उप चुनाव में योगी के तिलस्म को तोड़ सकता है विपक्ष, महागठबंधन के पीछे ये होगा मास्टर प्लान

इस उपचुनाव को 2019 लोकसभा चुनाव में वपक्षी एकता का लिटमस टेस्ट भी कहा जा सकता है।

By: Dikshant Sharma

Published: 10 Feb 2018, 04:20 PM IST

लखनऊ. गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा होने के बाद ये निश्चित है कि चुनाव दिलचस्प होगा। 11 मार्च को इन सीटों पर उपचुनाव होने हैं।इन दो सीटों पर होने वाले उपचुनाव की रणनीति खुद राजनीतिक दलों के शीर्ष नेतृत्व तय कर रहे हैं। इस उपचुनाव को 2019 लोकसभा चुनाव में वपक्षी एकता का लिटमस टेस्ट भी कहा जा सकता है। दरअसल जिस तरह की राजनीतिक गलियारों में सुगबुगाहट चल रही है उससे राजनीतिक पंडित तो यही मान रहे हैं।

उपचुनाव में भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर

दरअसल गोरखपुर लोकसभा सीट पर योगी आदित्यनाथ और फूलपुर पर केशव मौर्या का कब्ज़ा था। सीएम / डिप्टी सीएम बनने के बाद अब इन दोनों ही सीटों पर उपचुनाव होने हैं। भाजपा फिलहाल इन सीटों को बचाने के लिए चेहरे की तलाश में जुट गई है। फिलहाल फूलपुर से डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य की पत्नी के चुनाव लड़ने के कयास हैं तो गोरखपुर से क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ल, क्षेत्रीय मंत्री धर्मेंद्र सिंह के अलावा योगी के खास माने जाने वाले स्वामी चिन्मयानंद और फतेह बहादुर सिंह की पत्नी साधना सिंह के लगाए जा रहे हैं।केशव मौर्या ने पहली बार ये सीट भाजपा के खाते में लाए थे। इसलिए भी जीतना ज़रूरी है कि कहीं लोग उस जीत को मोदी वेव का असर न कहें। वहीँ गोरखपुर सीट से भाजपा की प्रतिष्ठा जुडी है। वे प्रदेश के मौजूदा सीएम की लोकसभा सीट रही है जिसपर 26 साल से बीजेपी का कब्ज़ा रहा है।

वही विपक्ष भाजपा को हारने के लिए एक जुट हो सकता है। समाजवादी पार्टी की ओर से पहले ही ये आवाहन कर दिया गया है कि विपक्ष मिलकर भाजपा को शिकस्त दे। हालाँकि कांग्रेस और बसपा ने अपने पत्ते इसपर नहीं खोले हैं लेकिन इस गठबंधन के पीछे के तर्क से विपक्षी गठबंधन के कयासों को बल मिलने लगा है।

चलिए आपको समझाते हैं इस गठबंधन के पीछे की गणित -

कांग्रेस को फूलपुर का मोह !
इससे पहले दो राज्यों में पांच विधानसभा सीटों पर चुनाव हुआ था जिसमें दो कांग्रेस के खाते में आई थी। बात यूपी की करें तो 80 में कांग्रेस के पास दो और सपा के पास पांच लोकसभा सीटें हैं। 2019 चुनाव से पहले दोनों ही दल अपनी सियासी ज़मीन तलाश में जुटी हैं। फूलपुर का इतिहास देखें तो ये देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सीट रही है। अमेठी और रायबरेली लोकसभा सीट के अलावा कांग्रेस एक बार फिर इस सीट को अपने खाते में लाने की मंशा रख रही है।

गोरखपुर पर सपा का ध्यान
वहीं बात गोरखपुर लोकसभा की करें तो यहां की गणित और दिलचस्प है। पूर्वांचल में सपा की पैठ मज़बूत रही है। सिर्फ लोकसभा में ही सपा को सफलता नहीं मिली। कुछ जानकारों का कहना है कि हाल ही में बड़े ब्राह्मण नेता के तौर पर पहचाने जाने वाले हरी शंकर तिवारी के हाते पर पुलिस की रेड से ब्राह्मण वर्ग में निराशा है। सपा के लोकसभा कैंडिडेट राजमती निषाद को योगी के मुकाबले 21 प्रतिशत वोट मिले थे। ऐसे में अगर ब्राह्मण वर्ग और अन्य पार्टियों का समर्थन सपा को मिल गया तो चुनावी परिणाम अलग हो सकते हैं।

बैक डोर सपोर्ट दे सकती हैं मायावती
बसपा की खोटी चुनावी ज़मीन को बचाने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती हाथ मिलाने में पीछे नहीं हटेंगी। कर्णाटक विधानसभा चुनाव के लिए मायावती देवगौड़ा के साथ चुनावी मैदान में उतरेंगी। इससे पहले गुजरात चुनाव में भी बसपा और कांग्रेस की दाल गलने ही वाली थी लेकिन अंत में ऐसा नहीं हुआ। यूपी में होने वाले उपचुनाव की वैद्यता एक साल है और 2014 लोकसभा में बसपा के खाते में एक भी सीट नहीं मिली थी। ऐसे में 2019 लोकसभा चुनाव से पहले बसपा रिस्क लेने के मूड में नहीं है। कयास और मजबूत हुए जब सतीश चंद्र मिश्रा ने इस बात पर विराम लगा दिया कि खुद बसपा सुप्रीमो फूलपुर से चुनाव लड़ेंगी।

लखनऊ विश्विद्यालय के राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर कविराज कहते हैं कि अगर गठबंधन होता है तो ये भाजपा के सामने बड़ी चुनौती होगी। गोरखपुर में हमेशा से समाजवादी पार्टी भाजपा को टक्कर देती आई है। एक चुनाव में तो अंतर करीब 5 हज़ार था। ऐसे में अन्य पार्टियों के समर्थन से इन्फ्लुएंस पढ़ेगा। यही नहीं फूलपुर सीट पर पिछड़े वर्ग का समीकरण भाजपा के लिए सिरदर्द बन सकता है।

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