पारंपरिक मानदंडों से आगे बढ़ कर ही हासिल होता है मुकाम- सुजाता पांडेय

मीडिया पैनलिस्ट एवं महिला अधिकार कार्यकर्ता सुजाता पांडेय का कहना है कि जिस तरह यूपी पंचायत चुनाव के नतीजे सामने आए, उसका 2022 के चुनाव पर काफी गहरा असर पड़ेगा.

By: Abhishek Gupta

Published: 11 May 2021, 09:13 PM IST

लखनऊ. मीडिया पैनलिस्ट एवं महिला अधिकार कार्यकर्ता सुजाता पांडेय का कहना है कि जिस तरह यूपी पंचायत चुनाव के नतीजे सामने आए, उसका 2022 के चुनाव पर काफी गहरा असर पड़ेगा और इसमें लखनऊ अहम रोल अदा कर सकता है। लखनऊ हमेशा से उत्तर प्रदेश की रीड़ की हड्डी रहा है, इसलिए यहां राजनीतिक दलों के के लिए जीत काफी महत्व रखती है, लखनऊ का किला फतेह करना प्रत्याशियों के लिए हमेशा से कठिन रहा है। 2022 में उत्तर प्रदेश में होने वाला चुनाव 2024 के चुनाव की तस्वीर बदल सकता है।

सुजाता पांडेय विभिन्न सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर गहन अध्ययन कर दर्शकों को तथ्यों और शोध से भरी जानकारी प्रस्तुत करने में भरोसा रखती हैं। सुजाता विडियो आधारित सामग्री के माध्यम से अपनी मुखर राय दर्शकों तक पहुंचाती हैं। सुजाता मूल रूप से बिहार में स्थित आरा नामक एक छोटे शहर से आती है। उनकी आरा से कॉरपोरेट जगत तक पहुंचने एवं मीडिया के बेहतरीन पैनलिस्टों में से एक बनने की यात्रा लंबी लेकिन उत्साह से भरपूर है। जल्द ही वह यूपी में भी मीडिया पैनलिस्ट के रूप में शामिल होती दिखेंगी।

उनसे सवाल जवाब के कुछ अंश-

सवाल- सुश्री सुजाता, क्या आप हमें अपने अब तक की सफलता के सफर के बारे में जानकारी देंगी? आप मीडिया पैनलिस्ट कैसे बनी?

जवाब- हां, बिल्कुल! आप देखें, मेरा जीवन एक साहसिक सफर रहा है।मैं बिहार में स्थित एक छोटे शहर से हूं जहां से कॉरपोरेट क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए कठिन मेहनत के साथ अच्छी शिक्षा लेनीv पड़ी।दरअसल, मुझे कॉर्पोरेट में अपना काम करना पसंद आया, क्योंकि इसमें बहुत कुछ नया था।उस दौरान, मैंने बहुत यात्रा की। कॉरपोरेट करियर मेंमैंने कई देशों का दौरा किया,लेकिन मुझे एक खालीपन का अहसास हो रहा था।मानो कुछ करने की जरूरत है। यह भांपना बहुत मुश्किल नहीं था क्योंकि मैं खुद एक महिला थी। अपने सफर में मैंने बहुत सारी महिलाओं की दुर्दशा देखी जो विभिन्न स्तरों पर संघर्ष कर रही हैं। खासकर मेरी यात्रा के दौरान- मैंने देखा कि अन्य देशों की महिलाएं भारत की महिलाओं की तुलना में कम वंचित नहीं हैं। मैं उस वक्त मदद तो नहीं कर पा रही थी, लेकिन महिला सशक्तिकरण के नाम पर होने वाले दावों से मैं व्याकुल हो रही थी। मैं मदद करना चाहती थी लेकिन असहाय थी। “असल में कॉरपोरेट सेटअप में रह कर आप एक सीमित दायरे के अंदर ही देश के लिए कुछ कर सकते है।“ इसके लिये मेरा बंधन मुक्त होना जरूरी था,इसलिए, मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और आज मैं यहां हूं।

सवाल- आपकी यह सारी बातें प्रेरणादायक लगती है, लेकिन, आपने नौकरी छोड़ने के बाद अपना रास्ता कैसे बनाया। आपने पैनलिस्ट बनने का फैसला कैसे किया? क्या आप अपनी नौकरी छोड़ने के फैसले से खुश हैं?

जवाब- हां, जाहिर है,उस वक्त मैं इसके परिणाम का अंदाजा नहीं लगा रही थी। दरअसल, मैं परिस्थिति को समझना चाहती थी।मेरा मन सवालों से भरा था। कई सारे सवाल जैसे- महिलाएं इतने पिछड़े हालात में क्यों हैं, सरकार एवं उनकी योजनाएं प्रभावी रूप से काम क्यों नहीं कर पा रही हैं, शामिल थे। यह जानना दुखद था कि इतने सारे लोग सिर्फ बदलाव की वकालत कर रहे थे लेकिन बदलाव वास्तव में नहीं हो रहा था।आपको पता है, सिर्फ जुबानी बातें।, जैसा कि हमेशा से चर्चित महिला आरक्षण विधेयक। जो बिल आज भी एक सपना है। इसके अलावा, मुझे एहसास हुआ कि लोग विभिन्न मुद्दों के बारे में सही जानकारी नहीं ले रहे थे। मैंने तय किया कि उन मुद्दों को खुद देखूंगी। ऐसा करना मेरे लिये आंतरिक खुशी थी, आप ऐसा कह सकते हैं। मैंने सोचा कि विडियो एक ऐसा बेजोड़ माध्यम हो सकता है जो बड़ी संख्या में लोगों से जोड़ने में सहायक साबित होगा। आज मेरा सुजाता पांडेय पेज के नाम से ऑनलाइन चैनल है। अपने इस चैनल पर हम बात बदलाव की नाम से साक्षात्कार श्रृंखलाचलाते हैं, जिसमें विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिष्ठित व्यक्ति शो पर आते हैं। यह श्रृंखला तीखी चर्चा के साथविषयों और तथ्यों पर बातचीत के लिए एक पोर्टल के रूप में कार्य करती है जो अक्सर मुख्यधारा की मीडिया द्वारा छूट जाते हैं। ऐसा करते हुए मुझे खुशी है कि लोग मेरे वीडियो द्वारा शिक्षित हो रहे हैं। धीरे-धीरे ही सही मगर निश्चित रूप से हो रहे इस बदलाव का हिस्सा बनकर मैं खुश हूं।

सवाल- हाँ! आप अक्सर महिला सशक्तिकरण बारे में बात करती देखी जाती हैं। आप इस बारे में उत्साहित भी लगती हैं, लेकिन महिला सशक्तिकरण की पेचिदगी को कैसे हल करना शुरू किया है?

जवाब- आपका इस विषय को पेचीदा कहना दिलचस्प है, लेकिन यह सचमुच पेचीदा ही है। यदि कोई नीति है तो इसे लागू करने के लिए कोई प्रभावी डेटा संग्रह नहीं है। अगर डेटा है, तो यह महिलाओं की वास्तविक एवंजमीनी स्तर की समस्याओं को समान रूप से नहीं दिखाता है और जिसे राजनीतिक हस्तक्षेप से बदला जा सकता है। महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए एक बहुत ही संवेदनशील दृष्टिकोण की आवश्यकता है।इस पेंच के हल करने का एक तरीका यह है कि महिलाओं को निर्णय लेने की प्रक्रिया में सीधे तौर से शामिल किया जाए। महिला को सशक्त बनाने के लिये उसे सब कुछ स्वयं समझने दें। उसे दुनियां अपनी आंखों से देखने दें। अपने चैनल पर मैं इस बारे में लंबी बात करती हूं।

सवाल- जी, हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मीडिया को इकट्ठा करने वाले किसान अंदोलन के बारे में एक पैनलिस्ट के रूप में आप क्या सोचती हैं? आप इस एजेंडे के बारे में भी बहुत मुखर रही हैं।

जवाब- देखिए, मुझे लगता है कि मूल्य निर्धारण की रणनीति के बारे में असहमति रखने वाले किसानों के एक वास्तविक मुद्दे के रूप में यह आंदोलन शुरू हुआ था, लेकिन आखिर मेंमेरी समझ से यह मोदी विरोधी अभियान में बदल गया। यहां तक कि ग्यारह लगातार बैठकों के साथ भी आंदोलन किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा। वह अजीब था। गणतंत्र दिवस के दिन की घटनाएं निश्चित रूप से अपमानजनक थीं। उस पल ने राष्ट्र की आत्मा को झकझोर दिया। मुझे लगता है कि, गणतंत्र दिवस पर प्रदर्शन के बाद किसान आंदोलन ने अपना अवसर गंवा दिया है।

सवाल- कोविडसंकट के बारे में आपका क्या कहना है जिसने देश को जकड़ लिया है? किसे दोष दिया जाए?

जवाब- क्या कहूं। इस तरह के मानवीय संकट के लिएआप एक व्यक्ति पर दोष डालकर उनसे समाधान की मांग नहीं कर सकते हैं। यह संकट वर्षों से महत्वपूर्ण मुद्दों की उपेक्षा को व्यक्त करता है। अस्पताल बनवाने के वादे पर आखिर कब सरकार बनी थी। कब आखिरी बार हमने अस्पताल की मांग की थी। अभी के हालात को देखकर मैं निराश हूं, लेकिन नागरिक के अधिकारों को लेकर हमें शिक्षित होने की जरूरत है। सरकारों को जनता के दीर्घकालिक लाभ के लिए बेहतर काम करने की आवश्यकता है।हमें भविष्य से आगे की सोचने की जरूरत है। और इस वक्त, हम सभी को केवल सुरक्षित रहने के बारे में सोचने की आवश्यकता है।
सवाल- आप तक कोई कैसे पहुँच सकता है और इस आंदोलन में शामिल हो सकता है?

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