नियमोंं के मकडज़ाल में न उलझे सीएम की घोषणा

बेमौसम बारिश-ओलावृष्टि से हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद कर दी। गेंहू, मटर, आलू, तिलहन की हजारों हेक्टेयर फसल तैयार खड़ी थी। अब यह पूर्वाचल से लेकर पश्चिमी जिलों तक खेतों में गिरी पड़ी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों को 24 घंटे के भीतर राहत पहुंचाने के निर्देश दिए हैं।

By: Mahendra Pratap

Published: 07 Mar 2020, 04:38 PM IST

टिप्पणी
महेंद्र प्रताप सिंह
आसमान से ओले और पानी नहीं किसान की बर्बादी बरसी है। तेज अंधड़ से तमाम जिलों में गेहूं और मंसूर की फसल लोट गयी। ओले ने सरसों की फलियों को क़तर-कतर कर छितरा दिया। मटर की लतर खेतों में छितर गयी। रात-रात भर पहरेदारी करके छुट्टा जानवरों से जो कुछ धरतीपुत्रों ने बचाया था चंद घंटे में आपदा की भेंट चढ़ गया। बीज, उर्वरक, सिंचाई और कई महीने की मेहनत-सब पर पानी फिर गया। मोरों का जोड़ा आम के पेड़ पर उदास बैठा रह गया। कहीं चुगने नहीं उतरा। बनमुर्गियां गड़ही के किनारे की झाडिय़ों में छुपी रो रही हैं-क्रेआं...क्रेआं...। सवाल है किसान किसके पास रोने जाय? कौन पोंछेगा इनके आंसू?
बेमौसम बारिश-ओलावृष्टि से हजारों हेक्टेयर फसल बर्बाद कर दी। गेंहू, मटर, आलू, तिलहन की हजारों हेक्टेयर फसल तैयार खड़ी थी। अब यह पूर्वाचल से लेकर पश्चिमी जिलों तक खेतों में गिरी पड़ी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों को 24 घंटे के भीतर राहत पहुंचाने के निर्देश दिए हैं। शनिवार-रविवार को सरकारी दफ्तरों की छुट्टी है। ऊपर से होली का त्योहार। ऐसे में अफसरों को खेतों की मेड़ तक पहुंचने में कई दिन बीत जाएंगे। निजी बीमा कंपनियों को अफसरान भी अभी तक नुकसान का आंकलन करने नहीं पहुंचे हैं। जबकि, सूबे में एक से छह मार्च तक विभिन्न क्षेत्रों में कई चक्र में बारिश और ओला गिर चुका है। सरसों और तोरिया की फसल को ओलावृष्टि से सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। खेत में ही सरसों के बीजों में अंकुरण शुरू हो गया है। आलू खुदाई के लिए तैयार थी। खेतों में पानी भरा है। बच भी गयी तो जल्द सड़ जाएगी। भंडारण लायक नहीं बचेगी।

हर तरफ और तबाही। लेकिन, सरकार अभी सिर्फ सात जिलों में कुल 2,37,374 किसानों की कुल 1,72,0018 हेक्टेयर फसलों को ही प्रभावित मान रही है। मुख्यमंत्री के आदेश के बाद राहत आयुक्त कार्यालय फिर से जानकारियां जुटा रहा है। संकट यह है कि राहत की उम्मीद में किसान अपनी बची-खुची फसल भी नहीं बटोर रहा। जब तक आंकड़े जुटाने वाले पहुंचेगे तब तक अधपका अन्न खेतों में ही सड़ जाएगा। इंसान तो खा नहीं पाएगा चिडिय़ांं भी न चुग सकेंगी। ऐसे में जनहानि, पशुहानि और मकान क्षति से प्रभावित लोगों को तत्काल सहायता कैसे मिलेगी?

मुख्यमंत्री और अफसरों के बयान में भी विरोधाभास है। सीएम ने 24 घंटे में राहत देने का निर्देश दिया है। जबकि, अफसरों ने बीमित किसान जिनकी फसलों को ओला, वर्षा व जलभराव से नुकसान हुआ है, उसकी सूचना प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्राविधानों के अनुसार निर्धारित समय 72 घंटे में उपलब्ध कराने को कहा है। आकाशीय बिजली से फसल की क्षति की सूचना भी 72 घंटे के अंदर देने को कहा गया है। ऐसे में 24 घंटे के भीतर राहत मिलने की बात बेमानी साबित होगी।

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फसलों की तबाही का मंजर आंखों से दिख रहा है। फिर कानूनों और पड़ताल का मकडज़ाल क्यों? राहत की जरूरत तुरंत है। होली का त्योहार सिर पर है। किसानों की होली बेरंग न हो इसलिए नियम-कानूनों से परे लेखपाल और ग्राम सेवक मौके पर मुआयना करें और राहत बांटें। यह तय करना सरकार का काम है कि राहत देने में कैसे पारदर्शिता बरती जाए और धांधली न होने पाए। आखिर किसानों के लिए भी तो जीरो टालरेंस नीति लागू होती। सरकार यहां भी तत्परता दिखाए। आखिरी व्यक्ति के आंसू पोछने पर ही रामराज्य की परिकल्पना साकार होगी। योगी सरकार ऐसा कर सकी तभी उसे सही मायने में किसान हितैषी माना जाएगा।

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