हाईकाेर्ट ने कहा बाल गृहों में वित्तीय संकट न होने दें सरकारें

  • हाईकाेर्ट ने केंद्र व राज्य सरकार को जारी किए हैं निर्देश
  • प्रदेश के बाल शरणालयों की खस्ताहालत सुधारने के मामले में अहम फैसला

By: shivmani tyagi

Updated: 03 Oct 2020, 09:10 PM IST

पत्रिका न्यूज नेटवर्क, लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ( lucknow high court ) ने बाल गृहों में रहने वाले बच्चों के हित में केंद्र व राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि प्रदेश के बाल गृहों में वित्तीय संकट न होने दिया जाय। कोर्ट ने कहा है कि कोरोना काल के मुश्किल समय में भी इनमें रह रहे बच्चों ( किशोरअपचारियों ) का हित और उनका कल्याण सर्वोपरि है। वित्तीय कमी का तर्क इनके आड़े नहीं आना चाहिए। किशोर न्याय अधिनियम- 2015 और इसके नियमों के तहत इनके बेहतर हित की हिफाजत, राज्य की शीर्ष प्राथमिकता होनी चाहिए। अदालत ने इस अहम टिप्पणी के साथ केंद्र व राज्य सरकार से अपेक्षा की है कि वे इसका पालन करें।

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न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति राजन राय की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण आदेश वर्ष 2008 से लंबित एक जनहित याचिका पर दिया है। इसमें प्रदेश के बाल संरक्षण गृहों की खस्ताहालत में सुधार समेत समय पर फंड मुहैया कराने के निर्देश दिये जाने की गुजरिश की गई थी। पहले, समय-समय पर कोर्ट ने इसके लिए सरकारों को निर्देश दिए थे। गुरुवार को मामले की सुनवाई के दौरान केस में नियुक्त न्यायमित्र अपूर्व तिवारी ने अदालत को बताया कि राजधानी के दृष्टि सामजिक संस्थान को अभी तक वित्तीय मदद की आवर्ती व गैर आवर्ती मंजूरी (ग्रांट) नहीं मिली है, जो 10 लाख से 50 लाख रूपए तक की होती है। ऐसे में संस्थान किसी तरह से कर्ज लेकर अपने संसाधनों से काम चला रहा है।

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राज्य सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि यूपी सरकार को इसके लिए केंद्र से समय से फंड नहीं मिल रहा है। इस पर केंद्र सरकार के अधिवक्ता का कहना था कि यूपी सरकार को फंड देने की कार्यवाही चल रही है जिसके पूरा होने पर बाकी कोष को जारी कर दिया जायेगा। दाेनाें पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि कोरोना काल के मुश्किल समय में भी इनमें रह रहे बच्चों ( किशोरअपचारियों ) का हित और उनका कल्याण सर्वोपरि है। वित्तीय कमी का तर्क इनके आड़े नहीं आना चाहिए, क्योंकि किशोर न्याय अधिनियम- 2015 और इसके नियमों के तहत इनके बेहतर हित की हिफाजत, राज्य की शीर्ष प्राथमिकता होनी चाहिए।

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अदालत ने इस अहम टिप्पणी के साथ केंद्र व राज्य सरकार से अपेक्षा की है कि वे इसका पालन करें। अब कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को नियत की है।

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