यूपी में श्रमिकों का मिली राहत, अब 8 घंटे ही करेंगे काम

उत्तर प्रदेश सरकार को एक हफ्ते पहले लिए अपने फैसले को वापस लेना पड़ा। अब युवा श्रमिक 12 नहीं बल्कि 8 घंटे ही काम करेंगे। श्रम कानून के इस संशोधन के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में 18 मई को सुनवाई होनी थी।

By: Mahendra Pratap

Updated: 16 May 2020, 12:03 PM IST

लखनऊ. उत्तर प्रदेश सरकार को एक हफ्ते पहले लिए अपने फैसले को वापस लेना पड़ा। अब युवा श्रमिक 12 नहीं बल्कि 8 घंटे ही काम करेंगे। श्रम कानून के इस संशोधन के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में 18 मई को सुनवाई होनी थी। यूपी सरकार ने फैसला वापस लेने के बाद हाईकोर्ट को भी सूचित कर दिया है। यूपी सरकार के इस कानून का मजदूर संगठन ने पुरजोर विरोध किया। आरएसएस के भारतीय मजदूर संघ ने नए श्रम कानून को मजदूर विरोधी बताया था,और प्रदर्शन करने की धमकी दी थी। वहीं सभी बड़ी राजनैतिक पार्टियों सपा-बसपा और कांग्रेस इस नई अधिसूचना के खिलाफ अपना झंडा बुलंद कर लिया था।

उत्तर प्रदेश सरकार के श्रम विभाग की ओर से ने 8 मई को जारी अधिसूचना में रजिस्टर्ड कारखानों में श्रमिकों के काम करने के घंटे बढ़ाए गए थे। इस अधिसूचना के मुताबिक कारखाने में युवा श्रमिक से एक दिन में अधिकतम 12 घंटे और एक हफ्ते में 72 घंटे से अधिक काम नहीं लिया जाएगा। अब एक दिन में अधिकतम आठ घंटे और एक हफ्ते में 48 घंटे काम कराने का पुराना नियम फिर प्रभावी हो गया।

कुछ दिन पहले उत्‍तर प्रदेश सरकार की इस अधिसूचना को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल हुई थी, जिस पर 18 मई को अगली सुनवाई होनी है। पर इससे पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार ने 12 घंटें काम करने के आदेश को संशोधित कर आठ घंटे कर दिया। और इस संशोधन की अधिसूचना को खत्म किए जाने की जानकारी प्रमुख सचिव (श्रम) सुरेश चंद्रा ने शुक्रवार को पत्र के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य स्थायी अधिवक्ता को दे दी है। पत्र के अनुसार 8 मई को श्रम कानूनों को लेकर जारी अधिसूचना को 15 मई 20 को निरस्त कर दिया गया है।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश गुजरात गोवा, महाराष्ट्र और ओडिशा की सरकार ने भी 1948 के कारखानों अधिनियम के तहत श्रम कानूनों में ढील दी है। बहाना था कि नए उद्योगों को इससे आसानी होगी। बिहार व अन्य राज्य भी चलन की तरफ बढ़ने का मन बना रहे हैं। वहीं यूपी कोर्ट के डश्र की वजह से अपने एक बदलाव को तत्काल बदल दिया।

कोरोना संकट की वजह से ठप पड़े कारोबार को गति देने के नाम पर यूपी में औद्योगिक इकाइयों, प्रतिष्ठानों और कारखानों को एक हजार दिन (यानी तीन साल) के लिए श्रम कानूनों में छूट दे दी है, हालांकि मजदूर संगठन इसका जमकर विरोध कर रहे हैं।

आरएसएस के भारतीय मजदूर संघ ने नए श्रम कानून को मजदूर विरोधी बताया था जबकि संगठन के प्रवक्ता ने कहा था कि अंतरराष्ट्रीय अधिकारों का उल्लंघन है और इस फैसले को तुरंत वापस लेना चाहिए। साथ ही संगठन ने इस फैसले के खिलाफ प्रदर्शन करने की धमकी दी थी। इसके अलावा कई पार्टियों के बड़े नेताओं ने इस बदलाव के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराया।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा था कि नए कानून के तहत मजदूरों का शोषण बहुत दुखद है। कोरोना प्रकोप में मजदूरों/श्रमिकों का सबसे ज्यादा बुरा हाल है, फिर भी उनसे 8 के बजाए 12 घंटे काम लेने की शोषणकारी व्यवस्था पुनः देश में लागू करना अति-दुखद व दुर्भाग्यपूर्ण है। श्रम कानून में बदलाव देश की रीढ़ श्रमिकों के व्यापक हित में होना चाहिए ना कि कभी भी उनके अहित में।

समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि भाजपा सरकार की श्रम नीति से मालिकों को मनमानी करने और श्रमिकों का शोषण करने की खुली छूट मिलेगी। नई श्रम नीति के कानूनों का पालन कराने के लिए कोई भी श्रम अधिकारी उद्योगों के दरवाजे तीन साल तक नहीं जाएगा। मालिक के कारखाने में श्रमिक को अब 12 घंटे काम करना होगा जबकि उसके 8 घंटे के हिसाब से मजदूरी मिलेगी। मालिक के लिए श्रमिक को 4 घंटे बेगारी करनी होगी, यानी अब मालिक को कानून से हर छूट और श्रमिक के शोषण करने की भी गारंटी रहेगी।

कांग्रेस ने भी इस का विरोध किया था, कहा यह अत्याचार है।

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