तण्ड वैद्य एवं अन्य किसान नेता नजारत के सामने खड़े आपस में बातें कर रहे थे कि पं. जवाहरलाल नेहरू जिन्होंने प्रतापगढ़ में किसानों की अनेक सभाओं को सम्बोधित किया है, आज इलाहाबाद से 2-3 बजे के मध्य, पंजाब मेल से रायबरेली पधार रहे हैं। उन्होंने मुझसे यह भी कहा कि मैं मुंशीगंज पुल पर अपनी साइकिल से चला जाऊँ और डिप्टी कमिश्नर मि. शेरिफ से यह कह दूं कि यदि नेहरू जी आकर किसानों को सम्बोधित करते हैं तो उन्हे ऐसा करने दें। किसान नेहरू जी को सुनने के बाद तितर-बितर हो जायेंगे।

नेहरू जी का संदेश लेकर मैं साइकिल से मि. शेरिफ के पास चला। रास्ते में मुझे 20-25 किसानों का झुंड मिला जो टीकर अगाचीपुर, बेला टेकई, बेला भेला आदि गांवों से आए थे। इनमें से कुछ मुझे पहले से जानते थे। ये लोग पशु चिकित्सालय से जेल की ओर सड़क की पटरी-पटरी जा रहे थे। उन्होंने मुझे खड़े होने का इशारा किया। मैं साइकिल से उतर पड़ा। उनके आने का कारण पूछा। उन्होंने तालुकेदारों के अत्याचारों और चंदनिहा कांड का हवाला दिया जिसके तहद बाबा जानकीदास आदि को गिरफ्तार करके जेल लाये गये थे।

...मैं मुंशीगंज के पुल की ओर बढ़ा। वहां पहुंच कर मैंने देखा कि भीड़ को बाबू किस्मतराय जगधारी सम्बोधित कर रहे हैं। मि. शेरिफ भी वहीं हैं। किसानों की भीड़ अपने नेताओं को जेल से रिहा करने की मांग कर रही थी। जब मैंने मि. शेरिफ से पं. जवाहरलाल नेहरू के संभावित आगमन का उल्लेख किया, तब सरदार वीरपाल सिंह अपनी कार से वहां पहुंचे। उन्होंने मेरी बात को सुनते ही कहा, 'नेहरू जी स्वयं एक आग है। किसानों को इस बात की अनुमति नहीं मिलनी चाहिये कि वे उनके सामने जाएं, अन्यथा भयंकर परिणाम हो सकते हैं।' किन्तु मेरी बात का कोई विकल्प नहीं प्रस्तुत किया और वे कुछ क्षणों में स्थान छोड़कर चले गये।

मध्य जाड़े का मौसम था। लगभग 3 बजे मि. शेरिफ ने मुझसे कहा, 'आप कृपया पुलिस लाइन चले जायें और 'रिजर्व इंस्पेक्टर' को सूचित कर दें कि वे अतिशीघ्र सशस्त्र पुलिस के साथ यहाँ आ जाएं।' मैं वहां गया। लौटकर बताया कि रिजर्व इंस्पेक्टर शीघ्र ही आ रहे हैं। थोड़ी देर में फोर्स आ भी आ गया। लगभग 4 बजे सांयकाल, एक संदेशवाहक दौड़ता हुआ आया और उसने बताया कि पं. जवाहरलाल नेहरू किसानों एवं नागरिकों को की एक विशाल भीड़ के साथ, पैदल ही इस ओर आ रहे हैं। मैंने यह समाचार तुरंत ही मि शेरिफ को सुनाया। उन्होंने अपनी 'पाकेट डायरी' से एक पन्ना फाड़ा और उस पर लिखा, 'जहां हों, वहीं रूके, आगे मत बढ़ें, रायबरेली तुरंत छोड़ दें।' उन्होंने उस कागज को मेरी ओर बढ़ाते हुये कहा, 'आप कृपया इसे पं. नेहरू को तामील कर दें।' लेकिन पं. जवाहरलाल नेहरू जैसी हस्ती को ऐसा आदेश देने के लिये मेरी आत्मा ने स्वीकार नहीं किया। मैंने उसे कचहरी के एक कर्मचारी मकबूल हुसैन की ओर बढ़ा दिया जो अन्य कर्मचारियों तथा मौलवी इमरान अहमद तहसीलदार के साथ खड़ा था। उससे मैंने कहा, 'इसे पं. नेहरू को तामील कर दो।'

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इसी समय मि. शेरिफ ने तहसीलदार इमरान अहमद का घोड़ा लिया और उस पर सवार होकर भीड़ की ओर चल पड़े। इस समय कोई भी देख सकता था कि एक अपार भीड़, जिसमें सर ही सिर एवं लाठियां ही लाठियां दिखाई पड़ रही हैं। भीड़ पुल की ओर बढ़ रही है। मि. शेरिफ, पैदल सशस्त्र सैनिकों तथा घुड़सवारों ने भीड़ को दबाना शुरू किया। भीड़ 'बाबा के दर्शन' की मांग कर रही थी। नदी के दक्षिण, लगभग दो सौ गज की दूरी पर, आम की बाग के पास, सड़क की बाईं पटरी पर एक पक्का कुआं था, भीड़ वहीं सिमटी जा रही थी। मि. शेरिफ उसे बराबर पीछे हटवा रहे थे। जब भीड़ 'चुनौटा कुआं' के आस-पास सिमट गई थी, ठीक उसी समय सरदार वीरपाल सिंह अपनी 'मैक्सवेल कार' से, पुलिस लाइन की ओर से मुंशीगंज की तरफ आते दिखाई पड़े। दो तीन मिनट पश्चात वे चुनौटा कुआं के निकट पहुंच गये। तभी एक बंदूक की आवाज सुनाई पड़ी और तुरन्त ही तमाम आवाजें गूंज उठी।
सरदार वीरपाल सिंह भीड़ की ओर गाड़ी चलाते देखे गये।

दर्जनों व्यक्ति जो बंद सड़क में अमरूद के वृक्षों के पास खड़े थे मेरे पास खडे हो गये। वे पैदल ही उधर झपटे संभवतः उनका दृष्टिकोण जिज्ञासात्मक था। गोलीकांड के पश्चात वे पुनः लौटे और गरीब किसानों को गोली से भून डाला। गोलीकांड समाप्त होते ही नागरिकों की भीड़, जिसमें अपार किसान भी सम्मिलित थे और फुरसतगंज, लालगंज, महराजगंज आदि की ओर से आये थे, पं. नेहरू की ओर बढ़े। नेहरू जी पुल के उत्तरी किनारे पर, कुछ दूरी पर खड़े थे। भीड़ उन्हें चारों ओर से घेरे थी। वे भीड़ को सड़क की पश्चिमी पटरी पर खड़े सम्बोधित कर रहे थे। मैं भी मौलवी इमरान अहमद तथा कलेट्रेट के कर्मचारियों के साथ लगभग 15 कदम पर खड़ा उनका भाषण सुन रहा था। पं. नेहरू भीड़ को शांत रहने की सलाह दे रहे थे और घटित घटना के लिये उत्तेजना एवं हिंसा का सहारा लेने से रोक रहे थे।

पंण्डित जी के साथ एक 17-18 वर्ष का युवक भी इलाहाबाद से ही आया था और मेरे एकदम पास में खड़ा था। बाद में पता चला कि वह युवक मंगला प्रसाद है। इसी समय मि. शेरिफ और सरदार वीरपाल सिंह वहां पहुंचे। मंगला प्रसाद संभवतः उस समय इलाहाबाद में इंटरमीडिएट के छात्र थे। पं. जवाहरलाल नेहरू के भाषण स्थल के निकट पहुंच कर मि. शेरिफ ने मुझसे कहा कि मैं पुल के उस पार जाऊं और सवारों तथा सशस्त्र पुलिस को पुनः बुला लाऊं। मैं सरदार वीरपाल सिंह की, सड़क पर स्थिति 'कलमी आम' की बाग के पास गया। मैंने देखा अनेकों लाशें सड़क के पटरी के किनारे पड़ी हैं। उनसे रक्त बह रहा है। मैंने सैनिकों से कहा, 'बड़े साहब ने कहा है कि भीड़ को मत दबाओ और वापस चले आओ।' मेरे इतना कहते ही दो तीन सवारों ने, जो सीमाप्रान्त के पठान थे, गुस्से में कहा 'बरा साहब बोलता है... हम अपने भाई का खून किया है।' उनके ये शब्द मेरे कानों में गूंज रहे थे। इतना कहने के बाद वे एक दुखी मन स्थिति में धीरे-धीरे चल पड़े।

मैं अपनी साइकिल से मि. शेरिफ के पास पहुंचा। वे लोग भी पहुंचे। मि. शेरिफ ने दो या तीन बार उन्हें 'शाबास! शाबास!!' कहा। उन्होंने एक विचित्र टोन में कुछ उत्तर दिया जिसे मैं समझ नहीं सका। मि. शेरिफ ने मुझसे कहा, मैं जाऊं और पं. जवाहरलाल नेहरू को बुला लाऊं। मैंने ऐसा किया। नेहरू जी मीटिंग समाप्त करके आये। उस समय 5.15 का समय था। सूर्यास्त हो रहा था। चंद मिनट तक बात करने के बाद मि. शेरिफ, पं. नेहरू, मंगला प्रसाद, एवं सरदार वीरपाल सिंह के साथ अपने बंगले पर चले गये। अपार जनसमूह जो अभी तक पं. नेहरू का भाषण सुन रहा था, सरदार वीरपाल सिंह को 'हत्यारा! हत्यारा!!' कहता नगर की ओर चला गया। एक घंटे बाद, हर व्यक्ति के जबान पर था - 'हत्यारे वीरपाल सिंह ने बेगुनाह किसानों का खून किया है।'- क्रमश: पार्ट- 2

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