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लखनऊ

Lok Sabha Elections 2024: भाजपा राज को गठबंधन दे रहा दिलचस्प फाइट, इस बार लखनऊ का महामुकाबला कुछ टाइट

Lok Sabha Elections 2024: लखनऊ में तीन दशक पहले अटलबिहारी वाजपेयी ने जो जीत की मजबूत नींव रखी थी, उसका सिलसिला अब तक बरकरार है। इस बार विपक्ष ने गठबंधन का दांव खेलते हुए संयुक्त प्रत्याशी देकर राजनाथ सिंह की राह में कुछ मुश्किलें पैदा करने का प्रयास किया है। आइए जानते हैं इस पर लोगों का क्या कहना है।

लखनऊMay 14, 2024 / 01:17 pm

Aman Pandey

Lok Sabha Elections 2024
(लखनऊ से विकास जैन की रिपोर्ट): Lok Sabha Elections 2024: यूं तो देश में अनेक लोकसभा क्षेत्र कई दशक से किसी न किसी राजनीतिक दल के मजबूत गढ़ बने हुए हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ भारतीय जनता पार्टी का एक ऐसा गढ़ है, जहां की राजनीति बीते करीब तीन दशक से देश के दो धुरंधर भाजपाई राजनेताओं पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और मौजूदा केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के इर्द-गिर्द ही घुमती रही है।
हालांकि, अटलजी को शुरुआत में यहां से हार का सामना करना पड़ा, लेकिन 1991 में पहली जीत के बाद उन्होंने यहां ऐसी छाप छोड़ी जो अटल बनकर राजनाथ सिंह के मजबूत राज के रूप में आगे बढ़ रही है। इस बार यहां राजनाथ सिंह का मुकाबला इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार समाजवादी पार्टी के रविदास मेहरोत्रा से होने जा रहा है। विपक्ष ने गठबंधन का दांव खेलते हुए संयुक्त प्रत्याशी देकर राजनाथ सिंह की राह में कुछ मुश्किलें पैदा करने का प्रयास किया है।

शहर का ‌सियासी हालचाल

देश के दूसरे राज्यों की राजधानी की तरह ही सामान्य शहरी विकास वाली इस सीट पर भाजपा के मजबूत पक्ष का कारण जानने और सियासी हलचल का अनुमान लगाने के लिए शहर में कदम रखा। राह में आते-जाते, थड़ी, दुकान, बाजार और सार्वजनिक परिवहन के साधनों में लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो तस्वीर साफ होने लगी कि आखिर क्यों इस सीट पर भाजपा का ‘अटल-राज’ बना हुआ है। लोगों से बातचीत में सामने आया कि यह सीट भाजपा का गढ़ है।
Lok Sabha Elections 2024
दरअसल, अब तक पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं का यहां की राजनीति से जुड़ा होना भी इसके भाजपा गढ़ होने का बड़ा कारण है। प्रत्याशी के तौर पर स्वयं राजनाथ सिंह यहां कमान संभाले हुए हैं। गठबंधन प्रत्याशी रविदास मेहरोत्रा लखनऊ मध्य से विधायक हैं। ऐसे में दोनों की शहर में बड़ी पहचान इस बार मुकाबले को कुछ रोचक बना रही है।

‘माहौल में खामोशी है, जो कुछ तो असर दिखाएगी’

स्टेशन से निकलने के बाद ऑटो में सवार हूं। ऑटो चालक निक्कू शुक्ला से सियासी बातचीत शुरू करते ही उसने कहा ..दिली से आए हो…सर्वे कर रहे हो चुनाव का। उसे बताया कि पत्रकार हूं तो बोला..यहां तो तस्वीर बिल्कुल साफ है। इस बार भी कुछ नया नहीं होने वाला। चारबाग इलाके में पान की थड़ी पर बैठे राहुल को तो चुनाव में ज्यादा दिलचस्पी ही नहीं थी। उसने कहा कि वोट देना है, 20 मई को जाकर दे आएंगे। एक के अलावा दूसरे प्रत्याशी को वे पहचानते ही नहीं हैं।
Lok Sabha Elections 2024
आलम नगर निवासी वरिष्ठ रंगकर्मी मुकेश वर्मा का कहना था कि इस बार लोकसभा चुनाव जैसा उत्साह नहीं है। कहीं न कहीं खामोशी है। मतदाता खुलकर बात नहीं कर रहा। यह खामोशी इस बार वोट प्रतिशत गिरा सकती है। लेकिन फिर भी यहां भाजपा सुरक्षित है। सुशांत सिटी निवासी डॉ. ए. के. सिंह की राजनीति में रुचि है। वे मरीजों से भी चुनाव का फीडबैक लगातार ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि लखनऊ में माहौल की कोई बात ही नहीं है। यहां तो जीत-हार तय है। लेकिन मतदाताओं की उदासीनता के कारण मत प्रतिशत गिर सकता है, जिससे हार-जीत का अंतर कम हो सकता है। रिकॉर्ड तोड़ जीत-हार की संभावना इस बार वे नहीं मान रहे।

मुद्दे तो हैं…

शिक्षा और स्वास्थ्य के उच्च व केन्द्रीय संस्थानों की कमी यहां बड़ा मुद्दा है। स्थानीय सुविधाओं पर बोझ बढ़ता जा रहा है। महंगाई और शिक्षा की अधिक फीस की टीस लोगों के मन में है। हालांकि मुख्यंमत्री आवास के पास पार्क रोड पर चाय की थड़ी पर अलसर निवासी व्यवसायी विवेक तिवारी, मेडिकल फील्ड से जुड़े इटाली बाग निवासी चंद्रमोली मिश्रा सहित कुछ युवकों से बातचीत हुई तो उनका कहना था कि सुधार लगातार हो रहे हैं, इसलिए ये मुद्दे कोई बड़ी बात नहीं है।
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05 विधानसभा सीट, 03 भाजपा, 02 सपा के पास

इस सीट पर 1991 से भाजपा का कब्जा है। भाजपा यहां आठ बार लोकसभा चुनाव जीत चुकी है। जिसमें अटलजी पांच, लालजी टंडन एक और राजनाथ सिंह दो बार सांसद चुने जा चुके हैं। राजनाथ सिंह 2014 और 2019 में चुनाव जीत चुके हैं। अटलजी ने यहां से आठ बार चुनाव लड़ा। लखनऊ लोकसभा क्षेत्र में लखनऊ पश्चिमी, उत्तरी, पूर्वी, मध्य और कैंट कुल पांच विधानसभा सीट आती हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में यहां भाजपा ने तीन और सपा ने दो सीटें जीती थीं।

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