अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस: जानें इस दिन का इतिहास और महत्व

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस: जानें इस दिन का इतिहास और महत्व

Mahendra Pratap | Publish: Sep, 08 2018 05:09:54 PM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

इस दिन की शुरूआत यूनेस्को में 1996 में हुई थी जब शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए हुई थी

लखनऊ. शिक्षा से बड़ा ज्ञान कुछ नहीं होता। लेकिन दुनिया में आज भी बड़े पैमाने पर अशिक्षा का अभाव फैला हुआ है। छोट शहरों के आसपास बसे गांव के परिवार के कई ऐसे लोग हैं, जहां शिक्षा से लोग दूर-दूर से वाकिफ नहीं हैं। अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस 8 सितम्बर को मनाया जाता है। इस दिन की शुरूआत यूनेस्को में 1996 में हुई थी जब शिक्षा के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने और दुनिया भर के लोगों का इसके महत्व पर ध्यान आकर्षित करने के लिए हर साल 8 सितम्बर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाए जाने का निर्णय लिया गया।

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस का इतिहास

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने का विचार पहली बार ईरान के तोहरान में शिक्षा मंत्रियों ने विश्व सम्मेलन के दौरान 1965 में कही थी। 26 अक्टूबर, 1996 को यूनेस्को ने 14वें जनरल कॉन्फ्रेंस में घोषणा कर कहा कि हर साल 8 सितम्बर को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाया जाएगा। इस साल ह 52वां अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस है।

इसलिए मनाया जाता है अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस

अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस मानव विकास और समाज में उनके अधिकारों को जानने और साक्षरता की तरफ मानव चेतना को बढा़वा देने के लिए मनाया जाता है। इस बात को समझना जरूरी है कि सफलता और जीने के लिए साक्षर होना जरूरी है। देश से बाल श्रम, गरीबी, जनसंख्या वृद्धि नियंत्रण जैसी समस्याओं से निजात पाना बेहद जरूरी है। ये क्षमता सिर्फ सारक्षता में है जो परिवार और देश की प्रतिष्ठा को बढ़ा सकती है। यह दिवस परिवार और समाज के लिए अपनी जिम्मेदारी को समझने के लिए मनाया जाता है।

राजधानी में बुजुर्ग महिलाओं ने समझा साक्षरता का महत्व

साक्षरता इंसान को आत्मनिर्भर बनाती है। इसी के साथ यह भी सच है कि पढ़ने लिखने की या फिर यूं कहें कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती। बंथरा क्षेत्र के कुरौनी गांव की महिलाओं ने इस बात को साबित कर दिखाया है। यहां रहने वाली 60 साल की तेजवती ने कभी स्कूल की शक्ल नहीं देखी। बचपन में घरवालों ने खेती के काम में लगा दिया। सारी जिंदगी ऐसी ही कटी। तेजवती के लिए स्कूल जाना केवल समय की बर्बादी थी। इसलिए उसने अपने बच्चों को भी स्कूल नहीं भेजा। कुछ दिन पहले गांव की चौपाल में चर्चा के दौरान साक्षरता शिविर की जानकारी मिली। कुछ महिलाओं को शिविर जाते देखा। हैरानी तब हुई जब उसी गांव की 55 वर्षीय अनपढ़ महिला सावित्री को तेजवती ने कागज पर कुछ लिखते हुए देखा। यहां से बदलाव शुरू हुआ। तेजवती न केवल खुद साक्षरता शिविर गईं बल्कि, गांव की कई दूसरी महिलाओं को भी पढ़ने के लिए प्रेरित किया।

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