कौन हैं सुहेलदेव जिन्हें भाजपा छोड़ पा रही न जोड़ पा रही

कौन हैं सुहेलदेव जिन्हें भाजपा छोड़ पा रही न जोड़ पा रही

Hariom Dwivedi | Publish: Apr, 17 2019 03:11:10 PM (IST) | Updated: Apr, 17 2019 03:12:35 PM (IST) Lucknow, Lucknow, Uttar Pradesh, India

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने छोड़ा बीजेपी का साथ
पूर्वांचल की करीब 20 सीटों पर राजा सुहेलदेव का प्रभाव
2002 में ओम प्रकाश राजभर ने बनाई सुभासपा

 

महेंद्र प्रताप सिंह
पत्रिका इन्डेप्थ स्टोरी
लखनऊ. यूपी में जातियों की सियासत बहुत नाजुक मोड़ पर पहुंच गयी है। प्रदेश सरकार में सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) ने भाजपा का साथ छोड़ दिया है। पार्टी के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने अपने 39 प्रत्याशी मैदान में उतार दिए हैं। लेकिन सुभासपा का विधानसभा में भाजपा से समझौता बना रहेगा। सियासत का यह अजीब गठजोड़ है। सूबे की राजनीति भाजपा और सुभासपा दोनों एक दूसरे के पूरक बन गए हैं। पूर्वांचल की कम से कम 20 सीटों पर राजा सुहेलदेव का प्रभाव है। इसलिए भाजपा ओमप्रकाश राजभर को न छोड़ पा रही है न जोड़ पा रही है। कुल मिलाकर टिकट को लेकर चल रही खींचतान दोनों ही दलों के लिए सिरदर्द बन गयी है। इसमें ज्यादा नुकसान भाजपा को ही है। यह बात राजभर जानते हैं इसलिए वह पिछले दो साल से भाजपा को अपनी शर्तों पर नचा रहे हैं।

आखिर कौन हैं राजा सुहेलदेव जिन्हें भाजपा से लेकर बसपा तक सब अपना बनाना चाहते हैं। यह समझने के लिए 90 के दशक की राजनीति की तरफ लौटना होगा। यह वह दौर था जब उप्र में बसपा का उभार हो रहा है। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम उप्र की जातीय संरचना और उसकी ताकत को बखूबी समझते थे। इसलिए उन्होंने जातियों और उनके प्रेरक पुरुषों की पहचान की। जातियों के नेता बनाए। इसी क्रम में ऊदल देवी और बिजली पासी की पहचान हुई। और पासियों के नेता बने आरके चौधरी। सरदार पटेल की झंडाबरदारी सोनेलाल पटेल को मिली। इन्हें कुर्मी मतों को सहेजने का जिम्मा दिया गया। दयाराम पाल को अहिल्याबाई होलकर के प्रतीक के साथ पाल-बघेलों को जोडऩे का दायित्व सौंपा गया। ओमप्रकाश राजभर को राजा सुहेलदेव राजभर के व्यक्तित्व को उभारने और राजभरों के वोटबैंक को जोडऩे का काम मिला। विभिन्न चुनावों में कांशीराम ने इन जातीय नेताओं और उनके प्रेरक पुरुषों के साथ बसपा को मजबूत किया। वक्त बदला। मायावती का बसपा में प्रभुत्व बढ़ा तो यह नेता पार्टी से अलग होते गए। आगे चलकर कमोबेश सभी ने अपने-अपने जातीय महापुरु षों के सहारे जातीय राजनीति शुरू कर दी। इस तरह सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का जन्म हुआ।

2002 में सुभासपा का जन्म
बसपा मूवमेंट में रहते हुए ओमप्रकाश राजभर अपनी जाति के वोटबैंक की ताकत को समझ चुके थे। उन्होंने 2002 में सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का गठन किया। इसके बाद से उन्होंने हर चुनाव में अपने प्रत्याशी उतारे। 2017 तक उनकी पार्टी को कोई सफलता नहीं मिली। लेकिन पार्टी का मत-प्रतिशत बढ़ता गया। पूर्वांचल में कई सीटों पर सुभासपा के प्रत्याशी अच्छी लड़ाई में आ गए। इस क्षेत्र की कम से कम 20 सीटें ऐसी हैं जहां सुभासपा के 25 हजार से लेकर डेढ़ लाख तक वोट हैं। इसीलिए भाजपा ने विधानसभा चुनावों में पार्टी से समझौता किया। ओमप्रकाश सहित 04 उम्मीदवार पहली बार विधानसभा पहुंचे। पूर्वी यूपी में करीब 18 प्रतिशत राजभर की आबादी है। इनमें अधिकतर मज़दूर हैं। राजभरों के करीब 2.5 प्रतिशत वोट हैं और यह बहराइच से बनारस तक के 20 संसदीय और 60 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखते हैं। यह यूपी की उन 17 अति पिछड़ी जातियों में से हैं, जो अनुसूचित जाति का दर्जा चाहते हैं।

 

Maharaja Suheldev Rajbhar


कहां फंसा है पेंच
राजभर को भाजपा सिर्फ एक संसदीय घोसी देना चाहती है। यहां पार्टी ने अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है। भाजपा की शर्त है ओमप्रकाश यहां से चुनाव लड़ें वह भी भाजपा के सिंबल पर। लेकिन ओमप्रकाश अपनी पार्टी के सिंबल पर लडऩा चाहते हैं। और खुद न लड़ाकर किसी और को लड़ाना चाहते हैं। इसलिए राजभर ने दबाव की रणनीति के तहत 39 उम्मीदवार उतार दिए हैं।

क्या होगी अब भाजपा की रणनीति
भाजपा ने अब भी राजभर से समझौते की राह खुली रखी है। पूर्वांचल में भाजपा के पास सुखदेव राजभर और राम अचल राजभर जैसे कद्दावर नेता विकल्प के रूप में हैं। इन नेताओं को राजभर और इसकी उपजातियों व खटिक,नट, बांसफोड़ आदि जातियों के वोटबैंक को सहेजने का जिम्मा सौंपा गया है। घोसी, सलेमपुर,चंदौली, गाजीपुर,बलिया,वाराणसी,बस्ती, बहराइच समेत 20 सीटों पर पार्टी ने जातीय नेताओं को सक्रिय कर दिया है।

...तो क्या राष्ट्रवादी राजा थे सुहेलदेव
24 फरवरी 2016 को बहराइच के गुल्लावीर इलाका एकाएक राष्ट्रीय क्षितिज पर तब उभरा जब यहां भाजपा अध्यक्ष अमित शाह 11वीं सदी के राजा सुहेलदेव की मूर्ति का अनावरण किया। इस कार्यक्रम में भाजपा के बड़े नेता जुटे। और राजा सुहेलदेव का महिमागान हुआ। भाजपा ने सुहेलदेव को राष्ट्रवादी राजा प्रचारित किया। बताया गया कि सुहेलदेव श्रावस्ती के राजा थे जिन्होंने महमूद गजनवी के भांजे गाज़ी सैयद सालार मसूद को युद्ध में हराया था। कहा गया कि यह पासी समुदाय से थे। जिन्हें उतना सम्मान नहीं मिला, जितने के वे हकदार थे। सुहेलदेव को संतभक्त राजा बताया गया। कहा गया कि इन्होंने गोरक्षा और हिंदू धर्म की रक्षा के लिए बहुत काम किया था। हालांकि, इन सबसे उलट ब्रिटिश गजटियर सुहेलदेव को राजपूत राजा बताता है। जिन्होंने 21 राजाओं का संघ बनाकर मुस्लिम बादशाहों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। उप्र की पासी और राजभर सैकड़ों बरस से सुहेलदेव की विरासत पर दावा ठोंकते आ रहे हैं। सुहेलदेव को मानने वाली जातियों में भर, भर राजपूत, राजभर, थरु, बैस राजपूत, पांडव वंशी तोमर, जैन राजपूत, भरशिव, थरु कल्हान, नागवंशी क्षत्रिय और विसेन क्षत्रिय आदि हैं। बहरहाल, भाजपा ने 13 अप्रैल 2016 को गाजीपुर रेलवे स्टेशन से इन्हीं सब जातियों को लुभाने के लिए सुहेलदेव सुपरफास्ट एक्सप्रेस चलाई थी। तब के रेलमंत्री मनोज सिन्हा ने इसे हरी झंडी दिखाई थी। लेकिन उन्हें नहीं मालूम था कि गाज़ीपुर से आनंद विहार के बीच चलने वाली इस ट्रेन के जरिए संसद तक पहुंचने के लिए ओमप्रकाश राजभर सीटों की सौदेबाजी करेंगे।

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