गोरखपुर में मंहत योगी की नहीं चलीं खड़ाऊं, मौर्या का भी टूटा तिलस्म

Hariom Dwivedi

Publish: Mar, 14 2018 07:06:47 PM (IST)

Lucknow, Uttar Pradesh, India
गोरखपुर में मंहत योगी की नहीं चलीं खड़ाऊं, मौर्या का भी टूटा तिलस्म

इन पांच कारणों से गोरखपुर और फुलपुर का उपचुनाव हार गई भारतीय जनता पार्टी...

लखनऊ. भाजपा गोरखपुर और फूलपुर का उप चुनाव हार गयी है। आइए जानते हैं वे प्रमुख कारण जिनकी वजह से भाजपा का अजेय दुर्ग ढह गया।

गोरखपुर
-गोरखपुर में जब तक योगी आदित्यनाथ चुनाव लड़ते थे तब तक वहां कोई जातीय समीकरण काम नहीं करता था।
-पिछले तीन चुनावों से वह 50 फीसदी से ज्यादा वोट अकेले लेते रहे हैं।
-लेकिन, इस बार एसपी-बीएसपी साथ आए तो गोरखपुर चुनाव जातीय जाल में फंस गया।
-गोरखपुर में जातीय समीकरण को देखते ही सपा ने निषाद पार्टी के प्रवीण निषाद को प्रत्याशी बनाया।
-यहां मछुआ बिरादरी के 1 लाख से ज्यादा वोट थे।
-गोरखपुर में एसपी प्रत्याशी प्रवीण निषाद को न सिर्फ सपा बल्कि पीस पार्टी और निषाद पार्टी का भी समर्थन मिला।
-बीजेपी ने गोरखपुर में मछुआरा सम्मेलन करवाना पड़ा लेकिन कोई लाभ नहीं मिला।
-सपा ने चुनाव प्रचार की कमान पिछड़े वर्ग के नेताओं को सौंपी। सभी ने अपनी-अपनी जातियों का वोट सपा के पक्ष डलवाया।
-गोरखपुर में 1998 से लगातार पांच बार जीत रहे थे योगी।
-उससे पहले उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ 1989 से लगातार तीन बार इसी सीट से सांसद रहे।
-उनसे भी पहले अवैद्यनाथ के गुरु महंत दिग्विजय नाथ साठ के दशक में दो बार निर्दलीय जीतकर गोरखपुर से सांसद बने थे।
-बहरहाल, महंतजी के खड़ाऊं का भी इम्तिहान हो गया। योगी की आभा कम हुई।
गोरखपुर में क्यों हारी भाजपा
-भाजपा के उपेंद्र दत्त शुक्ला योगी आदित्यनाथ की पसंद के नहीं माने जाते।
-उपेंद्र शुक्ला वित्त राज्य मंत्री शिवप्रताप शुक्ला के करीबी हैं। अंदरखाने में यह चर्चा है कि योगी खेमे ने पूरा सहयोग नहीं किया।
-शिवप्रताप शुक्ला की कभी भी योगी आदित्यनाथ से नहीं बनी।
-योगी के न चाहने के बावजूद उनके धुर विरोधीहरिशंकर तिवारी को शिवप्रताप ने उन्हें भाजपा में शामिल कराया।
-यही नहीं उपेंद्र शुक्ला के हरिशंकर से अच्छे ताल्लुकात हैं। इसलिए भी कार्यकर्ता दिल से नहीं जुड़े।
-हार की बड़ी वजह योगी की पसंद का उम्मीदवार नहीं होना भी माना जा रहा है।
-2014 के लोकसभा चुनाव में दोनों सीटों पर करीब तीन लाख वोटों से बीजेपी की जीत हुई थी।

फूलपुर
-फूलपुर में आजादी के बाद पहली बार फूलपुर कमल खिला था।
-हार से यह मैसेज गया कि फूलपुर में भगवा रंग स्थायी नहीं है।
-फूलपुर में पटेल बनाम पटेल की लड़ाई थी। एसपी के नागेंद्र सिंह पटेल भाजपा के कौशलेंद्र पटेल को हराया।
-इनकी हार का कारण बाहरी उम्मीदवार बताया जा रहा है।
-कौशलेंद्र वाराणसी से मेयर रह चुके हैं। वे वाराणसी से आकर चुनाव लड़ रहे थे।
-निर्दल अतीक अहमद ने भी कुछ हद तक चुनाव नतीजों को प्रभावित किया।

कम मतदान प्रतिशत भी अहम
-मतदान प्रतिशत का कम होना भी इस बात का संकेत है कि भाजपा के प्रति जनता का रूझान कम हुआ है।
-गोरखपुर में 49 प्रतिशत वोटिंग हुई जो पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में पांच से आठ प्रतिशत कम थी।
-फूलपुर में 38 फीसदी ही वोटिंग हुई जो कि पिछली सरकार की तुलना में 15 फीसदी कम थी

आगे क्या
अब गोरखपुर में रहना है तो योगी-योगी कहने का मिथक टूटा।
-हिंदु युवा वाहिनी का यह स्लोगन अब कमजोर होगा।
-नाथ संप्रदाय और गोरखनाथ मंदिर का वर्चस्व भी कमजोर होगा।
-यह हार योगी के लिए खतरे की भी घंटी है। यह हार हिंदुत्व के पोस्टर ब्वॉय योगी की भी हार है।
-यह हार गोरखनाथ मंदिर के महंत के अभेद्य किले की भी हार है।
-योगी आदित्यनाथ की सरकार चलाने की छवि और उनके विकास के नारे को लेकर भी सवाल खड़े होंगे।
-19 मार्च को योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार के कार्यकाल की पहली वर्षगांठ मनाएंगें। लेकिन जश्न फीका रहेगा।
-वोट प्रतिशत के हिसाब से देखें तो यदि आगामी चुनाव सपा-बसपा साथ लड़ीं तो गठबंधन को करीब 41 सीटें मिल सकती हैं।
-बीजेपी को 37 सीटों से ज्यादा नहीं मिलेगी।
-अमित शाह और पीएम मोदी को अपनी चुनावी रणनीति पर नए सिरे से सोचने को बाध्य होना होगा।
-अब बीजेपी की रैलियों में मोदी... मोदी... और योगी... योगी... के नारे हवा में गूंजने में परहेज हो सकता है।

लोकसभा चुनाव 2019 पर भी प्रभाव
-2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सहयोगी दलों के साथ 80 में से 73 सीटें मिली थीं।
-2017 के विधानसभा चुनाव में 403 में से 312 सीटें मिली थीं।
-मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच अंदरूनी खींचतान उजागर हुई।
-आगे चुनाव में यह विरोध खुलकर सामने आ सकता है।
्र-एसपी-बीएसपी का गठबंधन आगे भी जारी रहेगा। इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
-मोदी के खिलाफ महागठबंधन बनाने में मदद मिलेगी।
-यह उपचुनाव महागठबंधन का पहला ट्रायल था।
-अब गठबंधन में कांग्रेस और आरएलडी भी खुलकर साथ आ सकते हैं।
-अखिलेश यादव और मायावती दोनों ने ही चुनाव परिणाम के बाद गठबंधन को मजबूत करने के संकेत दिए हैं।

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