लॉकडाउन में सदानीरा गंगा की कहानी, ऊपर से गंगा साफ लेकिन आत्मा नहीं हुई निर्मल

-सीवर और नालों का पानी अब भी गिर रहा गंगा में
-गंगा किनारे लगे परमाणु घर और बड़े उद्योग नहीं हुए हैं बंद

By: Mahendra Pratap

Published: 13 Apr 2020, 08:36 PM IST

पत्रिका ग्राउंड रिपोर्ट
महेंद्र प्रताप सिंह
कानपुर. हरिद्वार से लेकर कोलकाता तक गंगा कल-कल कर बह रही हैं। गोमुख से निकली धारा स्वच्छ और साफ है। कुछ इसी तरह की स्वच्छता के दावे इन दिनों गंगासागर में गंगा के मिलने तक किए जा रहे हैं। कहा जा रहा है, कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से 21 दिन के लॉकडाउन में शहरों की आबोहवा बदलने के साथ ही गंगा नदी की सेहत भी सुधारी है। उद्योग और टेनरियां बंद हैं। हरिद्वार, बिठूर, प्रयागराज और काशी जैसे पवित्र घाटों पर गंगा स्नान भी बंद है। इन सबका फायदा मिल रहा है। गंगा निर्मल हुई हैं। जल साफ हुआ है। लेकिन, हकीकत कुछ और है। वैज्ञानिकों का कहना है भले ही ऊपर से गंगा साफ दिख रहीं हैं, लेकिन अभी गंगा नदी की आत्मा निर्मल नहीं हुई है। गंगा में हजारों लीटर नालों और सीवर का पानी अब भी गिर रहा है। परमाणु घर चालू हैं। उनका कचरा गंगा को प्रदूषित कर रहा है।

ऋषिकेश से लेकर कोलकाता तक गंगा के किनारे परमाणु बिजलीघर से लेकर रासायनिक खाद तक के कई कारखाने लगे हैं। लॉकडाउन में यह सभी चालू हैं। गंगा के ग्लेशियरों और झरनों से आने वाले पानी को कानपुर से पहले ही नहरों में निकाल लिया जाता है। यह अब भी बदस्तूर जारी है। वाराणसी के संकट मोचन फाउंडेशन के अध्यक्ष और गंगा स्वच्छता सेम्पल की जांच करने वाली लैबोरेटरी के चीफ विश्वम्भर नाथ मिश्र का कहना है कि हाल ही में आयी रिपोर्ट के मुताबिक गंगा के पानी में फीकल कोलीफॉर्म दोगुना बढ़ गया है। जाहिर है ऐसे में गंगा जल को साफ कहना महज गलतफहमी है। छोटी फैक्ट्रियों के बंदी का कोई असर नहीं पड़ा है। क्योंकि सीवरेज के पानी ज्यों का त्यों गिर रहा है। लॉकडाउन के पहले फीकल कोलीफॉर्म 52 हज़ार था। अब यह बढकऱ 1 लाख 24 हज़ार फीकल तक हो गया है। लॉकडाउन की वजह से बाहर शौच करने वाले भी घरों में शौचालय का उपयोग कर रहे हैं। इससे अकेले वाराणसी में 350 एमएलडी सीवरेज गंगा में गिर रहा है।

भीड़ की कमी से साफ दिख रहा पानी :- विश्वम्भर नाथ मिश्र की मानें तो काशी, प्रयागराज आदि में पहले हर रोज लाखों लोग गंगा में स्नान करते थे। सैकड़ों नावें चलती थीं। इससे गंगा के सतह से बालू व गिल्ट उभरता था। इसकी वजह से पानी मटमैला हो जाता था। यह गतिविधियां बंद हैं इसलिए पानी निर्मल और साफ दिख रहा है।

गंगा का ऑक्सीजन हुआ बेहतर :- लेबोरेटरी अध्यक्ष का कहना है कि लॉकडाउन की वजह से वाराणसी में गंगा का आक्सीजन निश्चित रूप से काफी अच्छा हुआ है। अच्छी धूप और लोगों की दूरी से गंगा में जीव जंतु विचरण करते दिख रहे हैं। इससे लोगों को लगता है गंगा साफ हुई हैं।

कानपुर में घट गया जलशोधन का खर्च:- कानपुर जलकल के सचिव आरबी राजपूत का कहना है कि लॉकडाउन की वजह से जल शोधन का खर्च कम हुआ है। पहले सात से आठ टन फिटकरी खर्च हो रही थी। अब चार टन की ही जरूरत हैं। पहले क्लोरीन 12 सौ किलोग्राम तक खर्च हो रही थी, अब सात सौ किलोग्राम की जरूरत है। घुलित ऑक्सीजन पहले पांच मिलीग्राम प्रति लीटर थी। (जरूरत चार मिलीग्राम प्रति लीटर होती है)। अब यह सात मिलीग्राम प्रति लीटर हो गई है। यानी जल ट्रीट में केमिकल का खर्च आधा रह गया है। हालांकि इसकी बड़ी वजह कानपुर की छोटी-मोटी और अन्य केमिकल कंपनियों की बंदी बड़ी वजह है।

27 केंद्रों पर नहाने लायक हुआ जल :- कानपुर में दावा किया गया है कि रियल टाइम वॉटर मॉनिटरिंग में गंगा नदी का पानी 36 मॉनिटरिंग सेंटरों में से 27 में नहाने के लिए उपयुक्त हो गया है। 30 अप्रेल तक लॉकडाउन रहा तो जल और निर्मल हो जाएगा।

गंगाबैराज के अधिकारियों की मानें तो मॉनीटरिंग स्टेशनों के ऑनलाइन पैमानों में पानी में ऑक्सीजन घुलने की मात्रा प्रति लीटर 6 एमजी से अधिक, बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड 2 एमजी प्रति लीटर और कुल कोलीफार्म का स्तर 5000 प्रति 100 एमएल हो गया है। पीएच का स्तर 6.5 और 8.5 के बीच है। यह गंगा में जल की गुणवत्ता की अच्छी सेहत को दर्शाता है। वहीं, पर्यावरणविद प्रोफेसर अनूप सिंह कहते हैं किइन दिनों कम आर्गेनिक प्रदूषण नदी के पानी में घुल कर खत्म हो रहा है। नदी की खुद को साफ रखने की क्षमता के कारण जल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है।

दावों के उलट हकीकत, 1 लाख घरों सीवर गंगा में :- मां गंगा प्रदूषण मुक्ति अभियान समिति के अध्यक्ष श्रीराम जी त्रिपाठी की मानें तो गंगा किनारे बसे अधिकांश शहरों में नाले केवल सरकारी फाइलों में ही टैप हैं। ये सीधे गंगा में ही बह रहे हैं। कई एसटीपी सीवर के पानी को ठीक प्रकार से शोधित नहीं कर रहे हैं। कानुपर में एक तिहाई हिस्से में सीवर लाइन नहीं है। गंगा किनारे की बस्तियों सहित शहर के करीब एक लाख घरों का शौचालय सीधे गंगा में गिर रहा है। पर्याप्त सीवरेज सिस्टम न होने के कारण पांच लाख से अधिक आबादी वाले इलाके के सीवर सीधे नालों में गिर रहा है।

कानपुर 500 एमएलडी गंदा पानी गंगा में डिस्चार्ज हो रहा है। जबकि 332 लीटर ट्रीटमेंट प्लांट बने है। कानपुर के 21 बड़े गंदे नाले और सीवर का पानी भले ही उपचारित कर गंगा में प्रवाहित करने की बात की जा रही है। लेकिन हकीकत कुछ और है।

प्रयागराज में मामूली कमी :- सीपीसीबी की गाइडलाइन के मुताबिक मानव मल से पानी में पहुंचने वाले फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा प्रति 100 मिलीलीटर में 2500 मिलियन होना चाहिए। यदि इससे अधिक है तो पानी नहाने लायक नहीं है। पिछले दिनों प्रयागराज में संगम घाट पर प्रति 100 मिलीलीटर में फीकल कोलीफॉर्म 12,500 मिलियन पाया गया था। यही आंकड़ा शास्त्री घाट पर भी मिला था। इस आंकड़े में इस दौरान मामूली कमी आयी है।

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