Krishna Janmashtami 2018 की रात को जपे यह मन्त्र बन जाएगी बिगड़ी किस्मत जाने कैसे

अर्जुन के सारथी बनकर उन्होंने पाण्डवों को महाभारत के संग्राम में जीत दिलवायी।

By: Mahendra Pratap

Published: 03 Sep 2018, 05:50 PM IST


लखनऊ , भगवान श्रीकृष्ण की हम सभी पूजा करते है उनसे प्रेम करते है क्योंकि उन्हें हम् भगवान मानते है लेकिन केवल मानते है जानते नही अगर जानते तो हम भगवान श्रीकृष्ण को केवल पूजते नही बल्कि जो भगवान श्रीकृष्ण कह रहे है उस मार्ग पर हम चलते भी जरूर।

पंडित शक्ति मिश्रा ने बतायाकि भगवान श्रीकृष्ण को माखनचोर कहते है दुलारते है प्यार करते है लेकिन वास्तविकता में जिसके लिए भगवान जन्म लिए थे धरा पर वो लीला को भी तो देखिए। भगवान के जन्म लेने के कई कारण होते है और उन कारणों में जो मुख्य कारण है वो है केवल समाज का उद्धार अधर्म का विनाश और धर्म की स्थापना।

लेकिन धर्म और अधर्म ये दोनों में केवल 'अ' अक्षर का अंतर है जिसका सीधा सा अर्थ होता है 'नही'। अगर अधर्म जीतने लग जाए तो धर्म विलुप्त हो जाएगा संसार का चक्र रुक जाएगा। और उसी चक्र को गतिमान करने के लिए वो शक्ति हमेशा धरा पर आते है लेकिन समय के अनुसार मानव अपने मन, बुद्धि और अहंकार के कारण समझ नही पाते है जान नही पाते है इसलिए धर्म की स्थापना में देरी हो जाती है या कहे यह भी लीला ही है उस शक्ति की जो कर्म करने का अवसर उन नाक़ाबिल को देते है जिससे नाम उनका हो। इसलिए भगवान कृष्ण का जन्म हुआ जो हमारे भटकते मन को बहुत ही सरलता से काबू कर लेते हैं।

तिथि विशेष कृष्ण जन्माष्टमी

पंडित शक्ति मिश्रा ने कहाकि कृष्णजन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्स्व है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं बल्कि विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व उल्लास से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं।

स्कन्द पुराण के मतानुसार जो भी व्यक्ति जानकर भी कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को नहीं करता, वह मनुष्य जंगल में सर्प और व्याघ्र होता है। ब्रह्मपुराण का कथन है कि कलियुग में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी में अट्ठाइसवें युग में देवकी के पुत्र कृष्ण उत्पन्न हुए थे। यदि दिन या रात में कलामात्र भी रोहिणी न हो तो विशेषकर चंद्रमा से मिली हुई रात्रि में इस व्रत को करें। भविष्य पुराण का वचन है- श्रावण मास(अमांत) के शुक्ल पक्ष में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत को जो मनुष्य नहीं करता, वह क्रूर राक्षस होता है। केवल अष्टमी तिथि में ही उपवास करना कहा गया है। यदि वही तिथि रोहिणी नक्षत्र से युक्त हो तो 'जयंती' नाम से संबोधित की जाएगी। वह्निपुराण का वचन है कि कृष्णपक्ष की जन्माष्टमी में यदि एक कला भी रोहिणी नक्षत्र हो तो उसको जयंती नाम से ही संबोधित किया जाएगा। अतः उसमें प्रयत्न से उपवास करना चाहिए।

विष्णुरहस्यादि वचन से- कृष्णपक्ष की अष्टमी रोहिणी नक्षत्र से युक्त भाद्रपद मास में हो तो वह जयंती नामवाली ही कही जाएगी। वसिष्ठ संहिता का मत है- यदि अष्टमी तथा रोहिणी इन दोनों का योग अहोरात्र में असम्पूर्ण भी हो तो मुहूर्त मात्र में भी अहोरात्र के योग में उपवास करना चाहिए। मदन रत्न में स्कन्द पुराण का वचन है कि जो उत्तम पुरुष है। वे निश्चित रूप से जन्माष्टमी व्रत को इस लोक में करते हैं। उनके पास सदैव स्थिर लक्ष्मी होती है। इस व्रत के करने के प्रभाव से उनके समस्त कार्य सिद्ध होते हैं। विष्णु धर्म के अनुसार आधी रात के समय रोहिणी में जब कृष्णाष्टमी हो तो उसमें कृष्ण का अर्चन और पूजन करने से तीन जन्मों के पापों का नाश होता है।

भृगु ने कहा है- जन्माष्टमी, रोहिणी और शिवरात्रि ये पूर्वविद्धा ही करनी चाहिए तथा तिथि एवं नक्षत्र के अन्त में पारणा करें। इसमें केवल रोहिणी उपवास भी सिद्ध है।

> भगवान श्रीकृष्ण ही थे, जिन्होंने अर्जुन को कायरता से वीरता, विषाद से प्रसाद की ओर जाने का दिव्य संदेश श्रीमदभगवदगीता के माध्यम से दिया।
> कालिया नाग के फन पर नृत्य किया, विदुराणी का साग खाया और गोवर्धन पर्वत को उठाकर गिरिधारी कहलाये।
> समय पड़ने पर उन्होंने दुर्योधन की जंघा पर भीम से प्रहार करवाया, शिशुपाल की गालियाँ सुनी, पर क्रोध आने पर सुदर्शन चक्र भी उठाया।
> अर्जुन के सारथी बनकर उन्होंने पाण्डवों को महाभारत के संग्राम में जीत दिलवायी।
> सोलह कलाओं से पूर्ण वह भगवान श्रीकृष्ण ही थे, जिन्होंने मित्र धर्म के निर्वाह के लिए ग़रीब सुदामा के पोटली के कच्चे चावलों को खाया और बदले में उन्हें राज्य दिया।

मन्त्र का जप

पंडित शक्ति मिश्रा ने बतायाकि अगर जीवन में बहुत परेशानियों ने घेर रखा हो तो उन परिस्थिति में निराश होने की जरुरत नहीं। बस भगवान कृष्ण की शरण में आ जाऊ और उनके सम्मुख यह मन्त्र का जप करें। इस मन्त्र के जप से एक अलग सी शांति और अंदर से ताकत मिलती हैं। अपने जीवन की चुनौतियों को झेलने की। साथ ही इस मन्त्र का इतना चमत्कार होता हैंकि आप के मन में जो भी इक्छा होगी वह पूरी हो जाएगी।
रात के समय माता तुलसी के समीप लडडू गोपाल के समाने 108 बार इस मन्त्र का जप करें।

> ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय नमः

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