scriptImportant points of judgment in Babri demolition case | बाबरी विध्वंस मामला : 28 साल का इंतजार, 3 मिनट में सब बरी, फैसले की ये हैं खास बातें | Patrika News

बाबरी विध्वंस मामला : 28 साल का इंतजार, 3 मिनट में सब बरी, फैसले की ये हैं खास बातें

-सीबीआइ की विशेष कोर्ट ने सुनाया फैसला
-कहा, तस्वीरों से किसी को आरोपित नहीं ठहराया जा सकता
-बाबरी विध्वंस पूर्व नियोजित नहीं था
-घटना के प्रबल साक्ष्य नही हैं
-आडवाणी, जोशी, उमा भारती समेत सभी आरोपी बरी

लखनऊ

Updated: September 30, 2020 05:13:11 pm

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
लखनऊ. अयोध्या के विवादित ढांचे के विध्वंस मामले में 28 साल का इंतजार तीन मिनट में खत्म हो गया। बुधवार को सीबीआइ की विशेष अदालत ने मामले में सभी 32 आरोपियों को बरी कर दिया। मुकदमे पर विशेष जज एसके यादव ने अपने कार्यकाल का अंतिम फैसला सुनाते हुए लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, महंत नृत्य गोपाल दास, कल्याण सिंह समेत सभी का निर्दोष बताया। विशेष जज ने कहा, तस्वीरों से किसी को आरोपित नहीं ठहराया जा सकता। अयोध्या विध्वंस पूर्व नियोजित नहीं था। घटना के प्रबल साक्ष्य नही हैं। सिर्फ तस्वीरों से किसी को दोषी नहीं कहा जा सकता। जबकि मुस्लिम पक्ष की तरफ से वकील जफरयाब जीलानी ने कहा, ये फैसला कानून और हाई कोर्ट दोनों के खिलाफ है। फैसले के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की जाएगी।

बाबरी विध्वंस मामला : 28 साल का इंतजार, 3 मिनट में सब बरी, फैसले की ये हैं खास बातें
बाबरी विध्वंस मामला : 28 साल का इंतजार, 3 मिनट में सब बरी, फैसले की ये हैं खास बातें

छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में हुए ढांचा विध्वंस मामले में सीबीआइ कोर्ट ने कहा कि सीबीआइ कोई निश्चयात्मक सुबूत नहीं पेश कर सकी। विध्वंस के पीछे कोई साजिश नहीं रची गई और लोगों का आक्रोश स्वत: स्फूर्त था। इस मामले के मुख्य आरोपितों में एक स्व. अशोक सिंहल को कोर्ट ने यह कहते हुए क्लीन चिट दे दी कि वह तो खुद कारसेवकों को विध्वंस से रोक रहे थे, क्योंकि वहां भगवान की मूर्तियां रखी हुई थीं।

तीन मिनट में फैसला

28 साल तक चले इस मामले में फैसला सुनाने के लिए सीबीआइ के विशेष जज एसके यादव दोपहर 12 बजकर 10 मिनट में कोर्ट पहुंचे। उस समय कोर्ट में 26 आरोपित मौजूद थे, जबकि लालकृष्ण आडवाणी, डॉ. मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, उमा भारती, नृत्यगोपाल समेत छह आरोपी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये कोर्ट में जुड़े हुए थे। महज तीन मिनट में उन्होंने अपना फैसला सुनाते हुए आरोपितों को बरी कर दिया। कोर्ट ने कहा अखबारों में छपी खबरों को प्रामाणिक सुबूत नहीं माना जा सकता क्योंकि उनके मूल नहीं पेश किए गए। फोटोज की निगेटिव नहीं प्रस्तुत किए गए और न ही वीडियो फुटेज साफ थे। कैसेटस को भी सील नहीं किया गया था। अभियोजन ने जो दलील दी, उनमें मेरिट नहीं थी।

सिंघल ढांचे को सुरक्षित रखना चाहते थे

विशेष जज एसके यादव ने कहा कि छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में विवादित ढांचा के पीछे से दोपहर 12 बजे पथराव शुरू हुआ। अशोक सिंघल ढांचे को सुरक्षित रखना चाहते थे क्योंकि ढांचे में मूर्तियां थीं। इसी तरह ऋतम्बरा और कई अन्य अभियुक्तों के भाषण के टेप को सील नहीं किया गया।

विध्वंस के लिए कोई षडयंत्र नहीं

कोर्ट ने कहा विध्वंस के लिए कोई षडयंत्र नहीं किया गया। घटना पूर्व नियोजित नहीं थी। एलआईयू की रिपोर्ट थी कि छह दिसंबर 1992 को अनहोनी की आशंका है किंतु इसकी जांच नही कराई गई। अभियोजन पक्ष की तरफ से जो साक्ष्य पेश किए वो दोषपूर्ण थे। जिन लोगों ने ढांचा तोड़ा उनमें और आरोपियों के बीच किसी तरह का सीधा संबंध स्थापित नहीं हो सका। इस आधार पर कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया।

2300 पेज का फैसला

2300 पेज के फैसले में सीबीआइ व अभियुक्तों के वकीलों ने करीब साढ़े आठ सौ पेज की लिखित बहस दाखिल की है। कोर्ट के सामने 351 गवाह सीबीआइ ने परीक्षित किए व 600 से अधिक दस्तावेज पेश किए।

ये हैं 32 आरोपित

लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिंह, उमा भारती, विनय कटियार, साध्वी ऋतंभरा, महंत नृत्य गोपाल दास, डॉ. राम विलास वेदांती, चंपत राय, महंत धर्मदास, सतीश प्रधान, पवन कुमार पांडेय, लल्लू सिंह, प्रकाश शर्मा, विजय बहादुर सिंह, संतोष दुबे, गांधी यादव, रामजी गुप्ता, ब्रज भूषण शरण सिंह, कमलेश त्रिपाठी, रामचंद्र खत्री, जय भगवान गोयल, ओम प्रकाश पांडेय, अमर नाथ गोयल, जयभान सिंह पवैया, साक्षी महाराज, विनय कुमार राय, नवीन भाई शुक्ला, आरएन श्रीवास्तव, आचार्य धमेंद्र देव, सुधीर कुमार कक्कड़ व धर्मेंद्र सिंह गुर्जर।

49 आरोपितों में 32 जीवित

ढांचा विध्वंस के बाद कुल 49 प्राथमिकी दर्ज हुई थी। सीबीआइ ने 40 आरोपितों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया था। 11 जनवरी 1996 को पूरक शपथ पत्र दाखिल कर नौ के खिलाफ आरोप तय किए गए थे। 49 आरोपितों में अब कुल 32 ही जीवित हैं।

जज एसके यादव का आखिरी फैसला

यह ऐतिहासिक फैसला सुनाने वाले विशेष जज सुरेंद्र कुमार यादव बुधवार को ही रिटायर हो गए। एसके यादव 30 सितंबर 2019 को सेवानिवृत्त हो गए थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्हें फैसला आने तक के लिए सेवा विस्तार दिया गया था।

पूरा देश इस फैसले से खुश

सांसद बृजभूषण शरण सिंह ने कहा, मैं ही नहीं पूरा देश इस फैसले से खुश है। आज का ऐतिहासिक फैसला आया है।
सांसद साक्षी महाराज ने कहा, आज का दिन ऐतिहासिक रहा। मुझे सुबह से ऐसी उम्मीद थी जीत रामलला की होगी।

हाईकोर्ट में करेंगे अपील

मुस्लिम पक्ष की तरफ से वकील जफरयाब जीलानी ने कहा, ये फैसला कानून और हाई कोर्ट दोनों के खिलाफ है। विध्वंस मामले में जो मुस्लिम पक्ष के लोग रहे हैं उनकी तरफ से हाई कोर्ट में अपील की जाएगी। जबकि, देश में मुसलमानों के प्रमुख संगठन ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने फैसले पर टिप्पणी से इनकार करते हुए कहा कि अब मुस्लिम संगठन मिलकर तय करेंगे कि इसके खिलाफ आगे अपील करनी है या नहीं।

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