उधर से इशारा, इधर से मुस्कुराहट..मेट्रो का ऐसा नजारा देखते रहे सैकड़ों लोग

उन्होंने इशारों में कुछ पूछा और इन्होंने मुस्कुराकर दिया जवाब

By: Dikshant Sharma

Updated: 11 Sep 2017, 04:53 PM IST

लखनऊ। 'ये दिन उनके लिए वाकई ख़ास था। कदम कदम पर उनकी बोली और भाषा थी। राह भी उनके लिए मुफीद थी। 5 दिन से उस खास के दीदार का इंतज़ार था। आज मौका मिला तो चेहरे पर अलग ही चमक थी। इशारों इशारों में तमाम बातें हुई। कुछ अपने बारे में कुछ उसके बारे में। सवालों का एक प्यारी मुस्कान के साथ जवाब भी मिला। इस नाज़रे को सैकड़ों लोग देखते भी रहे। '----ये लम्हा था लखनऊ मेट्रो का जहां दिव्यांग अपनी मेट्रो का एहसास करने आये थे।

सोमवार को दृष्टि संस्था के 18 दिव्यांग बच्चे और 5 टीचर लखनऊ मेट्रो के भ्रमण पर गए। सुबह 11 बजे डायरेक्टर महेंद्र सिंह समेत एलएमआरसी की टीम उनकी अगुवाई में मौजूद रही। इनमें से अधिकतम बच्चे मानसिक रूप से विकलांग और बोलने और सुनने में असमर्थ थे। उन्होंने चारबाग से ट्रांसपोर्ट नगर और वापस चारबाग तक का सफर किया। इस दौरान मेट्रो अधिकारी भी मौजूद रहे। सफर के दौरान बच्चों ने मेट्रो अधिकारिओं से कई सवाल पूछे। साइन लैंग्वेज और मीडिएटर की मदद से मेट्रो कर्मचारियों और बच्चों के बीच संवाद हुआ।

दिव्यांगों के लिए स्पेशल है मेट्रो
नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए प्रायोरिटी फेज के सभी मेट्रो स्टेशन में टेक्टाइल पाथ बनाया गया है। स्टेशनों पर इसके माध्यम से दृष्टिबाधित व्यक्ति यात्रा खत्म होने के दौरान बिना किसी के सहायता के मेट्रो स्टेशन से उतर भी सकेगें। दिव्यांगों को मेट्रो के सफर के दौरान गाइड करने के निर्देश भी सभी कर्मियों को दिए गए हैं। मेट्रो स्टेशन के एंट्री प्वांइट से लिफ्ट और कॉनेकोर्स एरिया में टिकट काउंटर मशीन से होते हुए लिफ्ट और प्लेटफार्म तक टेक्टाइल पाथ को ख़ास दिव्यांगों के लिए बनाया गया है।

वॉकीटॉकी से की 'मेट्रो' से बात
पहली बार मेट्रो को करीब से देखने वाले बच्चों के मन में बहुत से सवाल उठ रहे थे। उन्होंने इन सब सवालों के जवाब मेट्रो अधिकारियों से जाने। 12 साल की रौशनी जो कि न बोल पाती है और न ही थी से सुन पाती है कतार में सबसे आगे खड़े होकर मेट्रो का इंतज़ार कर रही थी। तभी उसके बगल में खड़े मेट्रो कर्मचारी के वॉकीटॉकी पर अनाउंसमेंट हुई। उसने जैसे ही निकल कर उसपर बार की किरण ने उसको करीब से देखने की इच्छा जताई। उसे बताया गया कि इससे मेट्रो के सञ्चालन कर रहे लोगों से बात की जा सकती है। इतना जानते ही किरण भी उसमें 'मेट्रो को हेलो' बोलने लगी।

ये क्या है और क्यों बनी है?
15 साल का रितेंद्र भी मेट्रो की सवारी के उत्साहित दिखा। मेट्रो के आते ही रितेंद्र ने अपनी टीचर से पुछा कि ये है क्या ? मेट्रो में सवार होने के बाद उसने एक बार फिर इशारा किया वे जानना चाहता है कि आखिर मेट्रो क्या है और क्यों बनाई गयी है? एलएमसी के अधिकारिओं ने समझाया कि मेट्रो का निर्माण बेहतर ट्रांसपोर्ट सुविधा देने के लिए हुआ है।

'क्या मेरे जैसे भी कर सकते हैं सवारी ?'
एक और बच्ची जो न ठीक से चल सकती है और न देख सकती है राधा ने जानना चाह कि क्या उसके जैसे लोग भी मेट्रो में सफर कर सकते हैं ? इस पर अधिकारियों ने उन्हें पूरी जानकारी देते हुए बताया कि किस तरह मेट्रो को कोई भी आराम से इस्तेमाल कर सकता है। हिंदी इंग्लिश में डिस्पले और अनाउंसमेंट के साथ नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए मेट्रो में ब्रेल भाषा का इस्तेमाल किया गया। एक मेट्रो बोगी में 16 सीटें दिव्यांगों के लिए रिज़र्व है जिससे ब्रेल भाषा में भी लिखा गया है ताकि नेत्रहीन लोग इसे छू के समझ सकें।

दिव्यांगों के लिए बैरियर फ्री है लखनऊ मेट्रो
बच्चों के साथ सफर कर रहे डायरेक्टर रोलिंग स्टॉक महेंद्र सिंह ने कहा कि इस सफर के पीछे का मकसद था ये बताना कि लखनऊ मेट्रो कितनी यूजर फ्रेंडली है। उसे कोई भी प्रयोग कर सकता है। दिव्यांग यात्री हमारे लिए वीवीआईपी से कम नहीं हैं। यात्रा के दौरान बच्चों के चेहरों पर जो मुस्कान देखी उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। दिव्यांगों को मेट्रो स्टेशन में घुसने से छोड़ने तक व्हील चेयर की व्यवस्था भी है। मेट्रो के किसी भी कर्मचारी से आप मदद मांग सकते हैं।

मेट्रो स्टाफ का पूरा सहयोग
दृष्टि संस्था की जॉइंट डायरेक्टर शालू सिंह ने बताया कि सभी बच्चे मेट्रो में सफर करने के बाद खुश हुए हैं। वापस जाते हुए एक ने यहां तक पूछ लिया कि क्या हम फिर कभी इसमें सफर करने के लिए वापस आएंगे। मेट्रो स्टाफ ने भी बच्चों को पूरा सहयोग दिया है।

Dikshant Sharma
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